09 April, 2014

उसकी गर्दन का नीला आर्किड आँसुओं के इंतज़ार में प्यासा था

वे शब्द बड़े जिद्दी थे. उस लड़की की ही तरह. अपनी ही चाल चलते, मनमानी। कलम की निब के साथ भी दिक्कत थी थोड़ी, जरा सी बस उत्तर अक्षांश की ओर झुकी थी, जैसे धरती चलती है न डगमग डगमग, वैसे ही कलम भी चलती थी उसकी, जरा सी नशे में झूमती। कलम में समंदर का पानी भरा हुआ था कि जिससे लड़की कहानियां लिखा करती थी. लिखते हुए उसे कुछ मालूम न होता कि वो क्या लिख रही है. कई दिनों बाद सूखे हुए कागज़ पर ब्रेल लिपि जैसा कुछ लिखा रहता जिसे बस वो लड़का पढ़ सकता था जिसकी कलम से पहली बार लड़की ने कहानी लिखी थी.

लड़का भी जिद्दी था अजीब, ये नहीं कि रोज मिल कर कहानियां पूरी कर जाए. कभी सदियों में एक बार आता. लड़की भी वैसी ही पागल, इंतज़ार के आँसुओं को बचा कर रखती। लड़की की गर्दन के पास फूलों की बेल उगने लगती जिसमें वॉयलेट रंग के ऑर्किड खिलते। लड़के को आर्किड बहुत पसंद थे, वो जाने के पहले लड़की को गले लगाता तो खुश्बू में डूबे ऑर्किड्स उसके होटों को छू जाते। लेकिन ऑर्किड्स में खुद की कोई खुशबू नहीं होती, वे लड़की की गंध से पलते बढ़ते थे. लड़के को मालूम नहीं था कि आर्किड परजीवी होते हैं, उनका स्वतंत्र कोई वजूद नहीं होता। इश्क़ भी ऐसा ही होता है न कुछ.

पिछली बरसातों में जब लड़का उससे मिलने आया था तो खपरैल वाली छत से पानी लगातार बह रहा था. लड़की के लिखे हुए कागज़ों में सीलन लगने लगी थी. नमक यूँ भी पानी बहुत सोखता है.  लड़की को वैसे तो कहानियां सुनाना पसंद नहीं था और वो अक्सर लिख कर भूल भी जाती थी किरदारों को. लड़का इस बार लैपटॉप लेकर आया था कि ये लिखने पढ़ने के झमेले से हमेशा के लिए निजात मिल जाए. लड़की की कहानियां मगर हुस्नबानो को टक्कर देतीं। हर रात उसकी कहानी के किरदार बदल जाते। कभी कोई नया किरदार उग आता. लड़का एकदम हैरान परेशान हो जाता कि उसे कोई उपाय ही नहीं सूझता। लड़की बंजारन थी, हवाओं पर थिरकती, लड़का उसके साथ देश देश घूमता। हर  किस्सा लिखता। उसे मालूम नहीं चला कब लड़की उसका हाथ  पकड़ कर सड़कों पर चलने लगी, कब लड़की की कलम ने लड़के की आँखों के काले रंग से किरदार रचने शुरू कर दिए. ये किरदार मायावी होते थे, लड़के के जानी दुश्मन। ईर्ष्या और डाह में जलते हुए ये नित काला जादू करते थे. उनका उद्देश्य था लड़के की कलम में इत्र भर देना कि वो जो भी लिखे लड़की की खुश्बू में डूबा लिखे। वे चाहते थे वो लड़की का गुलाम बन कर ताउम्र उनके साथ समंदर किनारे उस छोटे से एक कमरे के घर में रहे. एक तरह से देखा जाए तो उनका डाह प्यार का ही एक रूप था. उस प्यार का जो लड़की कभी उससे कर नहीं पायी, कह नहीं पायी। ये अधूरे, प्यासे किरदार थे मगर उनमें लेशमात्र भी डर नहीं था. 

लड़के की घड़ी में वक्त और दिन दोनों दिखते थे मगर लड़का भूल गया था कि उसने दाहिने हाथ में घड़ी पहन ली है. इक शाम साथ टहलते हुए उनके हाथ हौले से आपस में छू जा रहे थे. लड़की दाहिने हाथ में घड़ी पहनती थी, लड़का बाएं। हाथ टकराने से घड़ियों के ख़राब हो जाने का अंदेशा था. उस लम्हे से लड़का वक्त की सारी गिनती भूल गया था. उसकी सुबहें लड़की की मुस्कुराहटों से होती और शामें गुमे हुए पन्नों से धुंधलाये शब्द तलाशते गुजरतीं। लड़की की कहानियां लिखते लिखते उसकी उँगलियों में भी आर्किड उगने लगे थे. उसके नाखून नीले पड़ने लगे और आँखों का रंग भी काले से नीले में परावर्तित होने लगा.

उसे मालूम नहीं चला कब वो नीले रंग के आर्किड में पूरी तरह परिवर्तित हो गया. लड़की के लिखे में अब इश्क़ नहीं होता, उसके आंसू जब गालों से ढुलक कर कभी गर्दन पर गिर पड़ते तो उस इकलौते नीले आर्किड से समंदर की खुशबू आती.

06 April, 2014

समंदर की बाँहों में - डे २- पटाया

रात थी भी क्या? सुबह उठी तो लगा कि कोई सपना देखा है। सपने में बहुत सारा पानी था। समंदर था। डूबता सूरज था। फिर बालकनी में गयी तो दूर तक फैला नीला-हरा समंदर दिखा। ख्वाब नहीं था। नेहा उठ गयी थी। बगल वाले बालकनी से भी आवाज आ रही थी। नेहा ने तब तक मार्क को कौल कर लिया था। जौर्ज और मार्क का रूम हमारे रूम के नीचे वाले फ्लोर पर था। फोन किया तो मार्क  तैयार होकर नाश्ता कर चुका था और कमबख्त ने जौर्ज को उठाया तक नहीं था। हम दोनों पहले बौस को उठाने का शुभ काम निपटाये, कौफी पी थी या नहीं अब याद नहीं। मेरी आवाज अच्छी खासी लाउड है, उस पर नेहा साथ हो तो बस। पूरी बिल्डिंग न उठ गयी गनीमत है।

सब लोग फटाफट रेडी हो कर खाने पहुंच गये। शेरटन का ब्रेकफास्ट बढ़िया था एकदम। आज का प्लान था कोरल आईलैंड जाने का। बस टाईम पर आ गयी थी। लोगों ने शौर्टस वगैरह खरीदीं, कुछ ने टोपी भी लीं। फिर हम स्पीडबोट पर बैठ कर आइलैंड की तरफ चल दिए. समंदर में स्पीडबोट ऐसे चलती है जैसे बैंगलोर की सड़कों पर मेरी बाइक, कसम से क्या स्पीडब्रेकर थे समंदर में. लहर लहर पर उछलती स्पीडबोट। बहुत सारा पानी उड़ता हुआ. नमक का खारा पानी। दूर तक दिखता खूबसूरत समंदर। कैमरा वैगेरह मैंने बैग में ही डाल दिया था. कभी कभी जीना रिकॉर्ड करने से ज्यादा जरूरी और खूबसूरत होता है. बीच समंदर में कहीं एक बड़ी सी बोट पार्क थी. वहाँ पर लोग पैरासेलिंग कर रहे थे. टीम में सबने पैरासेलिंग की. नेहा। जॉर्ज। बग्स। अनिशा। मैंने नहीं की :( वो जो पैराशूट को पानी में डुबाते हैं वो देख कर मेरी जान सूखती है.


