17 August, 2017

'धुन्ध से उठती धुन' पढ़ना फ़र्स्ट हैंड दुःख है


कुछ अंतिम स्मृतियाँ: नेशनल ग़ैलरी में कारोली फेरेनीस के असाधारण चित्र, कासल की पहाड़ियाँ, पुराने बगीचे और फव्वारे जिन्हें देखकर ऑस्ट्रीयन कवि त्राकल की कविताएँ याद हो आतीं थीं। एक दुपहर रेस्तराँ में बैठे हुए सड़कों पर लोगों को चलते हुए देखकर लगा जैसे मैं पहले भी कभी यहाँ आया हूँ…
हवा में डोलते चेरी के वृक्ष और वह कॉटेजनुमा घर, जहाँ हम इतने दिन बुदापेस्ट में रहे थे। वह होटल नहीं, किसी पुराने नवाब का क़िला जान पड़ता था। क़िले के पीछे एक बाग़ था, घने पेड़ों से घिरा हुआ, बीच में संगमरमर की एक मूर्ति खड़ी थी और बादाम के वृक्ष...यहीं पर मुझे एक कहानी सूझी थी, एक छोटे से देश का दूतावास, जहाँ सिर्फ़ तीन या चार लोग काम करते हैं…कुछ ऐसा संयोग होता है कि उनकी सरकार यह भूल जाती है कि कहीं किसी देश में उनका यह दूतावास है। बरसों से उनकी कोई ख़बर नहीं लेता…वे धीरे धीरे यह भूल जाते हैं, कि वे किस देश के प्रतिनिधि बनकर यहाँ आए थे। बूढ़े राजदूत हर शाम अपने कर्मचारियों के साथ बैठते हैं और शराब पीते हुए याद करने की कोशिश करते हैं कि यहाँ आने से पहले वह कहाँ थे।
यह कहानी है या हमारी आत्मकथा?
~ निर्मल वर्मा, धुन्ध से उठती धुन
***

मैं इस किताब को ऐसे पढ़ती हूँ जैसे किसी और के हिस्से का प्रेम मेरे नाम लिखा गया हो। नेरूदा की एक कविता की पंक्ति है, 'I love you as certain dark things are to be loved, in secret, between the shadow and the soul’। मन के अंधेरे झुटपुटे में किताब के पन्ने रचते बसते जाते हैं। मैं कहाँ कहाँ तलाशती हूँ ये शब्द। दुनिया के किस कोने में छुपी है ये किताब। मैं लिखती हूँ इसके हिस्से अपनी नोट्बुक में। हरी स्याही से। कि जैसे अपनी हैंड्रायटिंग में लिख लेने से ये शब्द ज़रा से मेरे हो जाएँगे। हमेशा की तरह।

मैं इसे दोपहर की धूप में पढ़ती हूँ लेकिन किताब मेरे सपनों में खुल जाती है। बहुत से लोगों के बीच हम मुहब्बत से इसके हिस्से पढ़ते हैं। अपनी ज़िंदगी के क़िस्सों से साथ ही तो। कहाँ ख़त्म होती है धुंध से उठती धुन और कहाँ शुरू होता है कहानियों का सिलसिला। निर्मल किन लोगों की बात करते चलते हैं इस किताब में। उनकी कहानी के किरदार कितनी जगह लुकाछिपी खेलते दिखते हैं इस धुन्ध में। 

लिखे हुए क़िस्से और जिए हुए हिस्से में कितना साम्य है। पंकज ठीक ही तो कहता है इस किताब को, Master key. यहाँ इतना क़रीब से गुंथा दिखता है कहानी और ज़िंदगी का हिस्सा कि हम भूल ही जाते हैं कि वे दो अलग अलग चीज़ें हैं। मैं इसे पढ़ते हुए धूप तापती हूँ। मेरा कैमरा कभी वो कैप्चर नहीं कर पाता जो मैं इस किताब को पढ़ते हुए होती हूँ।

धुन्ध से उठती धुन पढ़ना मुहब्बत में होना है। मुहब्बत के काले, स्याह हिस्से में। जहाँ कल्पनाओं के काले, स्याह कमरे रचे जाते हैं। ख़्वाहिशें पाली जाती हैं। जहाँ दुनियाएँ बनायीं और तोड़ी जाती हैं सिर्फ़ किसी की एक हँसी की ख़ातिर। इसे पढ़ते हुए मैं देखती हूँ वो छोटे छोटे हिस्से कि जो निर्मल की कहानियों में जस के तस आ गए। वे अगर ज़िंदा होते तो मैं डिटेल में नोट्स बनाती और पूछती चलती इस ट्रेज़र हंट के बाद कि मैंने कितने क्लू सही सही पकड़े हैं। 

कहानियाँ ज़िंदगी के पैरलेल चलती हैं। मैं लिखते हुए कितने इत्मीनान से छुपाती चलती हूँ कोई एक वाक्य, कोई एक वाक़या, किसी की शर्ट का रंग कोई। लेकिन क्या मेरे पाठकों को भी इसी तरह साफ़ दिखेंगे वे लोग जिन्हें मैंने बड़ी तबियत से अपनी कहानियों में छुपाया है? वे शहर, वे गालियाँ, वे मौसम कि जो मैंने सच में जिए हैं।

आज एक दोस्त से बात कर रही थी। कि हमें दुःख वे ही समझ आते हैं जो हम पर बीते हैं या हमारे किसी क़रीबी पर। हमें उन दुखों की तासीर ठीक ठीक समझ आ जाती है। फ़र्स्ट हैंड दुःख। धुन्ध से उठती धुन पढ़ना फ़र्स्ट हैंड दुःख है। नया, अकेला और उदास। कोई दूसरा दुःख इसके आसपास नहीं आता। कोई मुस्कान इसका हाथ नहीं थामती। तीखी ठंड में हम बर्फ़ का इंतज़ार करते हैं। मौसम विभाग ने कहा है कि आज आधी रात के पहले बारिश नहीं होगी। 

'तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो', मेरी दुनिया में इस वाक्य की कोई जगह नहीं है। मेरे डर, मेरे अंधेरे, मेरे उदास क़िस्सों में किसी की आँखे नहीं चमकतीं। कितनी बार हलक में अटका है ये वाक्य। इसलिए मैं तुम्हें सिर्फ़ उन किताबों के नाम बताउँगी जिनसे मुझे इश्क़ है। ताकि तुम उन किताबों को पढ़ते हुए कभी किसी वाक्य पर ठहरो और सोच सको कि मैंने तुम्हें वो कहानी पढ़ने को क्यूँ कहा था। 

