01 August, 2014

पगला गए होंगे जो ऐसा हरपट्टी किरदार सब लिखे हैं

मेरी बनायी दुनिया में आजकल हड़ताल चल रही है. मेरे सारे किरदार कहीं और चले गए हैं. कभी किसी फिल्म को देखते हुए मिलते हैं...कभी किसी किताब को पढ़ते हुए कविता की दो पंक्तियों के पीछे लुका छिपी खेलते हुए. कसम से, मैंने ऐसे गैर जिम्मेदार किरदार कहीं और नहीं देखे. जब मुझे उनकी जरूरत है तभी उनके नखरे चालू हुए बैठे हैं. बाकी किरदारों का तो चलो फिर भी समझ आता है...कौन नहीं चाहता कि उनका रोल थोड़ा लम्बा लिखा जाए मगर ऐसी टुच्ची हरकत जब कहानी के मुख्य किरदार करते हैं तो थप्पड़ मारने का मन करता है उनको...मैं आजकल बहुत वायलेंट हो गयी हूँ. किसी दिन एक ऐसी कहानी लिखनी है जिसमें सारे बस एक दूसरे की पिटाई ही करते रहें सारे वक़्त...इसका कोई ख़ास कारण न हो, बस उनका मूड खराब हो तो चालू हो जाएँ...मूड अच्छा हो तो कुटम्मस कर दें. इसी काबिल हैं ये कमबख्त. मैं खामखा इनके किरदार पर इतनी मेहनत कर रही हूँ...किसी काबिल ही नहीं हैं.

सोचो, अभी जब मुझे तुम्हारी जरूरत है तुम कहाँ फिरंट हो जी? ये कोई छुट्टी मनाने का टाइम है? मैंने कहा था न कि अगस्त तक सारी छुट्टियाँ कैंसिल...फिर ये क्या नया ड्रामा शुरू हुआ है. अरे गंगा में बाढ़ आएगी तो क्या उसमें डूब मरोगे? मैं अपनी हिरोइन के लिए फिर इतनी मेहनत करके तुम्हारा क्लोन बनाऊं...और कोई काम धंधा नहीं है मुझे...हैं...बताओ. चल देते हो टप्पर पारने. अपनाप को बड़का होशियार समझते हो. चुप चाप से सामने बैठो और हम जो डायलाग दे रहे हैं, भले आदमी की तरह बको...अगले चैप्टर में टांग तोड़ देंगे नहीं तो तुम्हारा फिर आधी किताब में पलस्तर लिए घूमते रहना, बहुत शौक़ पाले हो मैराथन दौड़ने का. मत भूलो, तुम्हारी जिंदगी में मेरे सिवा कोई और ईश्वर नहीं है...नहीं...जिस लड़की से तुम प्यार करते हो वो भी नहीं. वो भी मेरा रचा हुआ किरदार है...मेरा दिल करेगा मैं उसके प्रेम से बड़ी उसकी महत्वाकांक्षाएं रख दूँगी और वो तुम्हारी अंगूठी उतार कर पेरिस के किसी चिल्लर डिस्ट्रिक्ट में आर्ट की जरूरत समझने के लिए बैग पैक करके निकल जायेगी. तुम अपनी रेगुलर नौकरी से रिजाइन करने का सपना ही देखते रह जाना. वैसे भी तुम्हारी प्रेमिका एक जेब में रेजिग्नेशन लेटर लिए घूमती है. प्रेमपत्र बाद में लिखना सीखा उसने, रेजिग्नेशन लेटर लिखना पहले.

कौन सी किताब में पढ़ के आये हो कि मैंने तुम्हें लिखा है तो मुझे तुमसे प्यार नहीं हो सकता? पहले उस किताब में आग लगाते हैं. तुमको क्या लगता है, हीरो तुम ऐसे ही बन गए हो. अरे जिंदगी में आये बेहतरीन लोगों की विलक्षणता जरा जरा सी डाली है तुममें...तुम बस एक जिगसा पजल हो जब तक मैं तुममें प्राण नहीं फूँक देती...एक चिल्लर कोलाज. तुम्हें क्या लगता है ये जो परफ्यूम तुम लगाते हो, इस मेकर को मैंने खुद पैदा किया है? नहीं...ये उस लड़के की देहगंध से उभरा है जिसकी सूक्ष्म प्लानिंग की मैं कायल हूँ. शहर की लोड शेडिंग का सारा रूटीन उसके दिमाग में छपा रहता था...एक रोज पार्टी में कितने सारे लोग थे...सब अपनी अपनी गॉसिप में व्यस्त...इन सबके बीच ठीक दो मिनट के लिए जब लाईट गयी और जेनरेटर चालू नहीं हुआ था...उस आपाधापी और अँधेरे में उसने मुझे उतने लोगों के बावजूद बांहों में भर कर चूम लिया था...मुझे सिर्फ उसकी गंध याद रही थी...इर्द गिर्द के शोर में भोज के हर पकवान की गंध मिलीजुली थी मगर उस एक लम्हे उसके आफ्टरशेव की गंध...और उसके जाने के बाद उँगलियों में नीम्बू की गीली सी महक रह गयी थी, जैसे चाय बनाते हुए पत्तियां मसल दी हों चुटकियों में लेकर...कई बार मुझे लगता रहा था कि मुझे धोखा हुआ है...कि सरे महफ़िल मुझे चक्कर आया होगा...कि कोई इतना धीठ और इतना बहादुर नहीं हो सकता...मगर फिर मैंने उसकी ओर देखा था तो उसकी आँखों में जरा सी मेरी खुशबू बाकी दिखी थी. मुझे महसूस हुआ था कि सब कुछ सच था. मेरी कहानियों में लिखे किरदार से भी ज्यादा सच.