वहाँ से आइलैंड के पास एक और बोट पार्क थी. वहाँ आप मछलियों को देखने पानी के अंदर जा सकते थे. मुझे क्लौस्ट्रफ़ोबिया है. बंद जगहों से डर लगता है. उस पर पानी से तो और भी डर लगता है. यहाँ पर दोनों का कॉम्बिनेशन था. एकदम किलर। एक हेलमेट पहनना होता है, जैसे स्पेस ट्रैवेलर पहनते हैं न, वैसा और फिर आप पानी में नीचे चल सकते हैं. कुल मिला कर बीस मिनट का प्रोग्राम था. पहले तो मैंने सोचा नहीं जाउंगी पर देखा कि सब जा रहे हैं. तो बस ज्यादा सोचे बिना भाग के गयी कि मैं भी जाउंगी। इंस्ट्रक्टर ने बताया कि नीचे पानी के दबाव के कारण कान में दर्द हो सकता है, ऐसे में हेलमेट के नीचे से हाथ डाल कर नाक बंद करनी होती है और तेजी से सांस बाहर निकालनी होती है ताकि कान से हवा निकले। ऐसा करने के बाद दर्द बंद हो जाएगा। किसी भी हाल में घबराने की जरूरत नहीं है. लोग आसपास ही रहेंगे। अगर सब ठीक है तो ओके का साइन नहीं तो तर्जनी से ऊपर की ओर इशारा करने पर ऊपर ले कर आ जायेंगे। फिर सबने समझाया कि घबराना मत, सारे मेरे साथ हैं. मेरा सफ़ेद हुआ चेहरा शायद दिख रहा होगा सबको। पानी में पैर डालते ही मेरे होश फाख्ता होने लगे. मगर मैंने खुद को कहा कि मैं कर सकती हूँ. मुझे बस गहरी सांस लेनी है, बाहर छोड़नी है. बस. हेलमेट पहनाया गया तभी लगने लगा कि बड़ी आफत  मोल ली है, मुझसे नहीं होगा। पानी के अंदर बोट की सीढ़ियां उतर कर गहरे पानी में जाना था. कोई बहुत सी सीढ़ियों के बाद इंस्ट्रक्टर ने पैर पकड़ कर नीचे गहराई में खींच लिया। जाने कितने फीट नीचे थे हम पानी में. कानों में बहुत तेज़ दर्द हुआ और बहुत डर लगा. जैसे कि दम घुट रहा है और जान चली जायेगी। इंस्ट्रक्टर बार बार ओके का साइन बना के पूछ रहा था कि सब ठीक है और मुझे कुछ ठीक लग ही नहीं रहा था. जॉर्ज भी सामने, कितनी बार उसने भी ओके का साइन बना के पूछा। मगर मुझे इतनी घबराहट हो रही थी कि लगा जान चली जायेगी। मुझे आज तक उतना डर कभी नहीं लगा था. ऊपर जाने कितना गहरा पानी था. हम पानी में जाने कितनी दूर और कितनी देर तक चलने वाले थे. सब कुछ स्लो मोशन में था। मुझे लगा मुझसे नहीं होगा। मैंने ऊपर जाने का सिग्नल दिया। इंस्ट्रक्टर मुझे लेकर ऊपर आ आया.

जैसे ही पानी से बाहर आयी जान में जान आयी. फिर मालूम चला कि नहीं जाने पर भी जो ढाई हज़ार रुपये लगाए हैं वो वापस नहीं मिलेंगे। फिर ये भी लगा कि डर गयी तो हमेशा डर लगता रहेगा। अपनी बहादुरी का झंडा जहाँ तहां गाड़ते आये हैं यहाँ कैसे हार मान जाएँ। एक बार ये भी लगा कि सब चिढ़ाएगा बहुत। उस वक्त ऑफिस की टीम का कोई भी नहीं था बोट पर, सब लोग नीचे थे पानी में. एक थाई लड़की थी, उसने समझाया कि पांच मिनट में सब नॉर्मल हो जाएगा, बस गहरी सांस लेते रखना...याद रखना कि पानी में सांस लेना भी एक काम होता है. हिम्मत करके चली जाओ. उस वक्त लग रहा था कि इश्क़ के बारे में भी तो ऐसे ही कुछ नेक ख्याल हैं मेरे। फिर जब इतना खतरा वाला तूफानी काम करने में कभी डर नहीं लगा कि तो ये अंडरवाटर वॉक क्या है. मैं कर लूंगी। मैंने कहा कि मैं फिर से अंदर जाना चाहती हूँ. बोट पर जितने क्रू मेंबर थे सबसे खूब तालियां बजा कर मेरा उत्साह बढ़ाया। मैं फिर पानी में उतरी। वापस बहुत सी सीढ़ियां और नीचे। नीचे बग्स और जॉर्ज थे सामने। उनके चेहरे पर 'यु हैव डन इट गर्ल' वाला भाव था. मैंने गहरी गहरी सांसें लीं और जैसा कि इंस्ट्रक्टर ने कहा था चुविंगम चबाती रही. सारा ध्यान सांस लेने पर. थोड़ी देर में सब नॉर्मल लगने लगा. सारे लोग एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे. मेरे एक तरफ जॉर्ज और एक तरफ बग्स  था. एक आधी बार लगा कि कहीं बेचारों का हाथ फ्रैक्चर न हो जाए मैंने डर के मारे इतनी जोर से पकड़ रखा था. फिर सामने बहुत सारी मछलियां आयीं। ये किसी बड़े अक्वेरियम में होने जैसा था. सब कुछ एकदम साफ़ दिख रहा था. मछलियां जैसे स्लो मोशन में सामने तैरती थीं. चटक पीले रंग की मछलियां, गहरे नीले रंग की मछलियां, कोरल, सी स्पंज और बहुत सारा कुछ. इंस्ट्रक्टर हमें ब्रेड का एक टुकड़ा देता था हाथ में और मछलियां ठीक आँखों के सामने आकर उसे खाने लगती थीं. मुझे पिरान्हा याद आने लगी थी. हम जाने कितनी देर तक समंदर के अंदर चलते रहे. ये सब सपने जैसा था. सब कुछ एकदम ठहरा हुआ. कोई फ़ास्ट मोवमेंट नहीं। धीमे धीमे चलना। आसपास की खूबसूरती को देखना। महसूसना। जीना।

वक्त ख़त्म हुआ तो हम बोट पर वापस आ गए. सबने शब्बाशी दी कि मैंने डर पर काबू पा लिया। कि मैंने हिम्मत की. डर के आगे जीत है :) फिर हम स्पीडबोट से आइलैंड पर गए. बैग वैग धर कर सारे लोग समंदर की ओर दौड़े। मुझे तैरने का एक स्टेप आता है बस तो मैं बस पानी में चल रही थी. जॉर्ज और नेहा फ्लोट कर रहे थे. उन्हें देख कर मुझे बहुत रश्क हो रहा था कि काश और कुछ भी न आये स्विमिंग करने में बस फ्लोट करना आ जाए किसी तरह. जॉर्ज बहुत अच्छा टीचर है, सिखाने की बात पर एकदम एंथु में आ जाता है. उसने कहा खुद को पानी में छोड़ के देखो, नहीं डूबोगी और कमर भर पानी में कोई डूबता है भला और उसके भी आगे मैं हूँ बचने के लिए. मैंने एक आध बार कोशिश की और हर बार डूबने लगती थी. फिर मुझे लगा कि नहीं होगा मुझसे। सब लोग फिर पानी में नॉर्मल बदमाशी कर रहे थे. तैरना बहुत कम लोगों को आता था. मैं थोडा और गहरे पानी में गयी कि घुटने भर पानी में तो फ्लोट नहीं ही होगा। समंदर एकदम शांत है वहाँ। कोई लहरें नहीं। उसपर पानी गर्म। जैसे गीजर से आ रहा हो. चूँकि बहुत सारे लोग थे आसपास तो डूबने का डर नहीं लग रहा था।  मैंने गहरी सांस ली और रोक ली. खुद को पानी में छोड़ दिया। बाँहें खोल लीं और पैरों के बीच लगभग डेढ़ फुट का फासला बना लिया। मैं पानी में ऊपर थी. एकदम फ्लैट। कान पानी के नीचे थे. पानी का लेवल चेहरे के पास था. बस नाक ऊपर थी पानी में. मैंने आँखें भींच रखी थीं. यकीं नहीं हो रहा था लेकिन आई वाज फ्लोटिंग। मैंने आँखें बंद रखीं और जोर से चीखी 'जॉर्ज आई एम फ्लोटिंग'. इसके थोड़ी देर बाद मैं पानी में वापस खड़ी हो गयी. इतना अच्छा लग रहा था कि क्या बताएं। फिर मैंने देखा कि ऑफिस के सारे लोगों ने नोटिस किया कि मैं वाकई फ्लोट कर रही थी. बस फिर क्या था सारे लोग जॉर्ज के पीछे कि मुझे भी सिखाओ। जॉर्ज ने लगभग सबको फ्लोटिंग सिखायी। कुछ देर बाद तो इतना मजा आ रहा था जैसे फ्लोटिंग क्लास चल रही हो. मैंने अनिशा और प्रदीप को फ्लोटिंग सिखायी। अनिशा ने कर लिया मगर प्रदीप के लिए जॉर्ज की जरूरत पड़ी. वो डूबता तो उसे मैं बचा भी नहीं पाती ;) बेसिकली पानी में सबसे डर सर नीचे करने में लगता है. सब एक बार उस डर से उबर गए तो फ्लोटिंग बहुत आसान है.