कभी चलना किसी पहाड़ी शहर। वहाँ की पुरानी लाइब्रेरी में एक रैक पर इस किताब की कोई बहुत पुरानी कॉपी मिल जाएगी। उस समय का प्रिंट कि जब हम दोनों शायद पहली बार किसी इश्क़ में पड़ कर उसे आख़िरी इश्क़ समझ रहे होंगे। प्रेमपत्र में बिना लेखकों के नाम दिए शायरी और कविताएँ लिख रहे होंगे। ग़लतियाँ कर रहे होंगे बहुत सी, इश्क़ में। साथ में पढ़ेंगे कोई किताब, बिना समझे हुए, बड़ी बड़ी बातों को। मिलेंगे कोई दस, पंद्रह, सत्रह साल बाद एक दूसरे से, किसी ऐसे शहर में जो नदी किनारे बसा हो और जहाँ मीठे पानी के झरने हों। याद में कितना बिसर गया होगा किताब का पन्ना कोई। या कि हमारा एक दूसरे को जानना भी। फिर भी कोई याद होगी कि जो एकदम नयी और ताज़ा होगी। एक रात पहले पी कर आउट हो जाने जैसी। थोड़ी धुँधली, थोड़ी साफ़। बीच में कहीं। भूले हुए गीत का कोई टुकड़ा। 

कोई धुन, धुन्ध से उठती हुयी। 
पूछना उस दिन मौसम का हाल, मैं कहूँगी। इश्क़। 

02 August, 2017

मैं तुम्हारी शब्दगंध पहचानती हूँ

मेरी सारी इंद्रियाँ कुछ ज़्यादा ही तेज़ हैं सिवाए नज़र के। आँखों पर चश्मा चढ़ा है तो दिखता कम है। लेकिन जितना दिखता है वो बहुत से डिटेल्ज़ के साथ सहेज दिया जाता है। कभी कभी मैं बिना चश्मे के चलना चाहती हूँ। पूरी धुँधली सी दुनिया की ख़ूबसूरती में भीगती हुई। बेतरह।

मैंने पहली बार तुम्हें तुम्हारे शब्दों से पहचाना था। उन शब्दों का चेहरा नहीं था। वे अंधेरे के शब्द थे। किसी पहाड़ी गुफ़ा में मीठे पानी के झरने की तरह। उनका होना दिखायी नहीं, सुनायी पड़ता था। उनका होना प्यास को पुकारता था। मैंने उन्हें छू कर जाना कि शब्दों से धुल जाती है थकान। पानी की तरावट समझने के लिए तुम्हें गर्मियाँ समझनी होंगी। या कि किसी के कॉटन दुपट्टे की छुअन। किसी पहाड़ी झरने के पानी से आँखें धो लो और फिर माँगो उस लड़की का दुपट्टा, चेहरा पोंछने के लिए। या कि उसकी साड़ी का आँचल ही। एक गंध होती है। गीले कपास में। उस गंध से यक़ीन आता है कि प्यास का प्रेत हमारा पीछा नहीं कर रहा। 

मेरे पास उस वक़्त बस इक छोटी सी बॉटल थी पास में। मैंने उसमें झरने का मीठा पानी भरा और सालों उसे देख कर इस बात का यक़ीन दिलाती रही ख़ुद को कि एक अंधेरी गुफ़ा में टटोल कर, पानी की आवाज़ तक पहुँची थी। बिना आँखों देखा सिर्फ़ स्वाद के भरोसे पानी पिया था और प्यास को मिटते हुए महसूसा था। उस भरी भरी सी पानी की बॉटल का होना एक मीठी याद थी। बस एक मीठी याद।

इक रोज़ यूँ हुआ कि किसी नए शहर में घूमते हुए रात हो गयी और शहर की सारी दुकानें बंद। आख़िर ट्रेन जा चुकी थी और मेरा होटल रूम वहाँ से दो मील दूर था। मेरे जूते कंफर्टेबल थे कि मैं विदेश में टहलते हुए हमेशा स्पोर्ट्स शूज पहनती हूँ पर उस रात मैंने ज़मीन की कुछ बातें सुननी चाही थीं। पानी की भी। इक नदी बहती थी शहर के दो टुकड़े करती हुयी। या कि शहर के दो टुकड़े जोड़ती हुयी। जैसा तुम सोचना चाहो। मैं नदी किनारे बैठी। जूते उतारे और ठंढे पानी में पैर डाल दिए। इक किताब थी मेरे बैग में। हमेशा की तरह। नदी ने कहा मेरे पास बंद किताबों की कहानियाँ नहीं आयी हैं कभी। तो मैंने उसे कहानियाँ सुनायीं। वो फिर तुम्हारी आवाज़ की मिठास चखना चाहती थी। मैंने बोतल से निकाल कर थोड़ा सा पानी नदी में बह जाने दिया। उस रोज़ मैंने पहली बार महसूसा था कि तुम पर मेरा हक़ कुछ भी नहीं। कि शब्दों पर हक़ सबका होता है। नदी, आसमान, पंछी का भी। मैं सिर्फ़ अपनी प्यास के लिए तुम्हारे शब्द बोतल में भर कर नहीं घूम सकती थी। उस दिन मैंने तुमसे उदार होना सीखा था। 

मगर जो शब्द तुम्हें मेरे लिए परिभाषित करता है, वो शब्द शायद तुम्हारे पास इतनी बहुतायत में है कि तुम्हें मालूम भी नहीं चला होगा कि कब मैंने दिन दहाड़े तुम्हारी नोट्बुक से एक पन्ना अपने लिए फाड़ लिया था। बड़े हक़ के साथ। कि तुम्हारे पास इस शब्द के कई रंग हैं। एक ज़रा सा हिस्सा मुझे भी दो। मैंने इसकी ग्राफ़्टिंग करूँगी। अपने पागलपन में ज़रा सा तुम्हारा 'kind' होना। कि तुम तो एकदम ही one of a kind हो। शायद चुप्पी की शाख़ पर खिल ही जाए मुस्कान की नन्ही कली कोई। या कि ठहाकों के काँटे उग आएँ। या इश्क़ का वर्जित फल। शब्द बड़े मायावी होते हैं। इनकी ठीक ठीक तासीर कोई भी तो नहीं जानता।  

It's a cold and cruel world, my friend. तुम्हारे शब्दों की सबसे ख़ास बात क्या है मालूम? They are kind. तुम्हारी तरह। तुम्हारे हाथों में ये शब्दगंध रहती है। तुम्हारे क़ातिल हाथों में। कि तुम्हारे हाथ तो फ़रिश्ते के हाथ हैं। तुम्हारे साफ़ दिल से भेजा जाता है उजले, पाक शब्दों में धुले, घुले इरादे। क़त्ल के। क़त्ल करने के लिए वे घंटों जिरह नहीं करते। कोर्ट केस नहीं करते। सान जो चढ़ा रक्खि है तुमने उन पर। इतनी तीखी। वे सीधा क़त्ल करते हैं। बस। एक ही लम्हे में। केस क्लोज़्ड।

तुम्हारी शब्दगंध। नींद में आती है दबे पाँव। जाग में आती है पायल की महीन झमक में। काँच की चूड़ियों में। टूटते हुए काँच दिल की छन्न में। बस कभी कभी होता है, कि शब्दगंध की जगह तुम ख़ुद चले आते हो। 

