19 July, 2015

जिंदगी ख़त्म हो जाती है. पूरी नहीं होती. अधूरी ही रहती है हमेशा.

लड़की बैठी है भगवान के पास. सर झुकाए. 'यू नो, यू आर सो ब्लडी यूजलेस, आई डोंट लाइक यू एनीमोर, तुम मेरी जिंदगी से चले क्यूँ नहीं जाते?' भगवान ही शायद इक ऐसा है जो लड़की से ज्यादा जिद्दी है.

तुम उसका नाम भूल गयी हो न. बस इक रंग रह गया है वो तुम्हारी आँखों में. हरा. दुनिया के सारे हरे रंग के शेड्स हैं उसके. सारे. सब समंदर. सारे पौधे. सब. आसमान भी कभी कभी ले आता है कोई रंग का हरा.

सुनो. मेरा क़त्ल कर सकोगे? बहुत हिम्मत की बात करते हो. मेरे दोस्तों में ऐसा कोई नहीं है जिसके हाथ न कांपें. मगर मुझे तुमसे बहुत उम्मीद है. तुम क्या सोचते हो यूथेनेसिया के बारे में? किसी की तकलीफ से किसी को मुक्त कर देना तो सही है न? फिर कहाँ है पैमाना कि शारीरिक दर्द बर्दाश्त न करने पर ऐसा करना चाहिए. ये जो मेंटल पेन है. व्हाट मेक्स इट लेस रियल? मेरी तकलीफ का कोई इलाज भी नहीं है. हाँ मुझे खुद में सुधार करने चाहिए. मुझे योग करना चाहिए. मुझे खुद को काम में बहुत व्यस्त रखना चाहिए. मगर नहीं होता दोस्त. एकदम नहीं होता. तकलीफ इतनी है कि कोई ट्रांक्विलाईजर काम नहीं करता. सुनो. तुम्हें रिवोल्वर चलाना आता है? अच्छा देसी कट्टा? हाँ. मैं इंतज़ाम कर दूँगी. तुम चिंता न करो. मेरे बहुत कॉन्टेक्ट्स हैं. तुम बस वादा करो कि तुम्हारे हाथ नहीं काँपेंगे. बस. 

मालूम. तुमसे बहुत सी बातें करनी थीं. मौत की. जिंदगी की. पहाड़ों की. जिस दिन मेरा व्हीली सीखने का मन किया तुमसे उस दिन बात करने का मन था. बताने का मन था. के तुम समझते. मेरे इस पागलपन को शायद. जानते हो दोस्त. मुझे पूरा पूरा कोई समझ नहीं पाता इसलिए अपने पागलपन के छोटे छोटे हिस्से करके लोगों से बांटते चलती हूँ. जरा जरा हिस्सों में समझते हैं सब मुझे. पूरा पूरा कोई समझ नहीं सकता. समझना भी नहीं चाहिए. शायद इश्वर नाराज़ हो जायेगा. उसकी फेवरिट में हूँ तब तो इतना सारा दुःख लिखा हुआ है किस्मत में. भड़क गया तो जाने क्या करेगा. शायद सारे रकीबों को मेरे शहर में ट्रांसफर दे देगा. 

मगर जान, तुम समझते हो न. मेरी मुसीबत इश्क़ नहीं है. मेरी मुसीबत मैं हूँ. ये जो मन है. जिस पर किसी का बस नहीं चलता. वो मन है. कोई कब तक अपनेआप से लड़ाइयाँ लड़े. थकान हो जाती है. पोर पोर दुखता है. फिजिकली यु नो. तुमने कितना पेन बर्दाश्त किया होगा? थक जाने की हद तक थक जाने के बाद भी शायद चलने का हौसला है तुम में. डिसिप्लिन भी. और तुम तो अच्छे भी हो कितने न. तुम्हारी आत्मा एकदम साफ़ है. सोचती हूँ कैसा होता होगा. हैविंग अन unbroken soul. unblemished. एकदम पाकरूह होना. जिसपर किसी के खून के छींटे न हों. किसी की तकलीफ के आँसू न हों. जिसने कभी किसी का बुरा न चाहा हो. किसी गिल्ट का खंजर जिसके जिस्म में न चुभा हो.

तुमने हाथ देखे हैं मेरे. दीज आर ब्लड लाइंस. मैकबेथ में था 'Will all the water in the ocean wash this blood from my hands? No, instead my hands will stain the seas scarlet, turning the green waters red.' रंग. रंग रंग. गहरा लाल. सुनो. तुम्हारे हाथ कांपते तो नहीं न? क्यूंकि अगर आखिरी लम्हे में तुम घबरा गए तो मौत बहुत तकलीफदेह हो जायेगी. मुझे और तकलीफ नहीं चाहिए. मैं ख़त लिख जाउंगी तुम्हारे नाम. जिसमें लिखा होगा कि तुम्हारा इसमें कोई दोष नहीं था. मैंने तुम्हारा माइंडवाश कर दिया है. मैं उसमें टोना टोटका की बातें भी लिख जाउंगी. मुझे डायन ही करार देना. फिर कोई जानना नहीं चाहेगा मेरी आत्मा से रिसते इस काले. गहरे. गाढे. अपराधबोध के बारे में. क्रिस्चियन लोग कहते हैं कि वी आर आल सिनर्स. हम भी तो कहते हैं एक दूसरे को पापी. मगर ये कलयुग है. यहाँ तो ऐसा ही होगा न.

मुझे आजकल बारिशें दिखती हैं बेतहाशा. मेरी आँखों पर बादल छाए रहते हैं. सब कुछ उदास और परेशान कर देने वाला है. इसमें मेरे लिए इतना ख्याल काफी है कि एक दिन इस सबसे मुक्त हो जाना है. जिंदगी में आई डोंट हैव ऐनी अनफिनिश्ड बिजनेस. कुछ अधूरा नहीं रखा है मैंने. यूं एक तरह से तो जिंदगी ख़त्म हो जाती है पूरी नहीं होती. अधूरी ही रहती है हमेशा.