गुंडागर्दी कम करो, समझे...हम मूड में आ गए तो तीया पांचा कर देंगे तुम्हारा. अच्छे खासे हीरो से साइडकिक बना देंगे तुमको उठा के. सब काम तुम ही करोगे तो विलेन क्या अचार डालेगा?अपने औकात में रहो. ख़तम कैरेक्टर है जी तुमरा...लेकिन दोष किसको दें, सब तो अपने किया धरा है. सब बोल रहा था कि तुमको बेसी माथा पर नहीं चढ़ाएं लेकिन हमको तो भूत सवार था...सब कुछ तुम्हारी मर्जी का...अरे जिंदगी ऐसी नहीं होती तो कहानी ऐसे कैसे होगी. कल से अगस्त शुरू हो रहा है, समझे...चुपचाप से इमानदार हीरो की तरह साढ़े नौ बजे कागज़ पर रिपोर्ट करना. मूड अच्छा रहा तो हैप्पी एंडिंग वाली कहानी लिख देंगे. ठीक है. चलो चलो बेसी मस्का मत मारो. टेक केयर. बाय. यस आई नो यू लव मी...गुडनाईट फिर. कल मिलते हैं. लेट मत करना.

30 July, 2014

Je t'aime जानेमन


लड़की ने आजकल चश्मे के बिना दुनिया देखनी शुरू कर दी है जरा जरा सी. यूँ पहले पॉवर बहुत कम होने के कारण उसे चश्मा लगाने की आदत नहीं थी मगर जब से दिल्ली में गलत पॉवर लगी और माइनस टू पर पॉवर टिकी है उसका बिना चश्मे के काम नहीं चलता. यूँ भी चश्मा पहनना एक आदत ही है. जानते हुए भी कि हमें सब कुछ नहीं दिख सकता. मायोपिक लोगों को तो और भी ज्यादा मुश्किल है...आधे वक़्त पूछते रहेंगे किसी से...वो जो सामने लाइटहाउस जैसा कुछ है, तुम्हें साफ़ दिख रहा है क्या...अच्छा, क्या नहीं दिख रहा...ओह...मुझे लगा मेरी पॉवर फिर बढ़ गयी है या ऐसा ही कुछ. 

लड़की आजकल अपने को थर्ड परसन में ही लिखती और सोचती भी है. उसका दोष नहीं है, कुछ नयी भाषाएँ कभी कभार सोचने समझने के ढंग पर असर डाल सकती हैं. जैसे उसने हाल में फ्रेंच सीखना शुरू किया है...उसमें ये नहीं कहते कि मेरा नाम तृषा है, फ्रेंच में ऐसे कहते हैं je m'appele trisha...यानि कि मैं अपने आप को तृषा बुलाती हूँ...वैसे ही सोचना हुआ न...कि मेरे कई नाम है, वो मुझे हनी बुलाता है, घर वाले टिन्नी, दोस्त अक्सर रेडियो कहते हैं मगर अगर मुझसे पूछोगे तो मैं खुद को तृषा कहलाना पसंद करुँगी. हमें कभी कभी हर चीज़ के आप्शन मिलते हैं...जैसे आजकल उसने चश्मा पहनना लगभग छोड़ दिया है. इसलिए नहीं कि उसे स्पाइडरमैन की तरह सब साफ़ दिखने लगा है...बल्कि इसलिए कि अब उसे लगता है कि जब दुनिया एकदम साफ़ साफ़ नहीं दिखती, बेहतर होती है. जॉगिंग
 करने के लिए वैसे भी चश्मा उतारना जरूरी था. एक तो पसीने के कारण नाक पर रैशेज पड़ जाते थे उसपर दौड़ते हुए बार बार चश्मा ठीक करना बेहद मुश्किल का काम था...उससे रिदम में बाधा आ जाती थी. मगर इन बहानों के पीछे वो सही कारण खुद से भी कह नहीं पा रही है... जॉगिंग करते हुए आसपास के सारे लोग घूरते हैं...चाहे वो सब्जी बेचने वाले लोग हों...पार्क के सामने ऑटो वालों का हुजूम. सब्जी खरीदने आये अंकल टाइप के लोग या बगल के घर में काम करते हुए मजदूर. सड़क पर जॉगिंग करती लड़की जैसे खुला आमंत्रण है कि मुझे देखो. चश्मा नहीं पहनने के कारण उसे उनके चेहरे नहीं दिखते, उनकी आँखें नहीं दिखतीं...चाहने पर भी नहीं. बिना चश्मे के उसके सामने बस आगे की डेढ़ फुट जमीन होती है. उससे ज्यादा कुछ नहीं दिखता. ऐसे में वो बेफिक्री से दौड़ सकती है. उसके हैडफ़ोन भी दुनिया को यही छलावा देने के लिए हैं कि वो कुछ सुन नहीं रही...जबकि असलियत में वो कोई गीत नहीं बजा रही होती है.