तुम ऐसे मत आया करो। मुझे तुमसे नहीं, तुम्हारे शब्दों से नहीं...अपने इस कोल्ड, क्रूअल दिल से डर लगता है। 
कि तुमसे मिल कर मेरा भी तुम्हारी तरह काइंड बनने का दिल करने लगता है। 
तुम्हारी तरह हँसने का भी।
वे दिन - निर्मल वर्मा 
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Prequel
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"तुम रातों को ऐसी बेपरवाही से ख़र्च कैसे कर सकती हो?"
"ये कैसा सवाल है। ठीक से पूछो वरना मैं कुछ जवाब नहीं दे रही,।"
"तुम रातों को ऐसे बेपरवाही से बर्बाद कैसे कर सकती हो? ख़ुश?"
"हाँ, अब ठीक है। वो इसलिए कि रातें मेरी अपनी होती हैं। चुरायी हुयीं। मैं अपनी नींद से मोहलत चुराती हूँ। तुम्हें मालूम मैं कितने घंटे सो रही आजकल?"
"नहीं। कितने?"
"तीन"
"नींद की कमी से मर सकते हैं लोग, मालूम है ना तुम्हें?"
"नहीं। सब कुछ तो बस, तुम्हें ही मालूम है"
"क्या करती हो रात भर जाग जाग के"
"पढ़ती हूँ, निर्मल वर्मा की 'वे दिन', बचा बचा के...और रचती हूँ वैसे शहर जिनमें तुम्हें मुझसे मिलना चाहिए"
"क्यूँ, इस शहर में क्या ख़राबी है?"
"इस शहर में मेरी पसंद के गीत नहीं बजते"
"तुम्हारी पसंद बदलती रहती है"
"धुनों की...लेकिन एक बात कभी नहीं बदलती। मुझे लिरिक्स बहुत अच्छे लगने चाहिए"
"तुम्हें शब्द मार डालेंगे"
"उफ़! ये हुयी कोई हसीन मौत, किसी कविता के हाथों मर जाना! नहीं?"
"बिलकुल नहीं। धरो किताब और जाओ सोने।"
"अच्छा, लास्ट बार, तुम अपनी पसंद का एक शहर चुन लो कि जिसमें मैं तुमसे मिल सकूँ। मैं अपनी पसंद का कोई शहर लिखूँगी तो उसमें तुम्हारी पसंद की ड्रिंक्स नहीं मिलेंगी।"
"तुम मुझे पहचान लोगी उस नए शहर में, कि जहाँ सब कुछ नया होगा"
"तुम्हें क्या लगता है, मैं तुम्हें कैसे पहचानती हूँ? तुम्हारी आँखों, तुम्हारी हँसी या कि तुम्हारे कपड़ों से?"
"पता नहीं। तुम ही बताओ"
"मैं तुम्हें तुम्हारी शब्दगंध से पहचानती हूँ।"

किसी से प्रेम किए बिना उसका दिल तोड़ना गुनाह है

दिन भर अस्पताल में बीता था। दुखते हुए टेस्ट। ये वो इग्ज़ैमिनेशंज़ नहीं थे जिन्हें पास करने या टॉप करने के लिए ख़ूब सी मेहनत करनी होती। ढंग के नोट्स बनाने होते। या क्लास में समय पर जा कर अटेंडन्स ही पूरी करनी होती। ये वो टेस्ट थे जो ज़िंदगी बिना किसी तैय्यारी के ले लेती है।

अस्पताल शायद किसी को भी अच्छे नहीं लगते होंगे। वहाँ की एक अजीब सी गंध होती है। मुर्दा गंध को ढकने वाली गंध। जैसे बिना नहाए लोग डीओ लगा लेते हैं और और भी ज़्यादा बिसाएन महकते हैं। ये ठीक ठीक गंध नहीं है। ये उस जगह का बहुत सा दुःख और अवसाद का सांद्र एनर्जी फ़ील्ड है। ये गंध से ज़्यादा महसूस होता है। ख़ास तौर से मुझे। मैं नॉर्मली हॉस्पिटल के रूट ट्रैवल में भी अवोईड करती हूँ। 

झक सफ़ेद रौशनी। एकदम सफ़ेद ब्लीच की हुयी चादरें। परदे। सब बिलकुल सफ़ेद। मगर यही सफ़ेद चादरें फ़ाइव स्टार होटल में होती हैं तो सुकून का बायस बनती हैं। उल्लास का। छुट्टियों का। मगर यही सफ़ेद हॉस्पिटल में दिखता है तो मन से सारे रंग सोख लेना चाहता है। 

वहाँ बहुत से बेड्ज़ लगे थे। हर बेड के इर्द गिर्द परदे। मेरे बग़ल वाले बेड पर आयी औरत रो रही थी। उसकी सिसकी मुझे सुनायी पड़ रही थी। कुछ इस तरह कि लग रहा था उसके आँसुओं का गीलापन मेरे पैरों तक पहुँच रहा है और मेरे तलवे ठंढे कर रहा है। मुझे ठंढे होते हुए पैर बिलकुल अच्छे नहीं लगते। मुझे उनसे हमेशा मम्मी की याद आती है। लेकिन इन दिनों मेरा पूरा बदन गरम रहता है, सिर्फ़ तलवे ठंढे पड़ने लगे हैं। मुझे ऐसा भी लगता है कि ज़मीन का लगाव कम रहा है मेरे प्रति। उसकी ऊष्मा मेरे तलवों तक नहीं पहुँचती। उसे मेरा ज़मीन पर नंगे पाँव चलना नहीं पसंद। या शायद मैं उड़ने लगी हूँ और मेरे पैरों को हवा से गरमी सोखना नहीं आता। 

मेरे हर ओर सिर्फ़ सफ़ेद था। कोई भी रंग नहीं। हॉस्पिटल के गाउन में भी कितना दर्द होता है। बदन पर डालते ही लगता है कितनी आहें और सिसकियाँ इसमें घुली होंगी। किसी सर्फ़ या ब्लीच से फ़ीलिंज़ थोड़े ना धुल जाती हैं। एसी बहुत ठंढा था। मेरे पास किताबें थीं। नोट्बुक थी। मोबाइल भी था। कुछ देर पढ़ने के बाद मैंने सब कुछ अलग रख दिया। मुझे वैसे भी मर जाने का बहुत डर लगता है। फ़ॉर्म भी तो साईन करवाते हैं। कि मैं मर गयी तो हॉस्पिटल ज़िम्मेदार नहीं होगा। वग़ैरह। यूँ ही। सवाल पूछो तो कहेंगे प्रोटोकॉल है। मतलब मज़े मज़े में पूछ लिया कि साहब आप मर गए तो हमारी ग़लती नहीं है। 