इश्वर तुम्हारे हाथों को महफूज़ रखे.
आमीन. 

Dark as my soul

कह कर जाना नहीं होता. कहने का अर्थ होता है रोक लिया जाना. बहला लिया जाना. समझा दिया जाना. सवालों में बाँध दिया जाना. कन्फर्म नहीं तो कन्फ्यूज कर दिया जाना. जब तक हो रही है बात कोई नहीं जाता है कहीं. यहाँ तक कि ये कहना कि 'मैं मर जाउंगी' इस बात का सूचक है कि कुछ है जो अभी भी उसे रोके रखता है. उसे उम्मीद है कि कोई रोक लेगा उसे. कोई फुसला देगा. कोई कह देगा कोई झूठ. कि रुक जाओ मेरे लिए.

जाना होता है चुपचाप. अपनी आहट तक समेटे हुए. किसी को चुप नींद में सोता छोड़ कर. जाना होता है समझना सिद्धार्थ के मन के कोलाहल को. जाना होता है खुद के अंधेरों में गहरे डूबते जाना और नहीं पाना रोशनी की लकीर को. मुझे आजकल क्यूँ समझ आने लगा है उसका का चुप्पे उठ कर जाना. वे कौन से अँधेरे थे गौतम. वह कौन सा दुःख था. मुझे क्यूँ समझ आने लगा है उसका यूँ चले जाना. मुझे रात का वो शांत पहर क्यूँ दिखता है जब पूरा महल शांत सोया हुआ था. रेशम की चादरें होंगी. दिये का मद्धम प्रकाश होगा. उसने जाते वक़्त यशोधरा को देखा होगा? सोती हुयी यशोधरा के चेहरे पर कैसा भाव होगा? क्या उसे जरा भी आहट नहीं महसूस हुयी होगी? वो कौन से अँधेरे थे. वो कौन से अँधेरे थे. मुझे बताओ.

क्यूँ याद आने लगे हैं थाईलैंड के सोये हुए बुद्ध. स्वर्ण प्रतिमाएं. साठ फीट लम्बी. पैरों के पास से देखो तो चेहरे की मुस्कान नहीं दिखती. इन फैक्ट लोगों को बुद्ध के चेहरे पर जो शांति दिखती है वो मुझे कभी नहीं दिखी. उन्हें उनके सवालों का जवाब मिल गया था. कोई मध्यमार्ग था. उन्होंने कभी अपने बेटे को गोद में लेकर चूमा होगा? किसी लम्हे उनमें पितृभाव जागा होगा? मध्य मार्ग. बुद्धं शरणम गच्छामि. धम्मम शरणम गच्छामि. वाकई. कोई मध्य मार्ग होता है. उसमें तकलीफ कम होती है? वहां रौशनी होती है? या कि हम सबको अपना बोधि वृक्ष स्वयं तलाशना होता है?

मैं आजकल वही ढूंढ रही हूँ. अपना बोधि वृक्ष. अपना धर्म. जिसमें मेरी आस्था हो. आस्था. मैं आजकल खुद से अजीब सवाल करने लगी हूँ. मैं अर्थ ढूँढने लगी हूँ. जीवन का क्या अर्थ है. कोई खूबसूरत चीज़ जब मन में ऐसे गहरे भाव उत्पन्न करती है कि मैं समझने और खुद को व्यक्त करने में अक्षम पाती हूँ तो सवाल वही होता है. इसका क्या अर्थ है. गहरे. और गहरे. चीज़ों को सिर्फ ऊपर ऊपर देख कर संतोष नहीं होता. मुझे जानना होता है कि इनके पीछे कोई गूढ़ मतलब होता है. कुछ ऐसा जो मेरी पकड़ में नहीं आ रहा. रोज की यही जिंदगी. लिखना. पढ़ना. बहस करना. इसके अलावा भी कुछ होना चाहिए जीवन का मकसद. सिर्फ आसमान और सूरज के बारे में लिख कर क्या हासिल होगा. हासिल. हासिल क्या है जिंदगी का. हम जो इतने लोगों से बात करते हैं. मिलते हैं. सब क्या कोई फिल्म है जिसके एंड में सब कुछ सॉर्टेड हो जाएगा. इक लोजिकल एंड होगा. सब चीज़ें अपनी अपनी जगह होंगी. वहां जहाँ उन्हें होना चाहिए. ये मेरा मन शांत क्यूँ नहीं होता.

मुझे समझ में आता है कि ऐसी किसी तलाश के लिए अकेले जाना होता है. मैं जो इतने शोर में चुप होती जा रही हूँ. ये दिखता नहीं है किसी को. मैं डिटैच होती जा रही हूँ. सबके बीच होते हुए भी कहीं और हूँ. ये कौन से पाप हैं. What sins. जिनका प्रायश्चित्त इस जन्म में नहीं हो सकता. कोई मन्त्र होता है? कोई नदी कि जिसका पानी इतना शुद्ध के मन के सारे विकार दूर कर सके. मैं शुद्ध होना चाहती हूँ. मन. प्राण. आत्मा से शुद्ध. मैं एक नया जीवन चाहती हूँ. stripped clean. absolved. forgiven. 