जॉगिंग के वक़्त दिमाग में कुछ ही वाक्य आ सकते हैं...तुम कर सकती हो...बस ये राउंड भर...अगला कदम रखना है बस...अपनी रिदम को सुनो...एक निरंतर धम धम सी आवाज होती है लय में गिरते क़दमों की...तुम फ्लूइड हो...बिलकुल पानी...तुम हवा को काट सकती हो. सोचो मत. सोचो मत. लोग कहते हैं कि जॉगिंग करने से उनके दिमाग में लगे जाले साफ़ हो जाते हैं. उस एक वक़्त उनके दिमाग में बस एक ही ख्याल आता है कि अगला स्टेप कैसे रखा जाए. लड़की ने हालाँकि खुद की सारी इन्द्रियों को बंद कर दिया है मगर उसका दिमाग सोचना बंद ही नहीं करता. उसने अपने कोच से बात की तो कोच ने कहा तुम कम दौड़ रही हो...तुम्हें खुद को ज्यादा थकाने की जरूरत है. तब से लड़की इतनी तेज़ भागती है जितनी कि भाग सकती है...लोगों के बीच से वाकई हवा की तरह से गुजरती है मगर दिमाग है कि खाली नहीं होता. उसे अभी भी किसी की आँखें याद रह गयी हैं...अलविदा कहते हुए किसी का भींच कर गले लगाना...बारिशों के मौसम में किसी को देख कर चेहरे पर सूरज उग आना...कितनी सारी तस्वीरें दिमाग में घूमती रहती हैं. उसे अपनी सोच को बांधना शायद कभी नहीं आएगा.

फ्रेंच की कुछ चीज़ें बेहद खूबसूरत लगी उसे...कहते हैं...tu me manque...you are missing from my life...मैं तुम्हें मिस कर रही हूँ जैसी कोई चीज़ नहीं है वहां...इस का अर्थ है कि मेरी जिंदगी में तुम्हारी कमी है...जैसे कि मेरी जिंदगी में आजकल यकीन की कमी है...उम्मीद की कमी है...सुकून की कमी है...और हाँ...तुम्हारी कमी है. इतना सारा फ्रेंच में कहना सीख नहीं पायी लड़की. उसके लिए कुछ और फैसले ज्यादा जरूरी थे. देर रात पैरों में बहुत दर्द होता है. नए इश्क में जैसा मीठा दर्द होता है कुछ वैसा ही. मगर जिद्दी लड़की है...कल फिर सुबह उठ कर जॉगिंग जायेगी ही...याद और भी बहुत कुछ आता है न...चुंगकिंग एक्सप्रेस का वो लड़का...जो कहता है कि दिल टूटने पर वो दौड़ने चला जाता है...जब बहुत पसीना निकलता है तो शरीर में आंसुओं के उत्पादन के लिए पानी नहीं रहता. लड़की की हमेशा भाग जाने की इच्छा थोड़ी राहत पाती है इस रोज रोज के नियमपूर्वक भागने से. बिना चश्मे के दौड़ते हुए टनल विजन होता है. आगे जैसे रौशनी की एक कतार सी दिखती है...और वहां अंत में हमेशा कोई होता है. पागल सा कोई...शाहरुख़ खान की तरह बाँहें खोले बुलाता है, सरसों के खेत में...वो भागती रहती है मगर रौशनी के उस छोर तक कभी पहुँच नहीं पाती. कभी कभी लगता है कि किसी दिन थक कर गिरने वाली होगी तो शायद वो दौड़ कर बांहों में थाम लेगा.

भाषाएँ खो गयी हैं और शब्द भी. अब उसे सिर्फ आँखों की मुस्कराहट समझ आती है...सीने पर हाथ रख दिल का धड़कना समझ आता है या फिर बीपी मशीन की पिकपिक जो उससे बार बार कहती है कि दिल को आहिस्ता धड़कने के लिए कहना जरूरी है...इतना सारा खून पम्प करेगा तो जल्दी थक जाएगा...फिर किसी से प्यार होगा तो हाथ खड़े कर देगा कि मुझसे नहीं हो पायेगा...फिर उसे देख कर भी दिल हौले हौले ही धड़केगा...लड़की दौड़ती हुयी उसकी बांहों में नहीं जा सकेगी दुनिया का सारा दस्तूर पीछे छोड़ते हुए....लेकिन रुको...एक मिनट...उसने चश्मा नहीं पहना है...लड़की को मालूम भी नहीं चलेगा कि वो इधर से गुजर गया है...ऐसे में अगर लड़के को वाकई उससे इश्क है तो उसका हाथ पकड़ेगा और सीने से लगा कर कहेगा...आई मिस यू जान...Tu me manques. मेरी जिंदगी में तुम मिसिंग हो. हालाँकि लड़की की डेस्टिनी लिखने वाला खुदा थोड़ा सनकी है मगर कभी कभी उसके हिस्से ऐसी कोई शाम लिख देगा. मैं इसलिए तो लड़की को समझा रही हूँ...इट्स आलराईट...उसे जोर से हग करना और कहना उससे...आई मिस्ड यू टू. बाकी की कहानी के बारे में मैं खुदा से लड़ झगड़ लूंगी...फिलहाल...लिव इन द मोमेंट. कि ऐसे लम्हे सदियों में एक बार आते हैं.
*photo credit: George