मुझे वो पहली बार फ्लोटिंग जिंदगी भर याद रहेगी। पहले बहुत सा शोर था. बहुत से लोग. फिर बाहें फैला कर पानी में पीठ की और हौले से गिरना होता है, ऐसा भरोसा कर के कि कोई है जो बाँहों में थाम लेगा, जैसे समंदर पानी का कोई मखमली गद्दा हो. साँस रोके हुए. फिर पहली सांस छोड़ते हुए महसूस होता है कि सब कुछ शांत हो गया है. कहीं कोई आवाज नहीं है. कहीं कुछ भी नहीं है. बहुत शांति का अनुभव होता है. इस शोर भरी दुनिया में जैसे अचानक से पॉज आ जाता है. पानी चारो तरफ होता है. जैसे समंदर चूम रहा हो. जिस्म का पोर पोर. Its like a giant hug by the sea. समंदर की बाँहों में जैसे बहुत सा सुकून है. जिंदगी भर का सुकून।

श्रीकांत -पैरासेलिंग के बाद
किसी का वापस जाने का मन ही ना करे. मगर लंच का टाइम हो रहा था. वापस तो जाना ही था. सब झख मार के वापस आये. कपड़े बदलने की जगह नहीं थी और वक्त भी नहीं। किसी जगह शायद ४० बाथ (लगभग ८० रुपये) देने थे तो सर्वसम्मति से निर्णय हुआ कि बोट पर चलते हैं. लंच करके होटल चले जायेंगे और वहीं कपड़े बदल लेंगे। मौसम गर्म था तो कपड़े सूख भी जाते। अब मेरी चप्पल ही न मिले। भारी दुखी हुयी मैं. अभी कुछ दिन पहले क्रॉक्स खरीदी थी, ढाई हज़ार की चप्पल का चूना लग गया. बहरहाल हम किनारे लौटे। हमारी बस नहीं आयी थी. धूप के कारण जमीन बहुत तप रही थी और पैर रखना पौसिबल नहीं था।  जॉर्ज ने कहा जब तक बस आती है चलो तुमको चप्पल दिलाता हूँ नहीं तो यहीं भंगड़ा करती रहोगी। हम भागे भागे आये चप्पल लेने। जब जो चाहिए होता है उसके अलावा सब कुछ मिलता है दुनिया में. समुद्र किनारे घड़ी घड़ी लोग चप्पल बेच रहे थे और हम खरीदने चले तो चप्पलचोर सारे नदारद। कुछ दूर जाके फाइनली चप्पल मिली तो हम खरीद के वापस आये. अब ऑफिस के सारे लोग गायब। फोन करो तो कोई फोन न उठाये। मैं, जॉर्ज, रवि और श्रीकांत थे. वहाँ एक मॉल था और सबका वहीं अंदर जाने का प्रोग्राम था. मैंने देखा कि ऊपर फूड कोर्ट है. अब चूँकि ऑफिस में सब तरह के लोग हैं तो मुझे लगा कि लोग फूड कोर्ट ही गए होंगे खाने के लिए कि सबको अपनी पसंद का खाना मिल जाए तो जॉर्ज और मैं ऊपर देखने बढ़े. ऊपर गए तब भी कोई नहीं दिखा और तब तक भूख के मारे जान जाने लगी. तैरने के बाद एक तो वैसे ही किलर भूख लगती है उसपर मुझे भूख बर्दाश्त नहीं होती। हमें एक इन्डियन जगह दिख गयी. वहाँ छोले भटोरे थे. बस हिंदी में आर्डर किया मजे से और एक ग्लास अमरुद का जूस. मेरा बैग चूँकि मेरे पास था तो पैसे, कपड़े सब थे पास में. जब तक खाना आया मैंने चेंज भी कर लिया वाशरूम में जा के. कसम से क्या कातिल छोले भटोरे थे, मैंने आज तक वैसे छोले भटोरे भारत में नहीं खाये कभी. खाना खा रहे थे तो रहमान का कॉल आया जॉर्ज को, वो लोग इसी मॉल में दूसरे फ्लोर के रेस्टोरेंट में खाना खा रहे थे. बस के आने में डेढ़ घंटे का टाइम था. खाना खाते, गप्पें मारते कब वक्त निकल गया मालूम ही नहीं चला. बाकी लोगों का खाना हो गया तो नेहा और बग्स भी ऊपर आ गए. कुछ देर हम सब समंदर निहारते रहे. फ़ोटो खींचते रहे और जाने क्या क्या बतियाते रहे. टीम में मेरे आलावा सिर्फ बाला वेजिटेरियन है. बस में उसको खूब चिढ़ाये कि हम तो छोला भटूरा खाये, तुम क्या खाये ;) ;)

रात को ऐलकजार शो था, बेहतरीन म्यूजिक, कॉस्चुम और सेट डिजाइन। मैंने उतना खूबसूरत शो नहीं देखा है आज तक. सब कुछ बेहतरीन था वहाँ।  फिर समंदर किनारे एक रेस्टोरेंट में खाना। ग्रीन सलाद। वेज आदमी को और क्या मिलेगा। बहुत सी कहानियां कहीं, कुछ सुनीं। थोड़ा भटकी। दिवाकर रास्ता खो गया था उसको उठाये और फिर होटल वापस। हम ऑफिस में जिनके साथ काम करते हैं और घूमने जिनके साथ जाते हैं उनमें कितना अंतर होता है. इतना अच्छा लगा सबको ऐसे जानना। हमेशा किसी नए से बात करना। कोई नया किस्सा सुनना। हिंदी में सवाल करना, तमिल में जवाब सुनना, मलयालम में लोगों का बतियाना। उफ्फ्फ्फ़ ही था बस.

पटाया में आखिरी दिन था. अगले दिन बैंगकॉक के लिए निकलना था. हम स्विमिंग पूल में पैर डाले बैठे रहे. बतियाते। हँसते। दिल भर सा आया था. मुझ सी को ऐसे पूरा का पूरा ऐक्सेप्ट करना थोड़ा मुश्किल है. मेरा शोर. मेरा पागलपन। सब कुछ. मगर सब ऐसे थे जैसे एक बड़ा सा परिवार, जिसमें शामिल होने की कोई शर्त नहीं होती। बहुत अच्छा सा लगा. सुकून सा.
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समंदर था कि आसमान था कि समंदर में पिघलता हुआ आसमान था. जमीन कहाँ ख़त्म होती है आसमान कहाँ शुरू। समंदर से पूछूं उसे मेरा नाम याद रहेगा? सितारे हैं या कि आँखों में यादों का जखीरा।

शुक्रिया जिंदगी। इन मेहरबान दो दिनों के लिए. 

04 April, 2014

स्मोकिंग। इश्क़

लड़की थी। सिगरेट का आखिरी कश। तलब। इंतजार का चुभता स्वाद। ऐब्सिन्थ विद शुगर। टकीला शॉट। नीट स्कॉच विदाउट आईस। प्योर ड्रग। 
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आधी भरी डिब्बी से सिगरेट निकाली, बहुत देर तक उसे यकीन नहीं हुआ कि खुदा ऐसी गलती भी कर सकता है। दरगाह के बाहर के फकीर ने उसके माथे पर हाथ रख कर दुआ दी थी, तुम्हारी रूह को तुम्हारे जिस्म से आजाद करता हूँ। चाहे कितनी भी खरोंचें आ जाएं जिस्म पर, तुम्हारी रूह हमेशा यूँ ही रहेगी, दुआओं की खुश्बू से सराबोर, इश्क़ से लबालब। बांटने में कभी तुम्हारा हाथ तंग नहीं होगा। फिर कैसे हो गया था ऐसा, जिस्म पर खरोंच का एक निशान भी नहीं...दर्द इतना गहरा कि लगता था रूह में ज़ख्म हों। झूठा फकीर था या कि इश्क़? 