स्वयं से इतनी घृणा कर के जिंदगी जी नहीं जा सकती. ये इक झूठ कहते हैं हम खुद से कि हम बदल सकते हैं खुद को. कुछ नहीं बदलता. हमारा स्वाभाव. हमारे रिएक्शन्स. हमारा इंस्टिंक्ट. मगर फिर मैं ये भी तो सोचती हूँ कि गुलामी खुद की करनी कौन सी अच्छी बात है. और नामुमकिन पर तो मेरा विश्वास नहीं है. इन विरोधाभासों में कैसे जियेंगे जिंदगी. और लोग भी परेशान होते होंगे इतना सोच सोच कर? मुझे आजकल अपनी कोई बात पसंद नहीं आती. अपनी कोई आदत नहीं. इतना सारा अँधेरा है खुद के अन्दर कि मुझे समझ नहीं आता कहाँ से लाऊं चकमक पत्थर और चिंगारी तलाशूँ कोई. मुझे सब लोग खुद से अच्छे दिखते हैं. इक वक़्त आई वाज कम्फर्टेबल विथ नॉट बीईंग गुड. कि सब लोग दुनिया में अच्छे ही हो जायेंगे तो दुनिया कैसे चलेगी. मगर कभी कभी लगता है कि नहीं हो पायेगा. इक सीधी सिंपल जिंदगी क्या बुरी है. ये अँधेरे के दानव मैंने ही पाल रखे हैं अपने अन्दर. शायद इन्हें मुक्त करने का वक़्त आ गया है. 

It's difficult to live with a shattered soul. A bruised heart. A broken thought-process. Every thing is a dead end. After one point, there is no healing. I have bandaged myself so well. I'll slowly disintegrate.

मैं किसी अँधेरी गुफा के डेड एंड पर खड़ी हूँ. मुझे आगे का रास्ता समझ नहीं आता. पीछे लौटने का कोई रास्ता भी नहीं दिखता. मुझे आजकल बहुत से भयानक ख्याल आते हैं. नस काट के मर जाने वाले. कांच से उँगलियाँ काट कर खून रिसता देखने वाले. खून की गंध. मदोन्मत्त करने वाली. जैसे गांजे की गंध होती है. एक बार उस गंध को आप पहचान गए तो उसकी इक फीकी धुएं की लकीर भी आपको दिखने लगेगी. दुःख का ऐसा ही नशा होता है. मर जाने की ऐसी ही कुलबुलाहट. आकुलता. हड़बड़ी. धतूरा. आक के फूल. शिव. तांडव.

प्रेम. विश्वास. जीवन.
सब. टूट चुका है. मेरे ह्रदय की तरह.

17 July, 2015

वो चूम नहीं सकती थी बारिश को. इसलिए उसने इजाद किया इक प्रेमी.

घर में सिगरेट ख़त्म हो गयी थी. मुझे तुम्हारी तलब लगी थी. शहर का मौसम इस कदर शांत था कि तुम्हारा नाम लेती तो ये कांच की दुनिया छन्न्न्न से टूट कर गिर जाती. आसमान में काले बादल थे. मगर चुप. पंछी भटक गए थे रास्ता. जबकि मैंने उनके पैरों में तुम तक पहुँचने वाले ख़त नहीं बांधे थे. किसी चौराहे पर पूछते वे किसी पेड़ से तुम्हारे दिल का पता मगर जाने किसने तो निषिद्ध कर रखा था तुम्हारा नाम. 

पौधों को भी समझ आती है तुम्हारे नाम की लय. वे खिलते हैं अमलतास की तरह. के पूरा शहर पागल हो जाता है उनके खुमार में. मैं नींद में बुदबुदाती हूँ तुम्हारा नाम.

मुझे लिखना है तुम्हारा नाम...जैसे कोई करता है इबादत. मगर तुम्हारी आँखों का रंग है सियाह. तुम्हारे पीछे चलता है काली रौशनी का चक्र. उसमें देखने वाले भूल जाते हैं खुद को. अपनी जिंदगी के किसी भी मकसद को. काले कागज़ पर चमकता है रक्त. तुम्हारे नाम को लिखती हूँ तो कांपती है धरती. आते हैं भूकंप. किसी दूसरी दुनिया में मर जाते हैं बहुत सारे लोग. ज़मींदोज़ हो जाता है तुम्हारी प्रेमिकाओं का शहर. मेरी हंसी से बनती जाती है जहन्नुम तक इक वर्टिकल टनेल. जैसे तुम्हारे सीने की टूटी हुयी दरार में हूक कोई. मैं लिखती जाती हूँ तुम्हारा नाम. 

कागज़ को रोल करती हूँ. होठों से लगाती हूँ तुम्हारा सुलगता हुआ नाम. उन्माद है कोई. होठों पर सिसकियाँ लिए आता है. दांतों तले भींचती हूँ होठ. बंद करती हूँ आँखें. लेती हूँ बहुत गहरी सांस. तुम बेचैन हो उठते हो. बारिशों में घुल जाता है तुम्हारे शहर का ऑक्सीजन. नमकीन बारिशें. 

तुम अंधेरों की नाजायज़ औलाद हो कि अँधेरे तुम्हारी? 

पन्ने पलटते हुए आता है कहानी का स्वाद. उँगलियों की पोर में तुम्हारा स्वाद. इसलिए मैं नहीं पढ़ती बहुत सी किताबें. तुम्हें किताबों से डर लगता है? मेरे सिरहाने रखे थे धर्मग्रन्थ. मगर फिर मेरा विश्वास टूट गया इश्वर में. तकिये के नीचे रखा है इक तेज़ धार वाला चाकू. इससे बुरे सपने नहीं आते. मैं इसलिए अपने तकिये पर नहीं सोती. मुझे बुरे सपनों से परहेज़ नहीं है. जिन लोगों को लगता है अपनी मृत्यु वाले सपने बुरे हैं उन्होंने नहीं चखी है तुम्हारी आवाज़ की धार. तुम्हें छूना आत्महंता होने की दिशा में पहला कदम था. 