29 July, 2014

दिल का डिफेन्स कमजोर है जरा और जरा सा खुदा बेईमान

चाहना...अभीप्सा जैसा कुछ. मन के कितने अंतरतम कोने से पुकारा होगा तुम्हें सोच रही हूँ...इतनी दूर दुनिया से मेरे लिए चले आना मुमकिन तो नहीं होगा. उफ़ इतनी शिद्दत से कुछ और ही मांग लिया होता. और माँगा भी क्या था. तकलीफ का एक गहरा समंदर था जिसे ज़ज्ब किये बैठी थी...आँखों में खारे पानी की झीलें अबडब कर रही थीं और मैं ज्वारभाटा को रोकने के लिए बाँध बना रही थी. मगर पागल चाँद कभी सुनेगा भी मेरी. मुझे तो मालूम भी नहीं था कि पूरे मोहल्ले में लोग झीने दुपट्टे ओढ़े चाँद का दीदार कर रहे हैं. चाँद भी मुआ भाव खाने की जगह बेशरम सा सारे बादल हटा कर झाँक रहा था. अरे तमीज तहजीब भी कोई चीज़ होती है कि नहीं. उसके आने से सैलाब उमड़ता है...फिर होश कहाँ रहता है कि नहीं देखना है उन आँखों में...नहीं कहना है तुमसे कि आई मिस यू...बस दूर ही रहना है तुमसे कि तुमसे तकलीफों की पूरी पूरी फ़ौज चली आती है मेरे दिल पर धावा बोलने...तुम बेहतरीन सिपहसलार हो...मैं हर बार हार जाती हूँ. इस बार लेकिन मेरे दिल ने हथियार डाल दिए थे कि मुझे इस बेरहम फ़ौज से बचाओ. मैं डिफेंस खेल रही थी तुम्हारे साथ कि तुमने अचानक सारा प्लान गड़बड़ कर दिया.

मान लो तुमने प्रोग्राम करके कुछ गलत किया होता तो मैं फिर भी झगड़ लेती तुमसे मगर उस इत्तिफकों वाले खुदा से कौन झगड़ा करे! उससे कुछ छिपता भी कहाँ है. मैं लाख दिल के ऊपर बाँध बनाऊं...तहखाने में अपने ज़ज्बात छुपाऊं, खुदा को तो मालूम था कि तुम्हारी आँखों को देखने के लिए मरी जा रही हूँ. हम दोनों के शहर से बहुत दूर एक मेला लगा था, मालूम...मैं तो बस वहां छुटकी के लिए झुनझुना खरीदने गयी थी. इत्तिफाक की बात है कि बच्चों ने घेवर खाने की जिद पकड़ ली...उसपर मेरा भी केसर वाला पेठा खाने को दिल कर रहा था. मुझे क्या मालूम होना था कि तुम्हारे घर में तुम्हारी दीदी को देखने के लिए लड़के वाले आयेंगे और तुम दूर मेले में उनके लिए ख़ास छेने की मिठाई के लिए साइकिल उड़ाते आओगे. मगर बताओ तो सही...ऐसे भागम भाग में कोई मेला देखने भी आता है. कैसे भुक्खड़ बर्तुहारी करते हो तुम लोग जी...ये नहीं कि मेहमान के आने के पहले से सब इन्तेजाम करके रख लें. किसी का तो ध्यान जायेगा ही अगर लड़की का भाई सबके सामने आँगन में से साइकिल निकाल कर कहीं जाएगा...और मान लो तो इतनी देर में चाची को कोई काम ही याद आ गया तो...घर में और कोई है भी या ऐसे ही चले आये हो बुड़बक जैसे? तुमरा बुद्धि पर बलिहारी रे...एक ठो काम नै होता है ढंग से.

हम भी लेकिन गज़ब हैं रे...ठीक से लजाना भी हमको कहाँ आया कभी. भरे बाजार में ऐसे लपके तुम्हारी ओर जैसे बच्चा चाँद की ओर मुट्ठी कर के उछलता है पूरनमासी की रात को. कितना साल हो गया था तुमको गाँव छोड़े हुए. इस बार आना भी तो अचानक हुआ था तुम्हारा...हालाँकि हमको थोड़ा उम्मीद तो था कि दिदिया को देखने लोग आयेंगे तो शायद तुम भी आ जाओगे कुछ दिनों के लिए मगर दिल इस तरह टूट गया है कि ऐसी कोई उम्मीद नहीं बांधना चाहता है तुमसे. मगर वो जो इत्तिफकों का खुदा है न...एकदम होपलेस रोमांटिक है. उसने DDLJ कोई डेढ़ सौ बार देखी है. एकदम यश चोपड़ा जैसे रोमांस में यकीन रखता है. ऊपर से उसके खोजी गुप्तचर गज़ब के होते हैं...आई हेट यू की अनगिन परतों के नीचे से सुलगता, बिसरता तुम्हारी आँखों को एक बार देखना खोज लेते हैं. आज शाम यही तो सोच रही थी न...कि मन की बात भी खुदा को मालूम होती है क्या...और फिर एक तुम्हें देख लेने के ख्याल को अनगिन उलूल जुलूल बातों से भर रही थी कि खुदा कमसे कम कन्फ्यूज तो हो जाये कि मुझे क्या चाहिए. खुदा लेकिन खुदा है...उसको बेवक़ूफ़ बनाना कोई इतनी आसान बात तो नहीं है. मैं झूठा गुस्सा कितना भी कर लूं...तुम्हें देखते दिल मोम हो जाता है...न न...मोम नहीं...ठाठें मरता विस्की का समंदर कि जिसकी घूँट घूँट में नशा होता है.