मैं भी यूँ ही लोगों से फ़ॉर्म भरवा लिया करूँ मिलते साथ…इश्क़ हो जाए तो मेरी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। इन फ़ैक्ट मेरी कोई ज़िम्मेदारी कभी नहीं होनी चाहिए। नाबालिग़ तो होते नहीं लोग। कि मैंने फुसला लिया। जान बूझ कर आपको पुल से नीचे बहते दरिया में कूद के जान देनी है तो शौक़ से दीजिए ना। बस मेरे लिए एक आख़िरी चिट्ठी छोड़ जाइए कि हम दिखा सकें लोगों को कि मैंने अपना फ़र्ज़ निभाया था। वॉर्निंग भी दी थी। बचाने के लिए लाइफ़बोट भी भेजी थी। अब कोई मेरे इश्क़ से बचने के लिए मौत के गले पड़ जाए तो मैं क्या करूँ।
मौत। कहाँ कहाँ मिलती है। अपनी ठंढी उँगलियाँ भोंक देती है मेरे सीने में। दिल में छेद होकर सारा इश्क़ ख़ुमार बह जाए, सो भी नहीं होता। बस तड़प कहाँ होनी चाहिए, उसी की शिनाख्त करती है मौत। मेरे साथ और भी चार-छः लोग गए थे अंदर। सबके चेहरे पर क़ब्ज़ा जमाए बैठी थी मौत। जैसे जाने अंदर यमराज ख़ुद अपना भैंसा लेकर खड़े हों और बाँध कर ले ही जाएँगे। मैं हँस रही थी। पागलों की तरह। अश्लील हँसी। कि हस्पताल में नियम है कि मुर्दा शक्ल बना के घूमो। वहाँ ऐसे बेपरवाह होकर हँसना गुनाह ही था। ऐसा नहीं है कि मुझे दर्द नहीं होता। लेकिन फ़िज़िकल पेन के प्रति मेरा स्टैमिना बहुत ज़्यादा है। बर्दाश्त की हद ज़्यादा। बाएँ काँधे में हड्डी टूटी थी तो भी अपनी काइनेटिक फ़्लाइट ख़ुद ही राइड करके वहाँ से घर आयी थी। बिना किसी मदद के। घर आके पूरे घर में जो पैर के ज़ख़्म से ख़ून बहता आया था, उसे पोछे के कपड़े से पोछा था। सो दुखता है तो बस गहरी साँस लेती हूँ। इंतज़ार करती हूँ कि दर्द ख़त्म हो जाएगा। 

पर यहीं ज़रा मेरा दिल तोड़ के देखो। हफ़्तों खाना पानी बंद हो जाएगा। तोड़ना तो छोड़ो, खरोंच लगा के देखो ज़रा मेरे दिल पर। उसी में रोना धोना और चूल्लु भर पानी ढूँढ के मर जाना, सब कर लूँगी। ज़ुबान पर मेटल का टेस्ट आ रहा है। लोहे जैसा। काँसे जैसा। धातु। मुट्ठी भर दवाइयाँ हैं। निगलते निगलते परेशान। मेरे दिमाग़ दिल का उपाय क्यूँ नहीं होता इन डाक्टर्ज़ के पास। पूछूँ कि मेरा मन क्यूँ दुखता है? ये रात भर नींद क्यूँ नहीं आती। ग़लत लोगों से इश्क़ क्यूँ होता है? जिन्हें भूल जाना चाहिए, उनके नाम दिल में ज़मीन क्यूँ लिख देती हूँ। डॉक्टर ये भी तो बताएँ कि इश्क़ घूम घूम कर क्यूँ आता है जीवन में। लम्हे भर का। घंटे भर का। शाम भर का। 

तुम्हारा इश्क़ मेरा नाम पुकारता है। जैसे देर रात बेमौसम कूकती है कोई अकेली कोयल। ऐसी हूक कि जिसका कोई जवाब नहीं से नहीं आता। मैं क्या करूँ। हम दोनों के बीच कितने सारे शब्द हो जाते हैं। लेकिन शब्द बेतरतीब किसी जंगल की तरह नहीं उगते कि मैं तुम तक पहुँच नहीं पाऊँ। ना ही कोई पहाड़ या कि घाटी बनते हैं। शब्द मेरे तुम्हारे बीच नदी बनते हैं। पुल बनते हैं। बह जाने का गीत बनते हैं। मैं तुम्हारे लड़कपन की तस्वीरों के साथ अपनी ब्लैक एंड वाइट फ़ोटो साथ में रखती हूँ और सोचती हूँ हम ग़लत वक़्त में मिले। हमें तब मिलना था जब मेरा दिल थोड़ा कम टूटा था और तुम थोड़े ज़्यादा बेपरवाह हुआ करते थे। 

तुम्हें मालूम है मुझे तुमसे कितनी बातें करनी हैं? मैं हर मौसम के हर शाम की कोई तस्वीर खींचना चाहती हूँ सिर्फ़ तुम्हारे लिए। गुनगुना देना चाहती हूँ कोई मुहब्बत में डूबा गीत। ख़त लिखना चाहती हूँ तुम्हें। इश्क़ कोई देश है। कोई शहर। गली। मुहल्ला कोई? कमरा है तुम्हारे दिल का…ख़ाली?

कितने शब्द लिखे गए हैं हमारे नाम से? कितनी किताबें हो जाती उन चिट्ठियों को जोड़ कर जो मेरे ख़याल में उगी लेकिन काग़ज़ पर मार दी गयीं। इस वायलेन्स के लिए कोई प्रोटेस्ट क्यूँ नहीं करता? 

ये बदन टूट फूट गया है। कोई कबाड़ी इसे किलो के भाव से तोलेगा इसलिए जब दिल्ली आती हूँ भर मन छोले कुलचे खाती हूँ। आइसक्रीम जाड़ों में। कोहरे में जिलेबी।

रूह में भी दरारें हैं। मेरे लिए महीन शब्द लिखो और गुनगुनाहट की कोई धुन। सिल दो ये बिखरा बिखरा लिबास। ज़रा देर को तुम्हारे काँधे पर सर रख लूँ। थक गयी हूँ। 

मुझे नहीं मालूम मेरे मर जाने पर कितने लोग मुझे कैसे याद रखेंगे। मगर मैं चाहूँगी तुम मुझे एक अफ़सोस की तरह याद रखो। एक जलते, दुखते, ज़िंदा अफ़सोस की तरह। कि तुम तो जानते हो। अफ़सोस की उम्र ज़िंदगी से कहीं ज़्यादा होती है। 

तुम मेरी ज़िंदगी में कभी नहीं रहे लेकिन मैं तुम्हें ऐसे मिस करती हूँ जैसे इक उम्र बिता कर गए हो तुम। रूठ कर। 

किसी किताब के पहले पन्ने पर कुछ भी लिखना गुनाह है। 
किसी से प्रेम किए बिना उसका दिल तोड़ना भी।