कुछ चीज़ें मेरी जिंदगी में कभी नहीं हो सकतीं. जैसे मैं बेतरह पी कर भी आउट नहीं हो सकती. अगर मैं कहूं कि मैं मर जाउंगी तो भी तुम ब्लैक शर्ट पहनना बंद नहीं कर सकते. बारिश में सिगरेट नहीं पी जा सकती. बारिश को चूमा नहीं जा सकता इसलिए इजाद करना पड़ता है इक प्रेमी का. हम सिगरेट शेयर नहीं कर सकते इसलिए रकीब बाँट लेते हैं आपस में.

इक कप ग्रीन टी ख़त्म हो गयी है. उलझन में गर्म पानी उसी उदास टी बैग में डाल चुकी हूँ. यूं भी प्रेमिकाओं के हिस्से कम ही आता है प्यार. उदास. फीका. किसी के टुकड़े ही तलाशते हो न. आँखें. जिस्म का कटाव. हंसी की खनक. देखने का अंदाज़. कितना कुछ किसी और के हिस्से का होता है. फिर भी. कोई लड़की होती है. अधूरी. टूटी फूटी. बिलख बिलख के माँगती है मुझसे. तुम्हारा बासी प्यार. तुम्हारी महक. तुम्हारी कलम से लिखा तुम्हारी पहली प्रेमिका का नाम. तुम मेरे होते तो लौटा भी देती. शायद.

मेरी कलम से रिस रिस कर बहते हो तुम. किसी का गला रेत देने के बाद की खींची हुयी सांसें. जो खून और हवा में मिली जुली होती हैं. मैं सीखना चाहती हूँ पत्थरों की कारीगरी. किसी टूटे हुए महल के गिरे हुए पत्थरों पर चुप जा के तराश देना चाहती हूँ तुम्हारा नाम. 

हो सके तो मेरे अनगढ़पने को माफ़ कर देना.
मुझे लिखना नहीं आता. प्रेम करना भी.

14 July, 2015

दफ़ा तीन सौ दो...सज़ा-ए-मौत


लेखक की हत्या करना बहुत मुश्किल कार्य है. खास तौर से उस लेखक की जो अपने ही मन के अन्दर रहता हो कहीं. ये बहुत जीवट प्राणी होता है. रक्तबीज की तरह. एक तरफ से मारो तो हज़ार तरफ से जिन्दा हो उठता है. कहानियों से ख़त्म करो तो कविता में उगने लगे...कविता से नामोनिशां मिटाओ तो उपन्यास का कोई किरदार बन कर दिन रात साथ रहने लगे...के लेखक के छुपने के कई ख़ुफ़िया ठिकाने हैं...दो धड़कन के बीच के अंतराल में...किसी मित्र के टूटे हुए दिल के सुबकते हुए किस्से में...बच्चों के खेल में...स्त्रियों की चुगली में...बूढों के अबोले इंतज़ार में. अन्दर का लेखक हुमक हुमक के दौड़ता है. कहता है. सुनता है. इक अदृश्य डायरी लिए चलता है लेखक. सब कुछ लिख जाने के लिए. उसकी अदृश्य कलम चलती है तो रंग. गंध. स्पर्श. सब रह जाता है.

पर किसी भी ऐसे कदम के पहले सवाल करना होगा कि 'आखिर क्यूँ किया जाए क़त्ल...' कोर्ट भी आखिर पहला सवाल यही करता है कि क़त्ल के पीछे मोटिव क्या है. अगर कोई स्ट्रोंग मोटिव न हो तो इतनी मुश्किल काम के लिए खुद को मोटिवेट करना बहुत मुश्किल हो जाता है. और जनाब, मोटिवेशन की जरूरत यहाँ चप्पे चप्पे पर पड़ती है. लेखक से रूबरू हुए बिना यहाँ सांस लेना मुहाल है. जिन लम्हों में आप किसी और के बारे में नहीं सोच सकते वहां भी लेखक अपनी मौजूदगी की दस्तक दिए रखता है.

उसे हज़ार तालों में बंद कर दें तो दस हज़ार चाबियाँ पैदा हो जाती हैं. डैन्डेलियन की तरह दूर दूर तक उड़ते रहते हैं फाहे. लेखक एक बहुत ही खुराफाती जीव होता है. और बहुत शक्तिशाली भी. उसकी ऊर्जा से इक और दुनिया बनने लगती है जो इस दुनिया के ठीक विपरीत होती है. सच की दुनिया और उस मायावी दुनिया के बीच रस्साकशी होने लगती है. इन दोनों दुनियाओं के ठीक बीच होता है वह व्यक्ति जिसके अन्दर लेखक पनाह पाता है. ये दोनों दुनियाएं उसे विपरीत दिशाओं में खींचती हैं. असल की दुनिया अगर वफ़ा का पाठ पढ़ाती है तो लेखक बेवफाई के कसीदे काढ़ता है. इस दुनिया को अगर प्रेम के अंत में दोनों प्रेमियों का एक साथ हो जाना पसंद है तो लेखक को विरह का अनंत दुःख पसंद आता है. दुनिया संस्कारों की दुहाई देती है, लेखक आज़ादी का परचम फहराता है कुछ इस तरह कि हर रिवाज़ को ठोकर मारता है और इन्कलाब की काली पट्टी बांधे घूमता है उम्र भर. इस दुनिया में मित्रों के लिए पैमाने होते हैं...कोई चीज़ कॉमन होनी चाहिए. शौक़. उम्र. मिजाज़. परिवेश. लेखक आपको एकदम रैंडम लोगों के बीच फेंकने के लिए कुल्बुलायेगा. आप अपने आप को अनजान देशों में अजनबियों की संगत में पायेंगे. इस दुनिया में व्यक्ति चैन चाहता है. शांति चाहता है. लेखक लेकिन बेचैनी चाहता है. अशांति मांगता है. उसकी दुआओं में दंगे होते हैं. बिगडैल बच्चे होते हैं. जिंदगी जहन्नम होती है.