तुम तक पहुँच जाती है मेरे काँधे से उड़ती खुशबू...और कहाँ तो ड्रामा कर रहे थे कि हफ्ते भर से सर्दी, खांसी बुखार में पड़े हो...ऐसे कोई मानेगा भी तुम्हारा बात रे झूठे. खुशबू महसूस होती है भला? जैसे कि खुशबू मेरा सिग्नेचर हो...नाक बंद होने पर भी मालूम होने से महसूस हो कि मैं हूँ तो वही खुशबू होगी...हाँ मैं आज भी वही परफ्यूम लगाती हूँ...इतने सालों बाद भी. नहीं, मुझे कोई आईडिया नहीं था कि तुम आने वाले हो. इतने शौक़ से ईद के लिए मलमल की कुर्ती बनवाई थी और उसपर बारीक जरी का काम करवाया था. अब तो ख़ाक ही उसे पहनने का मन होगा. मैं तो मेले में लोगों का ज्यादा ध्यान न जाए इसलिए साधारण सी कुर्ती पहन कर आ गयी थी. फिर इतने हड़बड़ी में प्रोग्राम बना था कि ज्यादा सोचने की फुर्सत नहीं मिल पायी. तुम्हें तो मालूम है कि घर में कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम कितनी मुश्किल से बनता है. जब तक तुम गाँव में थे कमसे कम कहीं भी जाने के लिए सोचना नहीं पड़ता था. तुम्हारी मोटरसाइकिल से कहीं भी पहुंचा देने के लिए तुम हमेशा तैयार रहते थे. जब से तुम्हारे आगे की पढ़ाई के लिए शहर गए हो कहीं आना जाना बंद है. मन मगर तुमसे कैसा तो प्यार करता है...तुम्हारी इस एवोन की साइकिल के कैरियर पर आराम से गुनगुनाती चली जाती मैं...शायद उतनी खुश कभी नहीं होती...या कि रुको, होती...अगर तुम आगे बिठाते और तुम्हारी बाँहें मेरे इर्द गिर्द रहतीं...साईकिल का रोमांस भी ऐसा है कि बचपन से कभी मरा नहीं है...गाँव की सड़कों पर जब साईकिल चलती है तो इधर उधर के पंजर कैसे मध्हम मद्धम टिन टिन करके बजते हैं न. तुमने कभी गौर किया है? नदी ऐसे ही हंसती है न, लजाये हुए...या तुम ऐसे ही देखते हो कनखियों से मुझे. मेरे दुपट्टे में तुम्हारी देहगंध घुलती जाए कि बहुत साल बाद भी मैं संदूक से तह किया हुआ नीला दुपट्टा निकालूँ तो तुम्हारी हंसी कमरे में धूप जैसी घुलती जाये.

तुमसे प्यार इतना करती हूँ...इतना ज्यादा कि तुमसे नाराज़ रहना ही नहीं आया कभी. पिछले साल बिना मुझे बताये शहर चले गए थे. मुझे रोना इतना आया कि गुस्सा ही नहीं हो पायी तुमसे. इतना तो दुश्मनी भी निभा जाते हमसे...ऐसे विरक्त जैसे हम लगते ही क्या हैं तुम्हारे. ग़लतफ़हमी से तकलीफ मेरे सिवा और किसे होनी थी. पिछले सावन लड़के वाले देख कर गए और सबको पसंद आ गयी मैं. छेका में आया हुआ टिकरी सब उछल उछल कर खा तो लिए लेकिन अब शादी के नाम पर घिग्घी बंध रहा है. सुनो न, तुम्हारी बात सब मानेंगे...एक बार बाउजी से बात कर लो न...हमरे बारे में. तुम हमको न भी प्यार करोगे तो चलेगा. हम अपने भरोसे जिंदगी बिता लेंगे...सिर्फ इतने में खुश हो लेंगे कि तुम्हारे हिस्से का खाना बनाना मेरे जिम्मे आता है...तुम हमें अपने साथ शहर न भी ले जाओ तो चलेगा. वहां कोई मेरी सौत रख लोगे तो भी हम तुमको उलाहना नहीं देंगे. बस इतना हमरा मान रखना कि हमारी जगह किसी और को मत देना मन में. बाकी तो तुम्हारा दिल इतना बड़ा है कि मेरे जैसे जाने कितनी औरत समा जाए उसमें और किसी को तकलीफ न हो.