31 July, 2017

तुम्हारी आँखों का रंग उसकी फ़ेवरिट शर्ट जैसा है। ब्लैक।



'लिखने में हमेशा ख़ुद का एक हिस्सा रखना होता है। आत्मा का एक टुकड़ा। ये सिर्फ़ मेरा नहीं होता, जिस किसी को भी कभी मैंने गहरे, रूह से चाह लिया होता है, उसकी रूह के उतने से हिस्से पर मेरा अधिकार हो जाता है। मैं लिखते हुए इस हिस्से को किसी कहानी में सहेज देती हूँ। लेकिन ऐसा सिर्फ़ तभी हो सकता है जब इस इश्क़ में भी थोड़ी दूरी बाक़ी रहे, कि जिससे बहुत ज़्यादा इश्क़ हो जाता है उनको लेकर पजेसिव हो जाती हूँ। लिखना यानी नुमाइश करना। मैं फिर महबूब को ऐसे सबकी आँखों के सामने नहीं रख सकती। उसे छुपा के रखती हूँ बहुत गहरे, अंदर।"
'मेरे बारे में भी लिखोगी?'
'पता नहीं। तुम क्या चाहोगे?'
'लिखो मेरे बारे में।'
'पक्का? देखो, सोच लो। तुम्हारे बारे में लिखूँगी तो तुमसे एक दूरी हमेशा बना के रखूँगी ताकि तुम्हें अपनी आँखों से देख सकूँ। तुम्हारी आँखों में दिख सके...चाँद, तारे, शहर। महसूस हो तुम्हारी बाँहों में मौसम कोई। गंध तुम्हारी कलाई से उड़े और मेरी पलकों पर जा बैठे। मेरे ख़्वाब तुम्हारी आँखों जैसे महकते रहें।' 
'हाँ। इश्क़ तो शायद कई और बार हो जाएगा, लेकिन इस तरह मुझे रच के रख दे, ऐसी कोई कहाँ मिलेगी मुझे!'
'तुम एक इमैजिनेरी किरदार के लिए इश्क़ से मुँह मोड़ रहे हो? उन लोगों के लिए जो मेरा लिखा पढ़ते हुए तुमसे प्यार कर बैठेंगे और शायद बरसों तक तुम तक बात ना पहुँचे।' 
'तो यूँ कर लो, फ़िलहाल इश्क़ कर लेते हैं। तुम्हारी तरह का गहरा वाला'
'फ़िलहाल?'
'हाँ, इश्क़ कोई हमेशा की बात थोड़े होती है। ख़ास तौर से मुझसे। मेरा इश्क़ तो बस मौसमी बुखार है।'
'और फिर?'
'फिर क्या, इश्क़ ख़त्म हो जाएगा तो रख देना कहानी, कविता...जहाँ तुम्हारा मन करे तो। 
'और फिर?'
'फिर तुम अपने रास्ते, मैं अपने रास्ते। दुनिया में इतने शहर हैं, कहीं और भी जा के बस जाएँ। रोज़ रोज़ मिलने से मुहब्बत में ख़लल पड़ेगा।'
'मेरा दोस्त कहता है तुम मुझसे इश्क़ में हो...कि तुम्हारी आँखों में दिखता है'
'तुम्हारे दोस्त को मुझसे प्यार है?'
'पता नहीं'
'तो पूछो ना, तुम पास में बैठी थी तो वो मेरी आँखों में क्यूँ देख रहा था। क्या उसे मर्द पसंद आते हैं?'
'नहीं। उसे मैं पसंद हूँ। उसे मेरी चिंता है। मेरे इर्द गिर्द कोई भी होता है तो उसे ऑब्ज़र्व करता रहता है वो'
'मुझे लगता है तुम्हारे दोस्त को तुमसे प्यार है। वो प्यार जो वो मेरी आँखों में देख रहा है। उसके मन का चोर बोल रहा है ये'
'चोरी वोरि की कोई बात नहीं। उसे मुझसे प्यार हो जाएगा तो कह देगा। डरता थोड़े है वो मुझसे'
'तुमसे कौन नहीं डरता'
'तुम ना, पागल हो एकदम। हमसे कोई क्यूंकर डरेगा यार!'
'क्यूँकि तुमसे सबको इश्क़ हो जाता है और तुम्हें बस किसी किसी से'
'ये कौन सी बड़ी बात है। ये डर तो मुझे भी लगता है। मालूम, प्रेम और कॉन्फ़िडेन्स inversely proportional हैं। जब बहुत गहरा प्रेम होता है तो लगता है कि हम कुछ हैं ही नहीं। माने, कुछ भी नहीं। ना शक्ल, ना सीरत। होने की इकलौती वजह होती है कि महबूब इस दुनिया में है। हमारी रूह को एक बदन इसलिए मिला होता है कि वो हमें देख सके, छू सके। लेकिन हमारा कॉन्फ़िडेन्स इतना नीचे होता है कि हम सोचते हैं कि वो हमें एक नज़र देखेगा भी क्यूँ। कौन बताए उसे कि उसके देखने से हम जिला जाते हैं'
'तुम भी ये सब सोचती हो?'
'तुम 'भी' माने क्या होता है जी?'
'माने, तुम्हें ये सब सोचने की ज़रूरत क्यूँ आन पड़ी? कि इस दुनिया में कौन है जिसे तुमसे इश्क़ नहीं है?'
'एक ही है। बस एक ही है जिसे हमसे इश्क़ नहीं है। वो जिससे हमको इश्क़ हो रखा है'।
***
सुनो, उस किताब को अहतियात से पढ़ना। कि तुम्हारी उँगलियों के निशान रह जाएँगे उसके हाशिए में। तुम्हारे हाथों की गर्माहट भी। ये किसी को भी याद करने का सही वक़्त नहीं है, लेकिन मैं तुम्हारे सपने लिख रही हूँ। पहाड़ों पर चलोगे मेरे साथ? घाटी से उठते बादलों को देखते हुए चाय पिएँगे। सुनाएँगे एक दूसरे को याद से कविता कोई। बैठे रहेंगे पीठ से पीठ टिकाए और गिरती रहेगी पीली धूप। सूखे पत्तों का बना देंगे बुक्मार्क। बाँट के पढ़ेंगे मुहब्बत की किताब आधी आधी।

मैं अपनी ही मुहब्बत से डरती हूँ। अचानक से हो जाए हादसा कोई तो क्या ही करें लेकिन जानते बूझते हुए कौन भागे जाता है तूफ़ान की ओर। इक मेरे सिवा। और मुहब्बत। लम्हे में हो जाती है।
***
तुम्हारा तो नहीं पता। पर मैं चाहती हूँ तुम्हारी काली शर्ट को मैं याद रहूँ। मेरी उँगलियों की छुअन याद रहे। तब भी जब तुम्हारी बीवी उसे आधे घंटे सर्फ़ और गरम पानी वाली बाल्टी में भिगो रखने के बाद लकड़ी के पीटने से पटक पटक कर धोए। मैं चाहती हूँ कि वे बटन कभी ना टूटें जिन्हें तोड़ कर मैं अपनी जेब में रख लेना चाहती थी। वो कपास की गंध मेरी उँगलियों में घुली है। वो लम्हा भी। बहुत से अफ़सोस नहीं हैं जीवन में मगर तुम्हारी तस्वीरों को देखते हुए दुखता है सिर्फ़ इतना कि हमारी साथ में एक भी तस्वीर नहीं है। एक भी नहीं। कोई एक काग़ज़ का टुकड़ा नहीं जिसपर हमारे साझे दस्तखत हों। कोई पेंटिंग नहीं जिसपर हमने खेल खेल में रंग बिगाड़ दिए हों सारे। साथ में पी गयी कोई विस्की की याद भी कहाँ है। एक क़लम है मेरे पास जिससे तुमने किसी और का नाम लिखा था कभी। मुझे अमृता का साहिर लिखना याद आया था उस रोज़ भी। आज भी। 