लेखक को हर जगह ऐसी चीज़ें दिखती हैं जो आम लोगों ने इग्नोर कर रखी हैं कि वे एक नार्मल जिंदगी जी सकें. अब इश्क़ को ही ले लीजिये. आखिर क्या कारण है कि हिंदी वर्णमाला में ल के बाद व आता है. बचपन से ही हम यर लव पढ़ते हैं. अब यार ऐसे में लव होना चाहिए ये कहेगा लेखक. 

ऐसी तमाम और चीज़ें हैं जो जीना मुहाल किये रखती हैं. लेखक के लिए ये दुनिया काफी नहीं पड़ती. यहाँ चाँद कम है. धूप कम है. इश्क़ कम है. दर्द कम है. और ख़ुशी तो बस. छटांक भर मिलती है. लेखक दुनिया की हर चीज़ को अपने हिसाब से बढ़ा-घटा कर इक ऐसे अनुपात में ले आता है जहाँ दुनिया होती तो है लेकिन क्षणभंगुर. मगर चूँकि उस दुनिया का वजूद बहुत कम वक़्त के लिए होता है तो उसकी हर चीज़ में इक मायावी ऊर्जा होती है. उस दुनिया का आकर्षण जब खींचता है तो इस दुनिया का कोई भी नियम उसपर लागू नहीं होता. सिर्फ 'गॉड' पार्टिकल नहीं होता. पूरी दुनिया हो जाती है उस एक लम्हे में दर्ज. इस तरह की अनगिन दुनियाएं जो टूटती रहती हैं तो उनका चूरा इकठ्ठा होते जाता है. आँखों में. उँगलियों की पोरों में. कलम की निब में. ये कचरा जहरीला होता है...इसके रेडियेशन से प्राण जाने का खतरा नहीं होता लेकिन इस जरा जरा से चूरे के कारण व्यक्ति का खिंचाव दूसरी दुनिया की तरफ बढ़ता जाता है. इक रोज़ ऐसा भी आता है कि वे इस दुनिया को पूरी तरह त्याग कर दूसरी दुनिया में चले जाते हैं. ऐसे लोगों को इस दुनिया में 'पागल' कहा जाता है. उनका संक्रमण और लोगों तक न फैले इसलिए दुनिया उन्हें खास तौर से आइसोलेट करके बनाए घरों में रखती है जिन्हें यूँ तो पागलखाना कहा जाता है मगर ये जगह ऐसी मायावी होती है कि कई और नामों से जानी जा सकती है जैसे कि पार्लियामेंट, चकलाघर, कॉलेज, कॉफ़ीहाउस इत्यादि. जहाँ पागलों का जमघट लग गया वो जगह अघोषित पागलखाना हो जाती है. कई बार ऐसी जगहों ने आंदोलनों को जन्म दिया है जिनसे इस दुनिया के लोगों में विरक्ति उत्पन्न हो गयी है और वे लेमुरों की तरह मंत्रबद्ध किसी ऊंची खाड़ी से आत्महत्या की छलांग लगाने को तत्पर हो गए हैं. 

लेखक ने सच को ओब्सोलीट और आउटडेटेड करार दे दिया है. 

जिस चीज़ के बारे में ठीक ठीक जानकारी न हो ये खतरनाक होती है ऐसा इतिहास ने बार बार सिद्ध किया है. लेखकों के ऊपर कुछ प्रमाणिक दस्तावेज खुद उनकी कलम से मिले हैं. जैसे कि मंटो साहब कह गए हैं के उनके मन में ख्याल उठता रहा है कि 'वो ज्यादा बड़ा अफसानानिगार है या खुदा'. गौरतलब है कि ये बात स्वयं मंटो ने अपनी कब्र का पत्थर चुनते हुए कही थी. 

यूँ अधिकतर लेखक खुद ही आत्महत्या कर के जान दे देते हैं. मगर जब ऐसा नहीं होता है तो उनकी सुनियोजित तरीके से हत्या जरूरी है ताकि दुनिया वैसी ही रहे जैसी कि इसे होनी चाहिए. उनके जीने के लिए दुनिया कभी काफी नहीं पड़ती. न इश्क़. न दर्द. न सुख. वे हमेशा उस 'डेल्टा' एक्स्ट्रा के चक्कर में मौजूदा चीज़ों के स्टेटस-को को चैलेन्ज करने चल देंगे. अक्सर सोचे बिना कि इसका हासिल क्या होगा. उन्हें जरा सी और मुहब्बत चाहिए होती है. जरा सी और बेवफाई. जरा से और दुःख. जरा सा और सुख. जितना कि उनकी नियति में लिखा है. इस जरा से के लिए वे एक जेब में कलम तो दूसरी जेब में माचिस लिए घूमते हैं कि दुनिया को आग लगा देंगे. इन्हें समझाने के तरीके तो कारगर नहीं होते इनके इर्द गिर्द के लोगों का जीना जहन्नुम बना होता है. लेखक एक बेहद सेल्फिश जीव होता है. सिंगल फोकस वाला. उसके लिए सब कुछ क्षम्य है. दुनिया के घृणित से घृणित अपराध तक. उसके लिए दुनिया महज़ एक रफ नोटबुक है. जिंदगी एक एक्सपेरिमेंट.