इस न समझ आने वाली दुनिया में उसकी सुरक्षा के लिए सिर्फ चुप्पी थी। ख़ामोशी से उसे सारी जद्दोजहद महसूस करनी थी। उसके सारे ख़त उसके सीने में दफ़न होने वाले थे। सिगरेट की डिब्बी पड़ी हुयी थी। उसने पहली सिगरेट निकाली और गहरी सियाही वाली कलम से ऊपर लिखा 'आई लव यू'। कितना कुछ कहना चाहती थी उससे मगर इससे ज्यादा तकलीफ होती तो मर जाती वो। सेल्फ प्रिजर्वेशन भी जरूरी है। लाइटर की लौ उसकी आँखों में इस तरह लपकती जैसे सब कुछ ख़ाक करना का माद्दा रखती हो। हर स्पर्श, हर चुम्बन, मुस्कराहट का हर लम्हा जो रूह पर छाप छोड़ गया है जलता जाता। उसका नाम लेना चाहती मगर हर कश के साथ होंठ जल उठते। 'ही लव्स मी'। हर दूसरी सिगरेट के साथ दुनिया एक गहरा समंदर बन जाती जिसमें उसके पैर जमीन से बहुत ऊपर थे। किनारा बहुत दूर। सांस एक ही थी। गहरी। डूबने के जरा सा पहले। 'ही लव्स मी नॉट'। 

चेन स्मोकिंग। इश्क़ जैसा ही है न। एक ख़त्म होते ही दूसरे की तलब लगती है। 

पहला पैकेट ख़त्म होने पर भी होश बाकी थे। जबकि ऐसा कोई वादा नहीं था, फिर भी लड़की को धोखा होता था कि इश्क़ कहीं होगा आसपास ही, छुपा हुआ। इश्क़ को होना चाहिए था। इतनी तकलीफ में वो उसे अकेला कैसे छोड़ सकता है। कहीं तो छुप के बैठा होगा। आखिरी सिगरेट के आखिरी कश में शायद। बाकी सिगरेटों में उसकी तलाश जारी रही। 'ही लव्स मी, ही लव्स मी नॉट'। 

लिक्विड आँखें थी उसकी। गहरी सियाह। लड़की ने घूँट घूँट उतारा है उन आँखों को खुद के अंदर। कितनी मुखर। कितने सारे कवियों की भाषा समझतीं। उसकी आँखें कुछ कहने नहीं देती लड़की को। सिर्फ चूमते हुए चुप होतीं...मगर उस वक्त लड़की के शब्द खो जाते। उन आँखों को देख कर उसका ब्लैक इंक से लिखने को जी चाहता। 

गहरे ज़ख्म थे। खुले हुए। यूँ भरने में बहुत वक्त लगता। सिगरेट पर उसने लिखा था 'यू टच्ड मी हियर'। सिगरेट सुई थी, धुएँ का धागा और सारे ज़ख्मों पर टाँके लगाने थे। धुआँ बहुत रहमदिल था। चूमता जाता जैसे कि जादू हो। हर टाँके के साथ लड़की का यकीन कुछ और पक्का होता जाता कि आँसुओं के खारे पानी में एक दिन गोता लगाने का हुनर सीख लेगी। जिद्दी थी बहुत। अपनी तकलीफों से कहीं ज्यादा। 

समंदर ने लड़की की साँसें अपने पास जमा रखी थीं। उसे मालूम था कि बिना तैरना जाने, बिना किसी ऑक्सीजन मास्क के, पगली फिर से डीप डाइव मारने आएगी। उसके क़त्ल का इल्ज़ाम समंदर अपने सर नहीं चाहता था। उसने लहरों के हाथ संदेशे भेजे। लड़की की आँखों का खारा पानी समंदर को पागल किये जा रहा था। समंदर पूरी दुनिया को बाँहों में भर कर तोड़ देना चाहता था। डुबा देना चाहता था वो टापू जिसके किनारे लड़की ने उसके होंठ चूमे थे और अब जान देने की जिद किये बैठी थी। समंदर के पास कोई चाँद वाली बुढ़िया भी नहीं थी जो लड़की को समझाती कि ईश्क़ को वोलंटरी रिटायरमेंट लिए बहुत वक़्त हुआ। डांट का असर लड़की पर होना नहीं था। 


मजबूर समंदर के पास कोई चारा नहीं बचा था। उसकी लहरों ने लड़की की सिगरेट पैकेट से सारे लफ्ज़ मिटा दिए। उसकी यादों से वो सारे लम्हे धुल गये कि जो उसकी साँस में अटक रहे थे। लिक्विड आँखें। सीली मुस्कुराहटें। उसकी बाँहों का कसाव। उसकी आवाज में पुकारा गया नाम। बस आखिरी सिगरेट पर का आखिरी लफ्ज़ मिटाते हुए समंदर भी रो पड़ा...बेहोश लड़की की उँगलियों में फँसी हुयी आखिरी सूखी सिगरेट थी...उसपर लिखा हुआ था 'ही लव्स मी नॉट'। 

03 April, 2014

अ मैड ट्रिप टु पटाया- डे १

याद से सब कितनी जल्दी फिसलता जाता है.
पिछले वीकेंड हमारा पूरा ऑफिस पटाया गया था, थाईलैंड में एक जगह है 'पटाया' नाम की :)
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याद कितनी जल्दी बिसरने लगती है. लोग. नाम. जगहें। सब.

यहाँ सिर्फ कुछ चीज़ों को सकेर रही हूँ क्यूंकि जिस तरह से भूल रही हूँ सब लगता है कुछ ही दिनों बाद यकीन भी नहीं होगा कि हम गये भी थे. घर से एयरपोर्ट के लिए अनु और अनिशा भी साथ थे. टीम से अधिकतर लोग पहली बार विदेश जा रहे थे. पूरा हंगामे का मूड था सबका। इतनी एनेर्जी थी  कि उससे पूरा एयरपोर्ट चार्ज हो जाता। पतिदेव और सासुमाँ को टाटा बोल कर तीन दिन की छुट्टियों पर निकल गए. मैं आज तक कभी ऐसे ऑफिस ट्रिप पर नहीं गयी थी. पिछले साल हम सबने वाकई जान धुन कर काम किया था उसका रिवार्ड था तो सेन्स ऑफ़ अचीवमेंट भी थी.

ट्रिप की मेरी सबसे फेवरिट फोटो- जॉर्ज
टिकट चूँकि सबकी ग्रुप में बुक थी इसलिए हम अपनी सीट खुद चुन नहीं सकते थे. चेक इन के वक्त सीट नंबर आये तो मेरी और नेहा की सीट साथ में थी. हमने बहुत ढूँढा कि बेचारा और कौन फंसा है हमारे साथ तो पता नहीं चला. प्लेन बोर्ड कर गए तो नेहा, जॉर्ज और हम साथ में सामान ऊपर के कम्पार्टमेंट में रख रहे थे. वो तीसरी सीट प्रियंका की थी. जॉर्ज ने पूछा, कि वो सीट जॉर्ज से बदलना चाहती है कि नहीं तो उसने कहा बिलकुल नहीं, फिर जॉर्ज ने उससे पूछा 'तुम्हें मालूम है तुम्हारी सीट किसके पास है, पूजा के' :) फिर तो हमारे नाम का टेरर कुछ ऐसा है कि उसने एक बार भी कुछ नहीं कहा और सीधे जॉर्ज की सीट पर शिफ्ट हो गयी. मैं और नेहा अकेले अकेले भी कम आफत नहीं हैं मगर एक साथ हम दोनों को झेलना बहुत हिम्मत का काम है. हम और नेहा दोनों साइड की सीट पकड़ के बैठ गए और जॉर्ज को बीच में सैंडविच कर दिया। हम सारे लोग पगलाये हुए थे. रात के एक बजे की फ्लाईट थी लेकिन हम न सोयेंगे न किसी और को सोने देंगे की फिलॉस्फी में यकीन करते हैं. तो पूरे टाइम खुराफात चलती रही कभी सामने वालों की सीट पर तकिया फेंकना, बाकि सोये हुए लोगों को मार पीट के उठाया इत्यादि कार्य हमने पूरी डेडिकेशन के साथ किये। मेरे आसपास की सीट पर किशोर, सतीश, श्रीकांत, प्रदीप और पीछे की सीट पर दिवाकर, अनु, अनिशा, प्रियंका थे. राहिल मेरे से ठीक कोने वाली सीट पर था. एक सतीश के आलावा सारे लोग खुराफाती थे. इन फैक्ट जब आस पास के लोगों को परेशान करके दिल भर जाता था तो हम सारे उठ के दूसरे आइल में चले जाते थे और कुछ और लोगों को जगा देते थे. कोई बेईमानी नहीं, सबको बराबर आफत लगनी चाहिए। We were all high...on life and we were gonna have the time of our lives.