आज फ़ेस्बुक पर एक पोस्ट शेयर की थी, किसी से पहली बार मिलने के बारे में। सो कुछ ऐसा है। जिन लोगों से कभी बाद में भी इश्क़ होना होता है, ज़िंदगी उनको एक ख़ास कैटेगरी में रखती है। ये वे लोग होते हैं जिनसे पहली बार मिलना मुझे हमेशा याद रहता है। अपने पूरे डिटेल्ज़ के साथ। उन्होंने कैसे कपड़े पहने थे। हमने कौन सी बात की थी। उनसे बात करते हुए मैं क्या सोच रही थी। सब कुछ। तुम्हें पहली बार देखा था तो तुम दूसरी ओर मुड़े हुए थे। पीछे से भी तुम्हें देख कर पहचान गयी थी। सिर्फ़ तुम्हारा चेहरा देखने की ख़ातिर कितना लम्बा चक्कर लगाना पड़ा था। चाँद ने पूरी कर ली थी अपनी सारी कलाएँ। तुम्हें पहली बार देखना, किसी सपने को छूना था। कॉपी में पंद्रह साल पुरानी चिट्ठी का पहली बार मिलना था। तुम्हें देखना, वाक़ई। पहली नज़र का इश्क़ था। इश्क़। 

चूँकि तुमने मुझे बहुत कम चूमा है इसलिए मेरा इतनी सी ज़िद मान लो। वे जो दो शर्ट्स थीं तुम्हारीं, सो भेज दो मेरे पास। मैं तुम्हें उन कपड़ों में किसी और के साथ नहीं देख सकती। दुखता है बहुत। 

तुम्हें मालूम है, जितने वक़्त मैं तुमसे दूर रहती हूँ, सिगरेट मुझे छोड़ देती है। तुमसे दूर रहना मेरे स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा है। लेकिन मैं सोचती हूँ कि तुम्हारे इश्क़ में जो दिमाग़ी संतुलन खोता जाता है जैसे जैसे तुमसे दूर होने के दिनों का हिसाब मैं उँगलियों पर नहीं गिन पाती। सो पागलखाने में मैं क्या ही करूँगी अपने ख़ूबसूरत जिस्म का, दीवार पर सर फोड़ने और स्मगल की हुयी ब्लेड से कट लगाने के सिवा। 

***
ज़िंदगी कहती है मुझसे। देखो, तुम्हें ख़ुद तो कभी समझ नहीं आएँगी चीज़ें और तुम यूँ ही इश्क़ में गिरती पड़ती अपना दिल तोड़ती रहोगी। सो मैं हिंट देती हूँ तुम्हें। उन लड़कों से दूर रहना जिन्हें ब्लैक शर्ट्स पसंद हैं। काला शैतान का रंग है। अंधेरे का। स्याह चाहनाओं का। गुनाहों का। दोज़ख़ का। तुम्हारे इश्क़ का। 

और बेवक़ूफ़ लड़की, तुम्हारी आँखों का भी। 

29 July, 2017

जो चूमे नहीं गए, उनके नाम

हवा और धुंध के पीछे उसका सिर दीवार पर टिका था। कभी-कभर मीता के क़दमों की आहट सुनायी दे जाती थी। उसने पैकेट से सिगरेट निकाल कर मुँह में रख ली। माचिस की तीली जलाकर मैं सिगरेट के पास ले गया। उसने सिगरेट जलाकर उसे फूँक मार कर बुझा दिया। मैं हँसने लगा।
"क्या बात है?" उसने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।
"कुछ नहीं।"
"तुम हँसे क्यूँ?"
मैंने विवशता में अपने काँधे सिकोड़ लिए।
"मुझे अब तुम्हें चूमना होगा।" मैंने कहा।
"क्यूँ?" उसने कौतुहल से मेरी ओर देखा।
"यहाँ यही प्रथा है। अगर कोई लड़की अपनी इच्छा से जलती हुयी तीली बुझा दे, तब उसका मतलब यही होता है।"
"मेरा मतलब वह नहीं था।" उसने हँसकर कहा।
"उससे कोई अंतर नहीं पड़ता।"
"तुम बहुत अभ्यस्त जान पड़ते हो।"
"फिर?" मैंने उसकी ओर देखा। 
- निर्मल वर्मा, वे दिन 
***



ये किताब है या पुराने अफ़सोसों का पुलिंदा! जाने किस किस कोने से निकल कर खड़े हो गए हैं अफ़सोस सामने। किताबों जैसे। कहानियों जैसे।

गीले। सीले अफ़सोस। धुआँते। ठंढ में ठिठुरते। एक चाय की गुज़ारिश करते।
चूमे जाने की भी।

कितना सारा अधूरा इश्क़ ज़िंदा रहता है। जब पूरा पूरा शहर सो जाता है। जब बंद हो जाती हैं सारी लाइटें। नींद के आने के ठीक पहले। पढ़ी हुयी आख़िरी किताब के पहले प्रेम के नाम। लिखना चाहते हो कौन सा ख़त? करना चाहते हो कितना प्रेम।

ये किताब पढ़ते हुए बदल जाओगे थोड़ा सा तुम भी। तुम्हें ये किताब भेज दूँगी अपने पहले। मिलूँगी जब तुमसे तो तुम्हारे सामने सिगरेट पीने के लिए माँगूँगी माचिस तुमसे। बुझा दूँगी यूँ ही। और फिर कहूँगी।

"Damn it, ये प्राग क्यूँ नहीं है!"

तुम। कि तुम्हें इतनी फ़ुर्सत कहाँ होगी कि पढ़ सको ये किताब। या कि इसके सीलेपन में धुआँती आँखों को याद दिला सको सिर्फ़ इतना सा हिस्सा ही। या कि जा सको प्राग कभी।
कहना तो ये था...
"तुम्हें, चूम लेने को जी चाहता है"। 

***
सुनो, ये किताब पढ़ लो ना मुझे मिलने से पहले। प्लीज़। मैं कह नहीं सकूँगी तुमसे। फिर लिखना पड़ेगा एक पूरा पूरा उपन्यास और जाने कितना सारा तो झूठ। जबकि सच सिर्फ़ इतना ही रहेगा।
इक धुंध में घिरी हुयी किताब पढ़ते हुए, तुम्हें चूम लेने को जी किया था।
***

दुनिया की सारी दीवारें एक जैसी होती हैं। उनका मक़सद एक ही होता है। उनकी ख़्वाहिशें भी एक ही। 
उनसे टिक कर चूमा जा सकता है किसी को। 
उनकी आड़ में भी। 

वे वादा करती हैं कि वे आपके लिए रहेंगी। वे सम्हाल लेंगी आपको।  किसी को चूमते हुए। किसी के जाने के बाद टिक के रोने के लिए भी। 

मेरी याद में बहुत सी दीवारें ज़िंदा हैं। कि मैंने उनमें जितना प्रेम चिन दिया है, उस प्रेम को साँसों की दरकार नहीं है। उस प्रेम को शब्दों की ज़रूरत होती है और मैं हर कुछ दिनों में उन नामों को ना लिखते हुए भी उनके नाम के किरदार रचती हूँ, उनके कपड़ों के रंग से आसमान रंगती हूँ, उनकी आँखों के रंग की विस्की पीती हूँ। 
***