जिंदगी की लाइव फीड में स्पेशल इफ़ेक्ट की चलती फिरती दुकान हैं. इनके लिए जिंदगी में कुछ भी बाहर से नहीं आता...भीतर से आता है. मन के गहराई भरी परतों से. उनके अन्दर इतने भाव भरे होते है कि वे किसी चीज़ को साधारण तरीके से देख नहीं सकते. उनके लिए जिंदगी के तमाम रंग ज्यादा चटख हैं...तमाम दुःख ज्यादा असहनीय और तमाम खुशियाँ इस बेतरह कि बस जान दे दी जाये. जान देने से कम किसी चीज़ पर इनका यकीन नहीं होता. 

इक वक़्त ऐसा आता है कि ये मन के अन्दर पैठा हुआ लेखक जिंदगी को बेहद दुरूह और मौत को बेहद आकर्षक बना देता है. इसके पहले कि व्यक्ति किसी हंगेरियन सुसाइड गीत को सुनते हुए मरने की प्लानिंग कर ले...अपने अन्दर के इस लेखक को दफना के देखना चाहिए कि जिंदगी जीने लायक है या नहीं.

जरा कम उदास. जरा कम खुश. जरा कम तकलीफ. जरा कम जिंदा. मगर जरा से बचे रहने की कवायद में मैं अपने अन्दर के इस लेखक के लिए सजाये मौत की सज़ा मुकरर्र करती हूँ. इसे इक ताबूत में बंद कर गंगा की दलदली मिट्टी में दफनाती हूँ के अगर सांसें बची रह गयी हों तो गंगा का रिस रिस पानी भरता जाए ताबूत में. इक इक सांस को तरस कर मरे...कि ट्रेजेडी के प्रति उसके असीम प्रेम को देखते हुए साधारण मौत कम लगती है. 

कब्र के पत्थर पर की कविता लिखे इश्क़ और इस लेखक की मौत में शामिल होने के अपराधबोध से ग्रस्त हो कर गंगा में कूद कर आत्महत्या कर ले.

[ ज़िन्दगी टेक वन.
एक्शन. ]

06 July, 2015

वसीयत





इक रोज़. मैं नहीं रहूंगी.
उस रोज़. इक सादे कागज़ पर. बस इतना लिख देना.
तुमने मुझे माफ़ कर दिया है.

 
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दुनिया का कोई कोरा कोना तलाश कर उसमें रख देना मेरे हिस्से के दुःख. मेरे न होने का खालीपन. उदास नदियों से माँग लाना पानी और धुल देना मेरे ख़त. उन खतों में लिखा होगा बहुत सा प्रेम. तुमने नहीं सुने होंगे मेरी पसंद के गीत. उस दिन खोलना मेरा लैपटॉप और प्लेलिस्ट में देखना मोस्ट प्लेड की लिस्ट. सुनना लगातार उन गीतों को जिन्होंने कई कई शामों तक मुझे बहलाए रखा था कि मैं जान न दे दूं. वे गीत तुम्हें पागलपन की कगार से बचा लायेंगे. मृत्यु की कगार से भी.

फोन में होगा स्टार्रेड कांटेक्ट लिस्ट. उन्हें करना फोन. वे अपने अपने हिस्से का मेरा हिस्सा सुनायेंगे तुम्हें. मेरे कॉलेज के टाइम की मुस्कान. मेरी स्कूल के दिनों की शैतानियाँ. मेरे अवसाद के दिनों के आत्मघाती तरीके. मेरे बाद मेरे सारे दोस्त हो जायेंगे तुम्हारे बेस्ट फ्रेंड. वे तुम्हारे नाम बांधेंगे अनजान मजारों पर मन्नतों का धागा. वे दुआओं में मांगेंगे तुम्हारे लिए कई जन्मों की खुशियाँ. वे करेंगे तुमसे वादा कि जहन्नुम में तुम्हें अपने गैंग का हिस्सा बनायेंगे. अपनी फेसबुक पोस्ट में वे तुम्हें टैग करेंगे जाने कितने सफ़र के दरम्यान. वे तुम्हें भेजेंगे अनजान देशों से पोस्टकार्ड...कई सारे स्टैम्प मिलेंगे तुम्हें. सब सहेजना एक एक कर के. दुनिया के सबसे पागल. खूबसूरत. दिलकश लोग हैं वे. जो कि मेरी लिस्ट में रहते हैं.

मेरे बैग में टंगा होगा कोई गहरे लाल रंग का स्टोल...उसे खोल देना. जाने कितने शहरों की खुशबू बसी होगी उसमें. कितना इतर. कितने मौसम बंधे होंगे रेशम के उस जरा से टुकड़े में. टेबल पर मेरी इंकपॉट्स भी तो होंगी. उन्हें इसी स्टोल में बांध देना. इस सियाही को बचा बचा कर इस्तेमाल करना. इनसे जो भी लिखोगे उसमें मेरी अदा घुलने लगेगी. मेरे किरदार. मेरी अधूरी कहानियां. वो नाम जो मैंने अपने बच्चों के लिए सोचे थे.

खोलना मेरी डायरी. आखिरी एंट्री में लिखा होगा तुम्हारा ही नाम. मैं हर दिन यूँ ही जीती हूँ कि जैसे आखिरी हो. मेरी हर सांस में तुम्हारा होना है. मेरी हर धड़कन अनियंत्रित होती है सिर्फ तुम्हारे नाम से. उस दिन पढ़ना मुझे. उस दिन जानना. उस दिन समझना. उस दिन यकीन कर लेना. इक पहली और आखिरी बार. तुम मेरे प्राण में बसे हो. हमेशा. हमेशा. 

विस्मृत कहानियों से माँग लाना मेरी पहचान. मेरी कविताओं में मिलेगा मेरी गुनगुनाहट का कतरा कोई. बेजान तस्वीरों के पीछे छुपी होगी मेरी आँखें. धुएं और धुंध में डूबी. जरा जरा इश्क़ में भी. 