 Tiger zoo- me, bugs, maryam, anu, maya, dhiva, ani
ऑफिस में रहते हुए काम ऐसा रहता है कि बात करने की फुर्सत नहीं मिलती। लगभग दो साल होने को आये लेकिन मैंने कभी जॉर्ज को अपनी लिखी कोई कहानी नहीं सुनायी थी. सोने टाइम कहानी सुनना अच्छा भी लगता है. मैंने उसे तीन कहानियां सुनायीं। मजे की बात ये थी कि मैं कहानी सुना रही हूँ और वो मुझे बताता जा रहा है कि इसे ऐसे शूट कर सकते हैं, ये वाली चीज़ बहुत अच्छी लगेगी और मैं हल्ला कर रही थी कि ध्यान से कहानी सुनो न आप अपनी ही पिक्चर बनाने लगते हो. उसने बोला कि मेरी कहानियां ऐसी होती हैं, सुन कर सब कुछ दिखने लगता है आँखों के सामने। फिर मैंने कहा कि काश आप हिंदी में मेरी कहानी पढ़ पाते क्यूंकि सुनाने में सिर्फ प्लाट रह पाता  है. मगर उसे मेरी कहानियां बहुत अच्छी लगीं। मुझे भी अच्छा लगा क्यूंकि उसकी राय इम्पोर्टेन्ट थी. बहुत कम लोगों की बात को ध्यान से सुनती हूँ. उसके साथ के इतने वक्त में इतना हुआ है कि उसकी बहुत रेस्पेक्ट करती हूँ. चीज़ों को लेकर उसकी समझ गहरी है ऐसा मैंने देखा है. उसे मेरी कहानियां अच्छी  लग रही थीं तो फिर एक के बाद दूसरी करते हुए चार घंटे बीत गए। मुझे सुनने वाला कोई मिल जाए तो मैं पूरी रात कहानी कह तो सकती ही हूँ :) फिर सामने वाली सीट से कोई तो बोली कि उसे सोना है अब। जॉर्ज ने बोला कि मैं उत्साह में बोलती हूँ तो मेरा वॉल्यूम अपनेआप ऊपर हो जाता है और मुझे मालूम भी नहीं चलता। उसपर प्लेन में कान बंद रहते हैं। एनीवे, आधा घंटा सो लिए इसी बहाने।
जाने क्या तूने कही

पटाया में जाने के लिए बस थी. मुझे सफ़र में भूख प्यास सब बहुत लगती है तो मैं सारा इंतेज़ाम करके रखती हूँ. ऑफिस में मेरी टीम मुझे फेज वैन कैंटीन बुलाती है. इस बार भी रसद का इंतेज़ाम मैंने बैंगलोर एयरपोर्ट पर ही कर लिया था. चिप्स, बिस्किट्स, आइस टी.… सब बेईमानी से बांटे गए जिसके हाथ जो लगा टाइप्स :) वहाँ से निकलते हुए कोई १० बज गए थे. हम कोई तो चिड़ियाघर में रुके और नाश्ता किया। वहाँ पर खाना खाते हुए आप शेर को देख सकते हैं. मुझे जानवरों के साथ ऐसा करना अच्छा नहीं लगता। आगे के प्रोग्राम में शेर और बाकी जानवरों का शो भी था मगर मैं वो देखने नहीं गयी. टीम के और भी बहुत से लोग नहीं गए. क्रिएटिव टीम पूरी की पूरी गप्पी टीम है. हमें कैमरा लेकर भटकना, कहानियां सुनाना और ऐसी ही चीज़ों में ज्यादा मज़ा आता है.


Foot fetish
लंच करके शेरटन होटल पहुँचने में कोई चार बज गए थे. बस में थोड़ी नींद मारी मैंने भी. शेरटन क्या खूबसूरत होटल है, उफ्फफ्फ्फ़। होटल पहुँचते ही सारे लोग क्रैश कर गए अपने अपने कमरों में. अच्छा था कि मेरी रूममेट नेहा थी. हम एक सा सोचने वाले लोग हैं. ट्रिप पर भी कोई सोता है क्या। धाँय धाँय ब्रश किया, नहाये और तैयार। मैंने दो स्विमसूट रखे थे तो फटाफट चेंज करके रेडी हो गए. पूल में सिर्फ हम दोनों ही थे. पूल में पानी हल्का गर्म था, इनफिनिटी पूल, आसपास खूब सारी हरियाली और पास में ही समंदर। नेहा ने बहुत देर तक मुझे थोड़ी बहुत स्विमिंग सिखाने की कोशिश की. इतना अच्छा लग रहा था वहाँ। मुझे पानी बहुत पसंद है. समंदर। नदी. पूल. अब हल्का सा तैरना आता है तो डूबने का डर नहीं लगता। वहाँ फिर मेरी जिद कि समंदर चलो, सनसेट देखना है. नेहा को खींचते हुए ले गयी. तब तक जॉर्ज भी पहुँच गया था. ये मल्लू लोग पानी में मछली की तरह तैरते हैं. सबके घर के पीछे पोखर होता है. बचपन से सबको तैरना आता है. मुझे तैरते हुए लोगों को देख कर बहुत रश्क होता है कि काश मुझे आता. अब जल्दी ही सीख लूंगी। समंदर से वापस स्विमिंग पूल पहुँच गए. जॉर्ज बहुत अच्छा तैराक है और उससे भी अच्छा टीचर, उसने सिंपल टेक्निक्स सिखायीं और फिर नेहा और जॉर्ज दोनों मेरा बहुत उत्साह बढ़ा रहे थे कि मेरी स्पीड बेहतर हो गयी है और मैं बहुत दूर तक जा पाती हूँ. बाकी भी बहुत सारे लोगों को हमने जिद्दी मचा मचा के पूल में उतारा। पानी की लड़ाइयां। यहाँ भी जॉर्ज की टेक्निक थी कि जिससे विरोधी टीम पर अधिक से अधिक पानी उछाला जा सके.
  जानेमन रुममेट

रिश्ते अलग अलग किस्म के होते हैं. नेहा और जॉर्ज के साथ अजीब सा लगता है…पूरा पूरा सा.…जैसे फैमिली पूरी हो गयी हो. जैसे हम तीनों एक दूसरे को बिलोंग करते हैं. सेंटी हो रही हूँ. कुछ दिन में ही चले जाना है इसलिए।

शाम को अवार्ड्स नाइट थी. मेरी टीम को बेस्ट इवेंट का अवार्ड मिला टाइटन स्किन लांच के लिए. अच्छा लगा. मजे की बात ये थी कि पटाया आना का प्रोग्राम इतनी हड़बड़ी में बना था कि सारे अवार्ड्स रेडी नहीं हो पाये थे. तो एक ही अवार्ड था :) अपना अवार्ड ले कर फ़ोटो खिंचा कर वापस कर देना होता था :) फिर वही अवार्ड बाकी विनर को भी दिया जाता था.

वहाँ से निकल के हमारा वाकिंग स्ट्रीट जाने का प्लान बना. पूरा गैंग रेडी- मैं, जॉर्ज, नेहा, अनिशा, अनु, दिवाकर, भगवंत, बाला और साजन। हम होटल से बाहर निकले और टुकटुक पर बैठ गए. ऑफिस के अलावा सबको जानना एक अलग सा अनुभव था. टीम में चुप्पे रहने वाले लोग भी खूब सारी बातें करते हैं, भाषा के बैरियर के बावजूद। कुछ को हिंदी नहीं आती और मैं उनसे हिंदी में बकबक िकये जाती हूँ. वाकिंग स्ट्रीट रात भर जगी रहने वाली, नियोन लाइट्स वाली ऐसी जगह है कि लगता है हैलूसिनेशन हो रहे हों. माहौल ऐसा हो, लोग अच्छे हों तो मुझे पानी चढ़ जाता है ;) हमने घूम घूम कर बहुत सी चीज़ें देखीं जिनको यहाँ लिखना स्कैंडल्स हो जाएगा। हमारी छवि अच्छी है फिलहाल :) लिखने को इतना सारा कुछ मसाला मिला है कि नोवेल लिख सकती हूँ. चुपचाप जैसे पी रही थी अपने इर्दगिर्द का सारा जीवन। कितना अलग, कितना रंगीला और चमक के नीचे कैसे कैसे ज़ख्म छुपे होंगे। दिमाग पैरलेल ट्रैक पर था. कोई रात के एक बजे तक टीम में सब साथ घूमे। सभी रिस्पॉन्सिबल लोग थे. सबने तमीज से दारु पी. किसी को सम्हालने की जरूरत नहीं पड़ी. बाकी लोगों को और भी देर रुकने का मन था, मैं जॉर्ज और साजन वापस लौट आये. कुछ देर गप्पें मारीं और फिर टाटा बाय बाय.