मैं अपने हिस्से का सारा प्रेम अजनबियों के नाम लिख जाऊँगी। अफ़सोसों के नाम। दुनिया भर के आर्टिस्ट्स के नाम। जो ज़िंदा हैं और जो मर गए हैं, उनके नाम। दुनिया की हर किताब के हर किरदार से इश्क़ कर लूँगी। 

और फिर भी, मेरी जान, तुम्हारे हिस्से का इश्क़ बचा रहेगा। सलामत। 
तुम्हें ना चूमे जा सकने वाली किसी शाम के नाम। 

26 July, 2017

वो या तो प्रेम में होती या इंतज़ार में

लड़की जिन दिनों प्रेम में होती, मर जाना चाहती। 
कि वो या तो प्रेम में होती या इंतज़ार में।

फ़ोन करते हुए उसकी आवाज़ में एक थरथराहट है जिसके कारण वो उसे फ़ोन नहीं कर पा रही है। उसके आइफ़ोन में इंटेलिजेंट असिस्टेंट है उसका। बहुत ही सेक्सी आवाज़ में बातें करने वाला - सीरी। वो प्यार से कहती है लेकिन सीरी अभी इतना बुद्धिमान नहीं हुआ है लड़की की थरथराती आवाज़ से उसका नाम छान ले और ठीक फ़ोन कर ले उसको। बार बार पूछता है भौंचक्का सा…मैं कुछ नहीं समझ पा रहा हूँ। क्या चाहिए तुम्हें। लड़की पगला गयी है थोड़ी थोड़ी। हँसती है और कहती है। आइ लव यू सीरी। इंटेलिजेंट असिस्टेंट को मालूम है इसका फ़ेवरिट जवाब क्या है। जैसे कोई लड़की लजाते हुए कहती है कि उसकी आवाज़ में अदा घुल आए, सीरी कहता है, ‘Ooh stop!’। अब बस भी करो। क्या ही करगा सीरी इस प्यार का। प्यार कोई सवाल तो है नहीं कि जिसका जवाब गूगल से खोज दिया जाए। स्टेटमेण्ट के लिए सीरी के पास कुछ नहीं है। बस कुछ प्रीकोडेड रेस्पॉन्सेज़ हैं। लड़की को शिकायत नहीं है। मुश्किल है।
लड़की की आवाज़ अगर थरथरा रही है तो उसकी उँगलियों का तो हाल पूछो ही मत। नील से पड़ रहे हैं उँगलियों के पोर। ऐसी थरथाराहट का कोई क्या भी करेगा। ऐसे में तो नम्बर भी नहीं डायल हो सकता। 

लड़की टेलीपैथी से जुड़ी हुयी है उन सारे लोगों से जिनसे वो प्यार करती है। हालाँकि इस नेट्वर्क का इस्तेमाल बहुत कम करती है कि इसका रीचार्ज कराना बहुत मुश्किल है और प्रीपेड कार्ड का बैलेंस देखना भी बहुत मुश्किल। आज शाम उसने लेकिन टेलीपैथी से उस लड़के को याद किया गहरे। मुझे फ़ोन करो। 

ठीक आधे सेकंड बाद उसका फ़ोन आया। सीरी पक्का जलभुन के ख़ाक हो जाता अगर सीरी को लड़की से ज़रा भी इश्क़ होता तो। 

ज़िंदगी इतनी ठंढी हुआ करती थी कि लड़की पूरा पूरा जमा हुआ आइस ब्लॉक हो जाया करती थी। ग्लेशियर जैसा कुछ। स्टारबक्स में पीती आइस्ड अमेरिकानो। एक पूरा भर के ग्लास में आइस। और फिर दो शॉट इस्प्रेसो। कॉफ़ी ऑन द रॉक्स। कितनी ठंढ होती उसके इर्द गिर्द। 

उसके फ़ोन से उसकी आवाज़ ने निकल कर लड़की को एक टाइट बीयर हग में कस लिया। लड़की एकदम से खिलखिलाती हुयी पहाड़ी नदी बन गयी। वो कहती थी उससे। तुमसे बात करके मैं नदी हुयी जाती हूँ। खिलखिलाती हुयी कह रही थी उससे, ‘क्या तुम मेरा नाम भूल गए हो?’। 

उसके गालों में छुपा हुआ डिम्पल था जो सिर्फ़ तभी ज़ाहिर होता था जब वो इश्क़ में होती थी। उसकी मुस्कान में दुनिया के सारे जादू आ के रहा करते थे। लेकिन लड़की जब इश्क़ में होती थी और ब्लश करती थी तो उसकी आँखों की रौशनी के चौंध में उसके बाएँ गाल पर का छुपा हुआ डिम्पल दिखने लगता था। वो ऐसे में अपनी दोनों हथेलियों से अपना पूरा चेहरा ढक लिया करती थी। डिम्पल को जल्दी ही नज़र लग जाती थी लोगों की और फिर लड़की की आँखों के सूरज को कई कई सालों के लिए ग्रहण लग जाता था। 

'अच्छा बताओ, अगर मैं कहूँ तुमसे ‘मैं जल्दी मरने वाली हूँ तो कितनी देर बात करोगे मुझसे?’
‘डिपेंड करता है’
‘मैं यहाँ मरने की बात कर रही हूँ और तुम कंडिशंज़ अप्लाई कर रहे हो। छी। किस बात पर डिपेंड करता है ये?’
‘इसपर कि तुम कितने दिन में मरने वाली हो’
‘अरे, कह तो रही हूँ, जल्दी’
‘जल्दी तो एक सब्जेक्टिव वर्ड होता है, तुम जब कहती हो कि मैं जल्दी आ रही हूँ दिल्ली तो तुम एक साल बाद आती हो'

लड़की उस शहर से बहुत प्रेम करती थी। साल में एक बार आना काफ़ी होता था। साल का आधा हिस्सा फिर याद के ख़ुमार में बीतता था और बचा हुआ आधा हिस्सा उम्मीद में।

मैग्लेव जानते हो तुम? मैग्नेटिक लेविटेशन। इन ट्रेनों के नाम दुनिया की सबसे तेज़ ट्रेन होने का रेकर्ड है। आकर्षण और विकर्शन का इस्तेमाल करती हुयी ट्रेनें ज़मीन को छुए बिना ही तेज़ी से भागती रहती हैं। प्रेम ऐसा ही कुछ रचता लड़की के पैरों और ज़मीन के बीच। लड़की के क़दम हवा में ही होते। वो बहुत तेज़ भागती जाती। धरती के दूसरे छोर तक कि जैसे नाप ही लेगी उसके दिल से अपने दिल तक की दूरी।