सुनो, तुम्हारे बिना जिया नहीं जाता है हमको. चाँद कसम किसी और के नाम हमारा डोली उट्ठा तो जान दे देंगे. भगा के ले चलो हमको कहीं...बियाह करोगे हमसे?

24 July, 2014

लूसिफर. तुकबन्दियाँ और ब्लैक कॉफ़ी.

जरा जरा खुमार है. रात के जाने कितने बज रहे हैं. अब सिर्फ कहीं भाग जाना बचा है. मैं हसरतों से पोंडिचेरी नाम के छोटे से शहर को देखती हूँ. इस शहर में कुछ सफ़ेद इमारतें हैं छोटी छोटी, ऐसा मुझे लगता है कि फ़्रांस होता होगा कुछ ऐसा ही...यहाँ का आर्किटेक्चर फ्रेंच है. मैंने फ़्रांस को देखा नहीं है...सिवाए सपनों के. दुनिया में इकलौता ये शहर भी है जहाँ औरबिन्दो आश्रम में एक दुपहर श्री माँ के पदचिन्हों के पास खड़े होकर महसूस किया था कि माँ कहीं गयी नहीं है. मेरे साथ है. तब से बाएँ हाथ में एक चांदी की अंगूठी पहनती हूँ...उनके होने का सबूत. खुद को यकीन दिलाने का सबूत कि मैं अकेली नहीं हूँ.

सब होने पर भी प्यार कम पड़ जाता है मेरे लिए. हर किसी को जीने के लिए अलग अलग चीज़ों की जरूरत होती है. मुझे लोग चाहिए होते हैं. कभी कभी धूप, सफ़र और मुस्कुराहटें चाहिए होती हैं तो कभी सिर्फ हग्स चाहिए होते हैं. जीने के लिए छोटे छोटे बहानों की तलाश जारी रहती है. आज दो लोगों से मिली. जाने कैसे लोग थे कि उनसे कभी पहले बात की ही नहीं थी...साथ एक ऑफिस में काम करने के बावजूद. नॉर्मली मुझे कॉफ़ी पी कर नशा नहीं होता है मगर कुछ दिनों की बात कुछ और होती है. मैंने कहा कि मैं तुम्हें हमेशा लूसिफ़ेर के नाम से सोचती हूँ...उसने पूछा 'डू यू नो हू लूसिफ़ेर इज?' मैंने कहा कि शैतान का नाम है...फिर मैंने कहा कि कभी उसके नाम का कोई किरदार रखूंगी तो उसका नाम लूसिफ़ेर ही लिखूंगी. उसने मुझे बताया कि लूसिफ़ेर शैतान का बेटा है. मैंने कहा कि जब सच में कहानी लिखूंगी तो रिसर्च करके लिखूंगी. चिंता न करे. उसने बताया कि लूसिफ़ेर शैतान का बेटा है. मुझे कुछ तो ध्यान है कहानी के बारे में...पर ठीक ठीक मालूम नहीं है. मुझे वो अच्छा लगता है. जैसे कि मुझे शैतान अच्छा लगता है. शैतान के पास अच्छा होने की और दुनिया के हिसाब से चलने की मजबूरी नहीं होती है.

मैं जो लिखती हूँ और मैं जो होती हूँ उसमें बहुत अंतर नहीं होता है...होना चाहिए न? लिखना एक ऐसी दुनिया रचना है जो मैं जी नहीं सकती. एक तरह की अल्टरनेट रियलिटी जहाँ पर मैं खुदा हूँ और मेरे हिसाब से दुनिया चलती है.

बहरहाल बात कर रही थी इन दो लोगों की जिनसे मैं आज मिली. मैंने उनके साथ कभी काम नहीं किया था. उनके लिए मैंने एक गीत लिखा था. यूँ मैंने दुनिया में कुछ खास अच्छे काम नहीं किये हैं मगर ये छोटा सा गीत लिख कर अच्छा सा लगा. जैसे दुनिया जरा सी अच्छी हो गयी है...जरा सी बेहतर. मैं आजकल कवितायें भी नहीं लिखती हूँ. ऑफिस में कुछ कॉर्पोरेट गीत देखे तो वो इतने ख़राब थे कि देख कर सरदर्द होने लगा. और दुनिया में कुछ भी नापसंद होता है तो उसे बदलने की कोशिश करती हूँ...इसी सिलसिले में दो गीत लिखे थे...दोनों बाकी लोगों को बहुत पसंद आये...मेरे हिसाब से कुछ खास नहीं थे. मगर बाकियों को पसंद आये तो ठीक है. जैसे गीत हमें कोई बाहरी गीतकार ३० हज़ार रुपये में लिख कर दे रहा था उससे तो मेरे ये फ्री के गीत कहीं ज्यादा बेहतर थे. इतना तो सुकून था. तो थोड़ा सा इम्प्रैशन बन गया था कि मैं गीत अच्छा लिखती हूँ. गीत आज पढ़ कर सुनाया...ऐसा कभी कभार होता है कि अपना लिखा हुआ किसी को डाइरेक्ट सुनाने मिले...गीत सुनते हुए उनमें से एक की आँखों में चमक आ गयी...उसकी ख़ुशी उसके चेहरे पर दिख रही थी. उसे बहुत अच्छा लगा था. शब्दों से किसी के चेहरे पर एक मुस्कान आ जाए इतना काफी होता है...यहाँ तो आँखों तक मुस्कराहट पहुँच रही थी. इतना काफी था. मैंने उसके साथ कभी काम नहीं किया था...उसे अपनी लिखी एक कहानी भी सुनाई...और जाने क्या क्या गप्पें. जाते हुए उसने हाथ मिलाया और कहा 'इट वाज नाईस नोविंग यू'. बात छोटी सी थी...पर बेहद अच्छा सा लगा.