सब कुछ तलाश लाओगे फिर भी कुछ अधूरा सा रहेगा. जान. उस दिन तलाशना अपनी रूह के अन्दर मेरे होने के निशां...किसी ज़ख्म में...किसी सिसकी में...तकलीफों के रूदन में बचा होगा जरा सा मेरा होना...सब इकठ्ठा करना जरा जरा. फिर भी नहीं पूरी हो पाऊँगी मैं...क्यूंकि तुम, मेरी जान...समझ नहीं पाओगे...मेरे होने का सबसे जरूरी हिस्सा...मेरा दिल...तुम्हारे दिल के किसी भीतरी कोने में रखा होगा. अपने अन्दर से तलाशना मुझे. फिर रख देना चिंदी चिंदी कर लायी गयी मेरी सारी निशानियों में.

मैं पूरी हो जाउंगी. उतनी कि जितनी अपने जीते जी नहीं थी कभी.

03 July, 2015

उन खतों का मुकम्मल पता रकीब की मज़ार है


क्या मिला उसका क़त्ल कर के? औरत रोती है और माथा पटकती है उस मज़ार पर. लोग कहते हैं पागल है. इश्क़ जैसी छोटी चीज़ कभी कभी पूरी जिंदगी पर भारी पड़ जाती है. अपने रकीब की मज़ार पर वह फूल रखती...उसकी पसंद की अगरबत्तियां जलाती...नीली सियाहियों की शीशियाँ लाती हर महीने में एक और आँसुओं से धुलता जाता कब्र का नीला पत्थर.
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शाम के रंग और विस्कियों के नशे वाले ख़त तुझे नहीं लिखे गए हैं लड़की. तुम किस दुनिया में रहती हो आजकल? उसकी दुनिया में हैं तितलियाँ और इन्द्रधनुष. उसकी दुनिया में हैं ज़मीन से आसमान तक फूलों के बाग़ कि जिनमें साल भर वसंत ही रहता है. वहां खिलते हैं नीले रंग के असंख्य फूल. उस लड़की की आँखों का रंग है आसमानी. तुम भूलो उस दुनिया को. गलती से भी नहीं पहुंचेगा तुम्हारे पास उसका भेजा ख़त कोई...कोई नहीं बुलाएगा तुम्हें रूहों के उस मेले में...तुम अब भी जिन्दा हो मेरी जान...इश्क़ में मिट जाना बाकी है अभी.
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हूक समझती हो? फणीश्वर नाथ रेणु की कहानियां पढ़ो. समझ आएगी हूक. उसके घर के पास वाले नीम की निम्बोलियां जुबां पर रखो. तीते के बाद मीठा लगेगा. वो इंतज़ार है. हूक. उसकी आवाज़ का एक टुकड़ा है हूक. हाराकीरी. उससे इश्क़. क्यूँ. सीखो कोई और भाषा. कि जिसमें इंतज़ार का शब्द इंतज़ार से गाढ़ा हो. ठीक ठीक बयान कर सके तुम्हारे दिल का हाल.
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क्यूँ बनाये हैं ऐसे दोस्त? मौत की हद से वापस खींच लायें तुम्हें. उन्हें समझना चाहिए तुम्हारे दिल का हाल. उन्हें ला के देना चाहिए तुम्हें ऐसा जहर जिससे मरने में आसानी हो. ऐसा कुछ बना है क्या कि जिससे जीने में आसानी हो? नहीं न? यूँ भी तो 'इश्क एक 'मीर' भारी पत्थर है, कब दिले नातवां से उठता है.'.
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तुम ऐसा करो इश्क़ का इक सिम्प्लीफाईड करिकुलम तैयार कर दो. कुछ ऐसा जो नौर्मल लोगों को समझ में आये. तुम्हारी जिंदगी का कुछ तो हासिल हो? तुम्हें नहीं बनवानी है अपनी कब्र. हाँ. तुम्हें जलाने के बाद बहा दिया जाएगा गंगा में तुम्हारी अस्थियों को. मर जाने से मुक्ति मिल जाती है क्या? तुम वाकई यकीन करती हो इस बात पर कि कोई दूसरी दुनिया नहीं होती? कोई दूसरा जन्म नहीं होता? फिर तुम अपने महबूब की इक ज़रा आवाज़ को सहेजने के लिए चली क्यूँ नहीं जाती पंद्रह समंदर, चौहत्तर पहाड़ ऊपर. तुम बाँध क्यों नहीं लेती उसकी आवाज़ का कतरा अपने गले में ताबीज़ की तरह...तुम क्यूँ नहीं गुनगुनाती उसका नाम कि जैसे इक जिंदगी की रामनामी यही है...तुम्हारी मुक्ति इसी में है मेरी जान.
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तुमने कैसे किया उसका क़त्ल? मुझे बताओ न? क्या तुमने उसे एक एक सांस के लिए तड़पा तड़पा के मारा? या कि कोई ज़हर खिला कर शांत मृत्यु? बताओ न?
प्रेम से?
तुमने उसका क़त्ल प्रेम से किया?
प्रेम से कैसे कर सकते हैं किसी का क़त्ल?
छोटी रेखा के सामने बड़ी रेखा खींच कर?
तुम्हें लगता है वो मान गयी कि तुम ज्यादा प्रेम कर सकती हो?
क्या होता है ज्यादा प्रेम?
कहाँ है पैरामीटर्स? कौन बताता है कि कितना गहरा, विशाल या कि गाढ़ा है प्रेम?
सुनो लड़की.
तुम्हें मर जाना चाहिए.
जल्द ही. 

02 June, 2015

Unkiss me...Untouch me... Untake this heart...