उसके पास कोई कहानियाँ नहीं होतीं कभी कभी। कभी कभी।

उन दिनों वो कहानी के टुकड़े रचती जाती और आधे अधूरे महबूब। असमय। कुसमय मर जाने वाले किरदार। उसकी याद में अटक जाती छोटी छोटी चीज़ें। पुराने प्रेम। छूटे हुए कमरे। रजनीगंधा और गुलाब की गंध। और एक लड़का कि जिसके छूने से एक पूर्ण औरत बन जाने की चाहना ने जन्म लिया था। मगर लड़की को औरतें पसंद नहीं थीं तो वो अक्सर उनके मर जाने का इंतज़ाम करते चलती थी। उनके दुःख का। उनके बर्बाद जीवन का। 

बहुत सी चीज़ों की प्रैक्टिस करती रहती लड़की। सबसे ज़रूरी होता, एक पर्फ़ेक्ट सूयसायड नोट लिखने की भी। दुनिया से जाते हुए आख़िरी चीज़ तो पर्फ़ेक्ट हो। बस ये ही डर लगता उसको कि मालूम नहीं होता कौन सा ड्राफ़्ट आख़िरी होगा। अच्छे मूड में सूयसायड नोट लिखने का मन नहीं करता और सूयसाइडल मोड में उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि क्या लिख रही है। 

मौत से इकतरफ़ा प्यार करती हुयी लड़की सोचती, मौत का जो दिल आए जाए उस पर…मर ही जाए वो फिर तो।

घड़ी में आठ बजे थे

मुझे उसका लिखा कुछ भी नहीं याद। ना उसके होने का कोई भी टुकड़ा। उसके कपड़ों की छुअन। उसका पर्फ़्यूम। कमरे बदलने के बाद छूटे हुए फ़र्श पर छोड़ दिए गए बासी गुलदान। पुराने हो चुके तकिया खोल का बनाया हुआ पोंछा। उसके कुर्ते का रंग। 
कुछ नहीं याद। कुछ भी नहीं। 
अफ़सोस के खाते में जमा ये हुआ कि मैंने उससे एक पैकेट सिगरेट ख़रीदवा ली। जाने क्यूँ। सच ये है कि मैं उससे सिर्फ़ एक बार मिली थी। उसके बाद बदल गयी थी मैं भी, वो भी। हम दोनों आधे आधे अफ़सोस की जगह पूरे पूरे अफ़सोस हो गए थे। मुझे अफ़सोस कि पूरे पूरे दोस्त होने चाहिये। उसे अफ़सोस कि पूरे पूरे आशिक़। 

मैं उसका कमरा देखना चाहती थी। धूप में उसकी आँखें भी। मैं उसकी कविताओं की किताब पर उसका औटोग्राफ लेना चाहती थी। लेकिन वो ना कविता लिखेगा, ना कभी किताब छपवायेगा। ना मैं कभी उसके बुक लौंच पे जाऊँगी। कितने दिनों से उससे झगड़ा नहीं किया। गालियाँ नहीं दीं। उदास नहीं हुयी क्या बहुत दिनों से? बेतरह क्यूँ याद आ रहा है वो। ठीक तो होगा ना?

कभी कभी कैसे एक पूरा पूरा आदमी सिमट कर सिर्फ़ एक शब्द हो जाता है। कभी कभी सिर्फ़ एक नाम। कभी कभी सिर्फ़ एक टाइटल ही, एक बेमतलब के घिसटते हुए मिस्टर के साथ। 

मगर एक शब्द था। उसने बड़ी शिद्दत से कहा था मुझसे। इसलिए याद रह गया है।

इश्तियाक़!

एक लड़का हुआ करता था पटना में। मुस्लिम था लेकिन अपना नाम अभिषेक बताता था लोगों को। मैं इस डिटेल में नहीं जाऊँगी कि क्यूँ। मैंने पहली बार उसका नाम पूछा तो उसने कहा, अभिषेक। मैंने कहा नहीं, वो नाम नहीं जो तुम लोगों को बताते हो। वो नाम जो तुम्हारा ख़ुद का है। उसने कहा, 'सरवर'। उन दिनों उसने एक शेर सुनाया था। शेर में शब्द था, 'तिलावत'...उसने समझाया पूजा जैसे करते हैं ना, वैसे ही। उसने ही पहली बार मुझे 'वजू करना' किसे कहते हैं वो भी समझाया था। 

उसकी कोई भी ख़बर आए हुए कमसे कम दस साल हो गए। मगर मुझे अभी भी वो याद है। हर कुछ दिनों में याद आ जाता है। शायद उसने किसी लम्हे बहुत गहरा इश्क़ कर लिया था। वरना कितने लोगों को भूल गयी हूँ मैं। स्कूल कॉलेज में साथ पढ़ने वाली लड़कियाँ। ऑफ़िस के बाक़ी कलीग्स। बॉसेज़। हॉस्टल में साथ के कमरे में रहने वाली लड़की का नाम। मगर उस लड़के को कभी भूल नहीं पाती। उसे कभी लगता होगा ना कि मैं उसे याद कर रही हूँ, मगर फिर वो ख़ुद को समझाता होगा कि इतने सालों बाद थोड़े ना कोई किसी को याद रखता है। मैं कभी उससे मिल गयी इस जिदंगी में तो कहूँगी उससे। तुम्हें याद रखा है। जिन दिनों तुम्हें लगता था कि मेरी बहुत याद आ रही है वो इसलिए कि दुनिया के इस शहर में रहती मैं तुम्हें अपने ख़यालों में रच रच के देख रही थी। तुम्हारी आँखों का हल्का भूरा रंग भी याद है मुझे।

शायद ईमानदारी से ज़्यादा ज़रूरी लोगों के लिए ये होता हो कि क्या सही है, क्या होना चाहिए। समाज के नियमों के हिसाब से। हर बात का एक मक़सद होता है। रिश्तों की भी कोई दिशा होती है। मैं बहुत झूठ बोलती हूँ। एकदम आसानी से। मगर जाने कैसे तो लगता है कि मेरे दिल में खोट नहीं है। रिश्तों को ईमानदारी से निभा ले जाती हूँ। आज ही छोटी ननद से बात करते हुए कह रही थी, कोई किसी को ज़बरदस्ती किसी को 'मानने' पर मजबूर नहीं कर सकता है। हमारे बिहार में 'मानना' स्नेह और प्रेम और अधिकार जैसा कुछ मिलाजुला शब्द होता है जिसका मायना लिख के नहीं बता सकते। तो हम लोगों को बहुत मानते हैं। कभी कभी जब बहुत उदास होते हैं कि मेरी ख़ाली हथेली में क्या आया तो ज़िंदगी कुछ ऐसी शाम। कुछ ऐसे लोग भेज देती है। कि शिकायत करना बंद करो। नालायक।

मैं अब भी लोगों पर बहुत भरोसा करती हूँ। दोस्तों पर। परिवार पर। अजनबियों पर। मुझे हर चीज़ को कटघरे में रख के जीना नहीं आता।

एक बार पता नहीं कहीं पढ़ा था या पापा ने बताया था। कि जो बहुत भोला हो उसे आप ठग नहीं सकते। उसे पता ही नहीं चलेगा। वो उम्र भर आप पर भरोसा करेगा।

ईश्वर पर ऐसा ही कोई भरोसा है।
और इश्क़ पर भी।

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