फिर समंदर किनारे चली गयी. होटल की बेंच थी और पूरा खाली समंदर का किनारा। चश्मा नहीं पहना था तो सब धुंधला सा. समंदर का शोर. लहरें। बहुत देर बेंच पर बैठी जाने क्या क्या सोचती रही. जिंदगी। ठहरी हुयी सी. अच्छी सी।  सुकून सा बहुत सारा कुछ.
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बाकी दोनों दिन के किस्से कल। शायद। कभी।

26 March, 2014

एक वल्नरेबल गल्प



और जैसे ही मैं जरा सा पीछे मुड़ कर गाने की लिरिक्स को सुनने को हुयी, कागज पर के शब्दों नें झट से मेरे पीठ में खंजर भोंक दिया। शब्द चाकू भी होते हैं, खंजर और आरी भी। इनके कत्ल करने का तरीका अलग अलग होता है, बचपन से सुनने के बावजूद यकीन हर बार मुझे बचाने में पीछे रह जाता है। मेरी दुनिया इस विश्वास पर चलती है कि मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है जो मेरे साथ कोई बुरा करेगा। मैं भूल जाती कि सब कुछ रैंडम है, इतना रैंडम कि तयशुदा पैटर्न पर चलती हैं चीज़ें।

हमारे पुश्तैनी घर में सदियों पुराने प्रशस्ति पत्र मौजूद थे, नालंदा विश्वविद्यालय के अधिपति ने खास तौर से मेरे पुरखों को शब्दकोश का निर्माण करने के लिये निमंत्रण भेजा था। गंगा किनारे इस गाँव में हम पीढ़ी दर पीढ़ी बसे आ रहे हैं। मेरे पुरखों ने शब्दों का कारखाना लगाया था। दुनिया के कुछ चुनिंदा कारखानों में हमारे कारखाने की भी गिनती होती थी। मेरे पुरखे दूर दूर शब्दों की खोज में भटकते रहते और नये शब्दों का जन्म और उनकी नियति निर्धारित करते। किसी भी नामकरण संस्कार में मेरे परिवार के एक सदस्य की उपस्थिति अनिवार्य रहती। हर राज्याभिषेक में प्रजा द्वारा निर्धारित उपाधि मेरे पुरखे ही पहुंचाते। हमारा काम दुनिया की नजरों से दूर ही होता अक्सर। बस जरूरत भर बाहर आना, वरना शब्दों के अधिक और बेहतर उत्पादन के अलावा मृतपाय शब्दों दाह संस्कार करना भी हमारे परिवार का काम हुआ करता था। 

उस समय राजाओं का मुख्य मनोरंजन आखेट था। जब उन्हें कोई नया कौतुक चाहिये होता तो मेरे परिवार में से किसी को बुलावा भेजा जाता कि एक संधिपत्र का निर्माण किया जाये। जब सम्राट उस घोषणा पत्र से संतुष्ट हो जाते थे तो सारे राज्य के तपस्वियों का आह्वाण करते और अश्वमेघ यज्ञ किया करते। हमारे बनाये हुये शब्द दूर अफगानिस्तान और म्यामार तक पाये गये हैं। जापान के पास गये बुद्ध के उपदेशों में भी हमारे कई शब्दों का योगदान रहा है। मगर ये सब बहुत पुरानी बात है। उन दिनों शब्दों की शुद्धता एक बहुत महत्वपूर्ण नियामक था। हमारे कार्य को कला का दर्जा हासिल था। उन दिनों हमारे परिवार के अलावा किसी और को कारखाना तो क्या छोटा सा छापाघर खोलने के लिये भी हमारे घर के सर्वेसर्वा से सम्मति लेनी पड़ती थी। चूँकि शब्दों का बहुत सारा इस्तेमाल कर्मकाण्डों में होता था इसलिये कारीगरों की अनुवांशिकी महत्वपूर्ण थी। हमारे घर की बाहरी दीवार पर एक पुराना शिलालेख था जिसमें हर पीढ़ी का पूरा ब्यौरा दर्ज था। 

जैसा कि हर कारखाने में होता है, हमारे यहाँ भी कारखाने के कई स्तर थे जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आये थे। समाज के प्रचलन के विपरीत हमारा घर मातृसत्तात्मक था। जनने और पोषण के लिये स्त्रियाँ बेहतर हैं, इस विश्वास के साथ प्रथा घर में चली आ रही थी। हर पीढ़ी की पहली बेटी को अपना वर चुनने का अधिकार था। एक छोटा सा अनुष्ठान उसकी दिशा निर्धारित करता, और वह घर में सबका आशीर्वाद लेकर निकल पड़ती। कई बार वे जल्दी लौट आतीं मगर कई बार ऐसा भी हुआ है कि वापस आने में बहुत साल लग जाते थे। किंवदंतियों में उसका भी नाम आता है...तेजस्विनी। यथा नाम, तथा गुण। उसपर माँ सरस्वति की विशेष कृपा थी। परिवार की परंपरा के मुताबिक, उसे अपने लिये एक वर ढूंढना था, पहली संतान होने के बाद घर की सत्ता उसे दे दी जाती। तेजस्विनी में क्षत्रियों के बहुत से गुण थे, वह अायुध विद्या में पारंगत थी और शब्दभेदी बाण चलाना जानती थी। इसके अलावा उसे घुड़सवारी का बहुत शौक था। अनुष्ठान में उसकी दिशा उत्तर आयी। घर में सभी शोकाकुल हो गये। उत्तर दिशा निशिद्ध थी। तेजस्विनी ने ईश्वर का नाम लिया और अपने घोड़े पर निकल पड़ी। उस घटना को बीस हो गये। किसी ओर से उसकी खबर नहीं आती थी। 

इतने सालों तक उसका इन्तेजार किया सबने, लेकिन उम्मीद ही थी, एक न एक दिन टूट ही जानी थी. ठीक जिस दिन उसकी छोटी बहन के पास घर का सारा कार्यभार जाने को था, घर के सामने एक घोड़ा खड़ा हुआ. उससे एक इक्कीस साल की लड़की उतरी। पूरे इलाके में किसी ने ऐसी लड़की देखी नहीं थी. उसका रंग शफ्फ़ाक गोरा था. त्वचा में से चांदनी निकलती थी जैसे। आंखों में पूरनमासी के चाँद सी पूर्णता थी. उसने अपना परिचय तेजस्विनी की बेटी के रूप में दिया। इतने सालों में तेजस्विनी ने उसे कारखाने के सारे नियम और तकनीकें बता दीं थीं. जो उसने कभी नहीं बताया वो ये कि तेजस्विनी के साथ क्या हुआ था और वो कभी वापस आएगी या नहीं। उसने कभी अपने पिता के बारे में भी कुछ नहीं बताया सिवाए इसके कि पहाड़ों के देश में बहुत ऊपर उनका साम्राज्य है. वहाँ से कई नदियों का उद्गम होता है. हालाँकि घर पर पहला हक़ उसका था लेकिन उसने ताउम्र अविवाहित रहने का फैसला सुनाया तो घर में सभी अवाक रह गए. वह बेहद कुशल कारीगर थी, उसके बनाये शब्दों में जीवंत आत्मा होती थी. उसने घर आकर कुछ नयी रस्में बनायीं जैसे कि घर की सारी स्त्रियों का आयुध विद्या सीखना अनिवार्य होना। उसने घर को धीरे धीरे किले में बदलना शुरू कर दिया। शायद उसे आने वाले तूफ़ान की कुछ खबर हमेशा से थी. 