हमारे कमरों में एक सियाह उदासी थी. इक पेचीदा सियाह उदासी जिसकी गिरहें खोलना हमें नहीं आता था. हम देर तक बस ये महसूस करते कि हम दोनों हैं. साथ साथ. ये साथ होना हमें सुकून देता था कि हम अकेले नहीं हैं.

हमें एक दूसरे की शिनाख्त करनी चाहिए थी मगर हम सिर्फ गिरहों को छू कर देखते थे. फिर एक दिन हमें पता चला कि वे गिरहें हमें एक दूसरे से बांधे रखती हैं. फिर हमें छटपटाहट होने लगी कि हम इस गिरह से छूट भागना चाहते थे.

नींद और भोर के बीच रात थी. रात और सियाह के बीच एक बाईक के स्टार्ट होने की आवाज़. वो लड़का कहाँ जाता था इतनी देर रात को. किससे मिलने? और इतने खुलेआम किसी से मिलने क्यूँ जाता था कि पूरा महल्ला न केवल जानता बल्कि कोसने भी भेजता था उस लड़की को...रात के इतने बजे सिर्फ गुज़रती ट्रेन की आवाज़ सुनने तो नहीं जा सकता कोई. 

कौन था वो लड़का. उदासी पर बाईक की हेडलाईट चमकाता. मैं सोचती कि खोल लूं इक गिरह और जरा देर को मुस्कुराहटों का सूरज देख आऊँ. हमें उदासी और अंधेरों की आदत हो गयी थी. हम अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर नहीं जाना चाहते थे. मैं बस थी. वो बस था. इसके आगे कुछ होना समझ नहीं आता था. 

बात इन दिनों की है जब मैं लिखना भूल चुकी हूँ. मैं बस जानना चाहती हूँ कि तुम्हें मेरे ख़त मिले या नहीं. वो मेरे आखिरी ख़त थे. उन्हें लिखने के बाद मेरे पास सियाही नहीं बची है. शब्द नहीं बचे हैं. कुछ कहने को बचा ही नहीं है. सच तो कुछ नहीं है न दोस्त...सच तो मेरा खोना भी है...मर जाना भी है... फिर सब कुछ कहानी ही है. 

तुम समझ नहीं रहे हो...

मुझे तुम्हें बताना नहीं चाहिए था कि तुम मेरे लिए जरूरी हो. ऐसा करना मुझे तकलीफ देता है. मैंने सिल रखी हैं अपनी उँगलियाँ कि वे तुम्हारा नंबर न डायल कर दें. मेरे लैपटॉप पर अब नहीं चमकती तुम्हारी तस्वीर. 

अगर मर जाने का कोई मौसम है तो ये है. 

फिर भी. फिर भी. तुम्हें मालूम नहीं होना चाहिए कि कोई अपनी जागती साँसों में तुम्हें बसाए रखता है. 

घर पर लोगों ने मुझे डांटा. मैं खुमार में बोलती चली गयी थी कि मैं मंदिर गयी हूँ और मैंने भगवान् से यही माँगा कि मुझे अब मर जाना है. कि मुझे अब बुला लो. मुझे अब कुछ और नहीं चाहिए. लोग मेरे बूढ़े होने की बात कर रहे थे...मैंने कहा उनसे...मैं इतनी लम्बी जिंदगी नहीं जियूंगी. मैं उन्हें समझा नहीं सकती कि मुझे क्यों नहीं जीना है बहुत सी जिंदगी. मैं भर गयी हूँ. पूरी पूरी. अब मैं रीत जाना चाहती हूँ. 

सुनो. मेरी कहानियों में तुम्हारा नाम मिले तो मुझे माफ़ कर देना. मैं आजकल अपना नाम भूल गयी हूँ और मुझे लगा कि तुमपर न सही तुम्हारे नाम पर मेरा अधिकार है इसलिए इस्तेमाल कर लिया. तुम्हारे होने के किसी पहलू को मैं जी नहीं सकती. 

मैं तुम्हें जीना चाहती हूँ. लम्स दर लम्स. जब मेरा मोह टूटता है ठीक उसी लम्हे मैं दो चीज़ें चाहती हूँ. मर जाना. जो कि सिम्पल सा है. दूसरा. तुम्हारे साथ एक पूरा दिन. एक पूरी रात. तुम्हारी खुलती आँखों की नींद में मुझे देखनी है चौंक....और फिर ख़ुशी. मैं तुम्हें बेतरह खुश देखना चाहती हूँ. मैं देखना चाहती हूँ कि तुम ठहाके लगाते हो क्या. तुम्हारी मुस्कान की पदचाप कोहरे की तरह भीनी है. ये लिखते हुए मेरे कानों में तुम्हारी आवाज़ गूँज रही है 'तुम्हें चूम लूं क्या' मैं सोचती हूँ कि लोगों को लिप रीड करना आता होगा तो क्या वे जान पायेंगे कि तुमने मुझे क्या कहा था. 

सब झूठ था क्या? वाकई. मेरी कहानियों जैसा? तुम जैसा. मुझ जैसा. मैं तुमसे कोई शिकायत नहीं करना चाहती हूँ. सुनो. तुम्हारी आवाज़ क्यूँ है ऐसी कि याद में भी खंज़र चुभाती जाए. इक बार मेरा नाम लो न. इक बार. तकलीफें छुट्टी पर नहीं जातीं. मुहब्बत ख़त्म नहीं होती. जानां...इक बार बताओ...इश्क़ है क्या मुझे तुमसे? और तुम्हें? नहीं न? हम दोनों को नहीं न...कहो न? मैं तुम्हारी बात मान लूंगी. 

अब. इसके पहले कि जिंदगी का कोई मकसद मुझे अपनी गिरफ्त में ले ले. मर जाना चाहती हूँ.

(पोस्ट का टाइटल फ्रैंक सर की वाल से...इस गीत से...)

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