दोनों खुश थे. बहुत. उसका हग बहुत वार्म था...बहुत अपना सा. बहुत सच्चा सा. अच्छाई पर से टूटा हुआ विश्वास जुड़ने लगा है. शुक्रिया. मुझे अहसास दिलाने के लिए कि दुनिया बहुत खूबसूरत है...कि मुझमें कुछ अच्छा करने की काबिलियत है. नीम नींद और नशे में लिख रही हूँ. इस फितूर की गलतियां माफ़ की जाएं.

In healing others we heal ourselves.

22 June, 2014

दुख के बाजार में सट्टा


मन क्या क्या ना दुख पाले रहता है। तुम सुनोगे तो हँसोगे मुझपर वाकई। अक्सर देखा है किसी से बहुत दिन हो जाये बात करते हुये तो जिनसे तुम, ताम, बे, तबे सब हुआ करता था उन्हें आप कह के बुलाने लगोगे। वो जो सदियों की पहचान थी खत्म हो जाती है। सब कुछ फिर से शुरू करना होता है। लेकिन ऐसा हमारे बीच क्या इतना मजबूत सा बना हुआ है कि आजतक कभी तुम्हें चोट्टा बोलने में कभी सोचना नहीं पड़ा इन फैक्ट तुम्हारे बारे में सोचती भी हूँ तो तुम्हें इन्ही विषेशणों से नवाज़े बिना नहीं सोच सकती। लतखोर, हरपट्टी…वगैरह। 

तकलीफ किस बात की है मालूम…बहुत दिन हो गये किसी नाम के साथ ‘वा’ लगाये हुये। अब देखो ना पब्लिक फोरम में तुम्हारा नाम कैसे लिख दें…तुम जो इतना इज्जत कमाये हो इतने साल साल में उसका तो धज्जी उड़ जायेगा जब लोग जानेंगे कि हम तुमको तुम्हारे घर के नाम से बुलाते हैं और उसपर भी तोड़ कर। पर डब्बू भी कोई नाम हुआ भला, इससे बढ़िया कलछुल रख देते। हम जो तुमको डबरवा बोलते हैं तो कितना तो क्यूट लगता है। डाबर दंत मंजन वाली फील आती है। वैसे भी तुम जैसे करकुट्ठे हो कि खाली दांते दिखता है और आँख। 

किसी को तुम्हारे जैसे बुलाया नहीं जबकि ये स्पेशियालिटी बिहारी लोग सब को बिना भेदभाव के प्रोवाइड करते हैं। हम सबको ऐसे बुलाते तो भी क्या फर्क पड़ जाता। तुम जानते हो कि तुम्हारा नाम लेते हैं तो एक कोमलता आ जाता है चेहरे पर…जैसे किसी माँ का जो सबसे बिगड़ैल बच्चा होता है उसके प्रति वो थोड़ा सा ज्यादा लीनीयेंट होती है। उसके सौ गुनाह माफ, लेकिन सबसे ज्यादा प्रेशर भी उस पर ही होता है, क्योंकि बाकी लोग तो किसी तरह बन ही जायेंगे मगर इस खुराफाती के बर्बाद होने का सारा इल्जाम माँ पर आयेगा और फिर मौसियां, भाभियाँ, फुफ्फियाँ ताने दे दे कर जीना मुहाल कर देंगी। किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि बाकी बच्चे अच्छा खा कमा रहे हैं। अब सारे लोग अगर शहर ही चले जायेंगे तो गाँव में फसल की देखभाल कौन करेगा। लेकिन जैसा कि दस्तूर है, बाहर जाने वाले को हमेशा बेहतर मान लिया जाता है। उनकी कितनी तो इज्जत की जाती है। 