उसके आने के छह महीने बाद जब उसने बेटी को जन्म दिया तो किसी ने भी उसके पति का नाम नहीं पूछा। हमारे परिवार के लिए इतना काफी था कि तेजस्विनी की बेटी वापस लौट आयी है. हमारे शिलालेख में उसका नाम जुड़ा और सामने की जगह खाली रही. इसके बहुत साल बाद हमारे घर तक खबर पहुंची कि सुदूर उत्तर में एक और परिवार है जिसने शब्दों का कारखाना खोल रखा है. नदियों में आते केवट कई बार उनके बनाये शब्दों को लिए आते. जो बाकी दुनिया को नहीं दिख रहा था वो हमारे घर के कर्ताधर्ता को लम्हे भर में दिख गया. उन शब्दों में बहुत धार थी और इस तीक्ष्ण धार की एक मात्रा हमारे खुद के घर की थी. मगर हमारे घर में तो कभी किसी ने शब्दों का हानिकारक इस्तेमाल नहीं किया था. ये कैसे शब्द थे जिनमें उत्पात था, नरसंहार था, भीषण दर्द और अमानवीय क्रूरता थी, ये कैसे शब्दों से बदला लेने की कहानी थी? 

कहानियों को हम तक पहुँचने में और भी ज्यादा वक्त लगा. तेजस्विनी की ओज का जीवनसाथी उसे बहुत सुदूर उत्तर में मिला। राजकुमार मंगोल वंश का था. उसने तेजस्विनी को कभी वापस न लौटने की शर्त पर अपनाया था. यही नहीं उसने बिना राजकुमारी को बताये बहुत से कामगारों को बुला कर एक शब्दों का कारखाना भी खोल लिया. उसे इन्तेजार था तो बस इतना कि जिस दिन तेजस्विनी की बेटी का जन्म होगा, वो उसे कारखाने का संचालक बना देगा। तेजस्विनी ने कई बार बताने की कोशिश की कि शब्दों का कारखाना ऐसे नहीं चलता है मगर राजकुमार ने एक न सुनी। नियत समय आया और तेजस्विनी के जुड़वाँ बच्चे हुए, एक लड़का, एक लड़की। तेजस्विनी ने इस दिन की बहुत दिनों से तैयारी कर रखी थी, उसने अपनी एक विश्वासपात्र दासी के हाथों अपनी बेटी को उसी वक्त राजधानी से बाहर भेज दिया। राजकुमार बेटे को देख कर निराश हुआ लेकिन जिद पर अड़ा रहा। तेजस्विनी ने कारखाने का काम बुझे मन से शुरू किया। मन की उदासी भी उसके ओज को मिटा नहीं पाती थी। उस कारखाने में रहते हुए उसने सिर्फ संधिपत्र लिखे। राजकुमार के राज्याभिषेक के पद प्रजा में सालों बाद तक गुनगुनाये जाते रहे. 

इस कारखाने में सब कुछ बाकी कारखानों की तरह पुरुषों के द्वारा किया जाता था। वक्त के साथ साथ तेजस्विनी के बेटे ने कारखाने का सारा काम सम्भाल लिया। हमारे परिवार के बारे में जब उसे मालूम हुआ तो वह हमारे कारखाने का सर्वेसर्वा बनने की अभीप्सा पाल बैठा। उसे मालूम नहीं था कि कारखाना तपोभूमि सामान है जिसमें कई पीढ़ियों ने अपना पूरा पूरा जीवन समर्पित किया है। दोनों कारखानों के बीच कई सारे खतों का आदान प्रदान हुआ। देश के इस छोर से उस छोर तक जब तीखे शब्द भेजे जाते तो बीच में पड़ने वाले सारे राज्यों में सूखा पड़ने लगता। एक तो राजपुत्र उसपर तेजस्विनी का बेटा, अहंकार उसमें कूट कूट पर भरा था. वह हरगिज यह बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था कि दुनिया के जिस छोर पर मेरा परिवार है, वहाँ न उसके राजपुत्र होने का मान है न उसके पौरुष का दर्प। कई पीढ़ियों तक ये शब्दयुद्ध चलता रहा. 

तेजस्विनी के बेटे और उसके  सभी वारिसों में हिंस्र भाव प्रमुख था। उन्होनें और सारे भावों की उपेक्षा कर के सिर्फ उन शब्दों को प्रमुखता दी जिनमें उनका पौरुष उभरे। वे भूल गये कि शब्दों का काम है व्यक्ति के मन का भाव दर्शाना, न कि रचयिता के मन का भाव आरोपित करना।  बदलती दुनिया में उनका बहुत प्रसार हुआ। दोनों विश्वयुद्धों में उन्होंने क्रूरता और अमानवीयता के कई शब्द गढ़े। बदलते वक्त के साथ मेरे परिवार में भी बहुत चीज़ें बदलीं। देश के स्वतंत्रता संग्राम में हमारे शब्द कई बार लोगों में जोश भरते, निराश लोगों के हाथ में उम्मीद की मशाल थमाते। वक्त गुजरता रहा, हमारी लड़ाईयाँ कम होते होते लुप्त होती रहीं। मगर जैसा कि तेजस्विनी की बेटी ने कहा था, हर लड़की को शब्दों के खतरनाक पक्ष भी दिखाए जाते। बचपन में शब्दों पर सानी चढ़ाने का काम दिया जाता कि वो धार को समझे। 

ऐसे सारे इतिहास के घर में जब मेरा जन्म हुआ तो बचपन से प्रतिरक्षा की भावना मन में घर कर गयी। कई बार लोगों से बात करने के पहले सोचती, कई बार कुछ कहने के पहले सोचती। नए शब्द मिलते भी तो उनका कई तरह से परीक्षण करती कि इनमें कोई छुपा भाव तो नहीं हैं जिसमें विध्वंस के बीज छुपे हों. यौवन की देहरी पर पहुँचते लेकिन मन में दुर्दम्य साहस भर गया। मेरे आक्रामक तेवरों को देख कर मेरे ही परिवार के लोग आश्वस्त हो गये और शब्दों के खतरों के प्रति मुझे आगाह करना भूल गए। खास तौर से छुपे हुए खतरों का जैसे कि मीठे बोलों में छुपा जहर मुझे मालूम नहीं चलता। प्रेम में पगी हुयी भाषा में मैं शब्दों की सान नहीं देख पाती। मुझे मालूम ही नहीं चला मैं कब लापरवाह होती चली गयी। शहर में इतने बेहतरीन लोग थे कि उनसे इतर किसी गहरी काली दुनिया पर यकीन नहीं करने लगी। मुझे सिर्फ शुद्ध शब्दों का निर्माण ही नहीं उनके बीच के संधि और उनके बीच के रिश्तों पर भी काम करने की इच्छा होने लगी। शब्दों से इतर कहानियां, कवितायें, कल्पनाएँ...सब मेरी जिंदगी का हिस्सा बनती चली गयीं। घर की छोटी बेटी होने के कारण मेरे ऊपर जिम्मेदारियां भी कम थीं और मैं अपनी मर्जी का काम कर सकती थी। 

शहर आयी तो अपने कवच कुण्डल पुश्तैनी संदूक में धर आयी थी। मुझे दुनिया अपनी वल्नरेबिलिटी के साथ देखनी थी. जिन शब्दों ने मुझ पर सबसे तीखा आघात किया वे आदिम स्वर थे, किसी दूसरी भाषा के. मृत्यु के इतना करीब हूँ तो अपने घर के और लोगों को आगाह कर देना चाहती हूँ. वे तीन शब्द मारक होते हैं. उनसे प्रतिरक्षा के लिए नए अस्त्र बनाये जाएँ। सारी लड़कियों के ह्रदय पर अभेद्य कवच चढ़ाया जाए जिसमें संजीवनी के गुण हों। काल के ग्रास से जो उन्हें वापस खींच लाये। उसका 'आई लव यू' एकदम रैंडम था, जितनी मुझे शब्दों की समझ थी उससे कहीं ज्यादा। बात सिर्फ इतनी नहीं थी कि हम दोनों की रगों में उसी तेजस्विनी का खून दौड़ता था। ज्यादा खतरनाक बात ये थी कि उसने ऐसा जान के किया था या अनजाने। मेरे पास ये जानने का कोई तरीका नहीं था। वो सुबह जहर खा चुका था। घर पर लोग मेरी वापसी और गोदभराई की रस्म की तैयारियाँ कर रहे थे, मैं समंदर किनारे खुद को होम करने के मंत्र लिख रही थी, मेरे शब्द उसकी डायरी की आखिरी एन्ट्री से मिलते जुलते थे। 