मगर तुम चिंता मत करो, तुम मेरे सबसे फेवरिट रहोगे। जितने लड़के मेरी जिन्दगी में आये उनसे भी ज्यादा। मुझे किसी ने सबसे ज्यादा समझा है तो वो तुम हो। मेरे उलूल जुलूल दुनिया के फंडे तुम्हारे सिवा कौन समझता। तो जितनी शामें मैंने तुमसे गपियाते बितायी हैं किसी और के साथ तो क्या ही बिताये होंगे। मगर तुम्हें एक बार मुझसे मिलना चाहिये था। कभी तो मंटो की कोई किताब वाकई फेंक कर मारती तुमको। सर में गुम्मड़ होता तो कितने दिन याद रखते हमको। याद में क्या क्या आता है रे। मालूम नहीं कैसे। ये ब्रेन की वायरिंग कैसी तो है। एकदम मेरी समझ से बाहर। एक दिन सपना देखे कि सब बच्चा लोग के साथ कबड्डी खेल रहे हैं, तुम लाइन के एकदम पास हो कि पैर में गुदगुदी लगाने लगते हैं। फिर दिन का सारा खेल ही गड्डमड्ड है। सब लोग मिल कर खाली एक दूसरे को गुदगुदी लगा रहे हैं, इस चक्कर में नया टाली लगा हुआ पुआल पर जो धांगड़मस्ती शुरू हुआ कि अभी तक देह लहर रहा है। घर में सबका बराबर कुटाई हुआ था वापस आने के बाद। 

मालगाड़ी गुजर रहा था, स्टेशन पर। तुम्हारा याद क्यों आया मालूम नहीं। एक बार वो वाला गाना सुन रहे थे…शम्मी कपूर वाला, मुझको देखे बिना करार न था, एक ऐसा भी दौर गुजरा है। वाकई कैसे भूलना मुमकिन है। याद है एक वक्त तुम्हारे शहर में बारिश होती थी तो मुझे बताते थे। दिल्ली कभी भीगी होगी वैसे कभी…शायद नहीं। मेरे तुम्हारे बाद शहर भी कितना खाली हो गया होगा ना। इंटरनेट से दूर हो अच्छा कर रहे हो…सच के लोग होते हैं। यहाँ तो सब माया है बाबू। तुम जाने क्यों लगता है कि सच में होगे कहीं…मेरे ख्यालों, मेरी कहानियों से इतर भी कहीं। कभी सोचते हैं कि फिल्म बनायेंगे तो डायलोग तुम्हारे सिवा कोई नहीं लिख पायेगा, कि तुम मेरे किरदारों को समझोगे, जैसे मुझे समझते आये हो अभी तक।

भगवान जाने कौन दुनिया में रहते हो, और मुहब्बत किस शय का नाम है। तुम्हारे मेरे बीच क्या है ये भी मालूम नहीं…तुम कभी थे नहीं तो क्या है जिसकी इतनी कमी महसूस होती है। तुम्हारी उलट पुलट मात्राओं में अपना हँसना क्युं दिखायी देता है। किसी लड़की से झापड़ खा के आते हो तो किसको बताते हो आजकल…मेरे जैसी कोई ढँूढे हो क्या? तुम तो बड़े हीरो हो, बड़के साहित्तकार भी बनोगे जल्दी…ए गो शब्द दो ना, हमारे तुम्हारे बीच में चलता क्या है?

जैसा कि तुम कहते हो…हमरा तो जिन्दगी गुजर जायेगा ई झगड़ा करते कि दुन्नो को प्यार था कि नहीं था। 

17 May, 2014

इश्क रंग


इत्ती सी मुस्कुराहट
इजहार जैसा कुछ
कलाईयों पे इत्र तुम्हारा
मनुहार जैसा कुछ

ख्वाबों में तेरे रतजगे
विस्की में तेरा नाम
उनींदी आँखों में तुम
पुराने प्यार जैसा कुछ

तेरे सीने पे सर रख के
तेरी धड़कनों को सुनना
मन के आंगन में खिलता
कचनार जैसा कुछ

बाँहों में तोड़ डालो
तुमने कहा था जिस दिन
रंगरेज ने रंगा मन
खुमार जैसा कुछ

खटमिट्ठे से तेरे लब
चक्खे हैं जब से जानां
दिल तब से हो रहा है
दिलदार जैसा कुछ

कलमें लगा दीं तुमने
मेरी तुम्हारीं जब से
लगता है आसमां भी
गुलजार जैसा कुछ

03 May, 2014

ये मौसम का खुमार है या तुम हो?

याद रंग का आसमान था
ओस रंग की नाव
नीला रंग खिला था सूरज
नदी किनारे गाँव

तुम चलते पानी में छप छप
दिल मेरा धकधक करता
मन में रटती पूरा ककहरा
फिर भी ध्यान नहीं बँटता

जानम ये सब तेरी गलती
तुमने ही बादल बुलवाये
बारिश में मुझको अटकाया
खुद सरगत होके घर आये

दरवाजे से मेरे दिल तक
पूरे घर में कादो किच किच
चूमंू या चूल्हे में डालूं
तुम्हें देख के हर मन हिचकिच

उसपे तुम्हारी साँसें पागल
मेरा नाम लिये जायें
इनको जरा समझाओ ना तुम
कितना शोर किये जायें

जाहिल ही हो एकदम से तुम
ऐसे कसो न बाँहें उफ़
आग दौड़ने लगी नसों में
ऐसे भरो ना आँहें उफ़

कच्चे आँगन की मिट्टी में
फुसला कर के बातों में
प्यार टूट कर करना तुमसे
बेमौसम बरसातों में

कुछ बोसों सा भीगा भीगा
कुछ बेमौसम की बारिश सा
मुझ सा भोला, तुम सा शातिर
है ईश्क खुदा की साजिश सा 

Related posts

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...