18 March, 2014

सदा आनंद रहे एही द्वारे मोहन खेले होली

कब है होली?
बंगलोर में रह कर भूलने लगे थे होली कैसी होती है। हमारे लिये होली एक बाल्टी पानी में मन जाती थी। चार लोग आये, छत पर गये और दस मिनट में होली खत्म। छत पर कोई नल नहीं था इसलिये पानी का कोई इंतजाम नहीं। बाल्टी उठा कर किसी पर डाल नहीं सकते कि फिर एक तल्ला नीचे जा कर पानी कौन लायेगा। भागने, भगा कर रंग लगाने की भी जगह नहीं। अड़ोसी पड़ोसी कोई ऐसे नहीं कि जिनके साथ खेला जाये। विद औल ड्यू रिस्पेक्ट टु साऊथ इंडियन्स, बड़े खड़ूस लोग हैं यहां, कोई खेलना ही नहीं चाहता। हम तो यहाँ तक डेस्पेरेट थे कि पानी से खेल लो, चलो रंग भी और्गैनिक लगा देंगे। बिल्डिंग में पाँच तल्ले हैं, खेलने वाले किसी में नहीं। बहरहाल...रोना रोने में पूरी पोस्ट लग जायेगी, मुद्दे पर आते है।

इस साल मोहित और नितिका इलेक्ट्रौिनक सिटी में एक अच्छे से सोसाईटी में शिफ्ट हुये थे। होली के पहले उनके असोसियेशन का मेल आया कि होली खेलने का पूरा इंतजाम है। दोनों ने हमें इनवाईट किया। होलिका दहन का भी प्रोग्राम था, हमने सोचा वो भी देख लेंगे। तो फुल जनता वहां एक दिन पहले ही पहुँच गयी। जनता बोले तो, हम, कुणाल, उसकी मम्मी, साकिब कीर्ति, रमन, कुंदन, चंदन, नितिका की एक दोस्त भी आयी। खाने के लिये दही बड़ा हम यहां से बना कर ले गये थे। शाम को ही अबीर खेल लिये। जबकि पुराने कपड़े भी नहीं पहने थे, हम तो होलिका दहन के लिये अच्छे कपड़े पहन कर निकले थे कि त्योहार का मौसम है। बस यही है कि बचपन का एक्सपीरियंस से यही सीखे हैं कि होली के टाईम पर हफ्ता भर से नया कपड़ा पहनना आपका खुद का बेवकूफी है, इसमें आप के उपर रंग डालने वाले का कोई दोष नहीं है। कल शाम को पिचकारी खरेदते वक्त ये गन खरीदी थी। पीले रंग की। हम तमीजदार लोग हैं(कभी कभी खुद को ऐसा कुछ यकीन दिलाने की कोशिश करते हैं हम। अनसक्सेसफुली) तो गन में सादा पानी भरा था। इस पिद्दी सी गन से कितना कोहराम मचाया जा सकता है ये हमारे हाथों में आने के पहले गन को भी पता नहीं होगा। देर रात तक खुराफात चलती रही। हौल में दो डबल बेड गद्दे लगा कर ८ लोग फिट हो गये। कुंदन घर चला गया था, रात के डेढ़ बजे चंदन पहुँच रहा था मलेशिया से। जस्ट इन टाईम फौर होली। पहले तो हौरर फिल्म देखा सब, हम तो पिक्चर शुरू होते ही सो गये। हमसे हौरर देखा नहीं जाता। वैसे ही चारो तरफ भूत दिखते हैं हमें। 

अगली सुबह हम साढ़े सात बजे उठ कर तैयार। बाकी सब लोग सोये हुये। ऐसा लग रहा था कि जैसे शादी में आये हुये हैं। भोले भाले मासूम लोगों पर पिचकारी से भोरे भोर पानी डालना शुरू। सब हमको गरियाना शुरू। लेकिन फिर सब उठा। अब बात था कि चाय कौन बनायेगा। डेट औफ बर्थ से पता चला कि सब में रमन सबसे छोटा है, तो जैसा कि दस्तूर है, रमन चाय बनाया। तब तक हम पुआ के इंतजाम में जुट गये। क्या है कि हमसे खाली पेट होली नहीं खेली जाती। जब तक दु चार ठो पुआ अंदर नहीं जाये, होली का माहौल नहीं बनता। होली का इंतजाम सामने के फुटबौल फील्ड में था। नौ बजे से प्रोग्राम चालू होगा ऐसा मेल आया था। नौ बजे वहाँ कबूतर तक नहीं दिख रहा था। लोग तैयार होके औफिस निकल रहे थे। कुछ लोग वहाँ प्राणायाम कर रहे थे। हम लोग सोचे कि बस हमीं लोग होंगे खेलने वाले। साकिब कीर्ति दोनों मिल कर गुब्बारा में रंग भरना शुरु किया। हम सबसे पहले तो काला, जंगली वाला रंग लगा दिये कुणाल को, उसको होली में कोई और रंग लगा दे हमसे पहले तो हमारा मूड खराब हो जाता है। पजेसिव हो गये हैं हम भी आजकल। अब रंग लगा तो दिये ई चक्कर में भूल गये कि पुआ बनाना है। फिर बहुत्ते मेहनत से रगड़ रगड़ कर रंग छुड़ाये। पहला राउंड पुआ बनाते बनाते फील्ड में लोग आने चालू, लाउड स्पीकर पे गाने भी बजने लगे। कीर्ति ने चौथे फ्लोर की बालकनी से गुब्बारे फेंक कर टेस्टिंग भी कर ली थी कि सारे हथियार रेडी हैं। 
असली होली
हमारे पास कुल मिला के दो बंदूक, तीन बड़ी पिचकारी और बहुत सारा रंग था। कमीने लोगों ने मेरे पक्के वाले जंगली रंग छुपा दिये थे कि और्गैनिक होली खेलेंगे। शुरुआत तो फील्ड में दौड़ा दौड़ा के रंग लगाने से हुयी। कुछ बच्चे थे छोटे छोटे, अपनी फुली लोडेड पिचकारी के साथ दौड़ रहे थे। रंग वंग एक राउंड होने के बाद सब रेन डांस करने पहुंच गये। म्युजिक रद्दी था पर बीट्स अच्छे थे, और लोग डांस करने के मूड में हों तो म्युजिक कौन देखता है। धीरे धीरे लोगों का जमवाड़ा होते गया। कुंदन और चंदन भी पहुंच गये तब तक। उनको लपेटा गया अच्छे से। अब गौर करने की बात ये है कि रेन डांस के कारण चबूतरे से इतर जो जमीन थी वहां कीचड़ बनना शुरु हो गया था। थोड़ी ही देर में सबके रंग भी खत्म हो गये। बस, लोगों को कीचड़ में पटका जाना शुरु हुआ। फिर क्या था बाल्टियां लायी गयी और बाल्टी बाल्टी कीचड़ फेंका गया। चुंकी पानी के फव्वारे चल रहे थे और कीचड़ भी विशुद्ध पानी और मिट्टी का था इसमें नाली जैसे किसी हानिकारक तत्व की मिलावट नहीं थी मजा बहुत आ रहा था। 

हम और चंदन- सबसे डेडली कौम्बो
अब मैंने नोटिस किया कि लड़कियों को पटकने की कोशिश तो की जा रही है पर वे भाग निकलती हैं, कयुंकि किसी को सिर्फ कंधे से पकड़ कर कीचड़ में लपेटा नहीं जा सकता है, जरूरी है कि कोई पैर जमीन से खींचे। तो हमने माहौल की नाजुकी को देखते हुये लीडरी रोल अपनाया और पैर पकड़ के उठाओ का कामयाब नारा दिया। बहुत सारे उदाहरण भी दिखाये जिसमें ऐसी ऐसी लड़कियों का नंबर आया जिन्होनें हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा था। लेकिन हम होली में हुये किसी भी भेदभाव के सख्त खिलाफ हैं। फिर तो एकदम माहौल बन गया, लोग दूर दूर से पकड़ कर लाये जाते और कीचड़ मे डबकाये जाते। उस छोटी सी जगह में हम पूरा ध्यान देते कि कहीं भी मैनपावर की कमी हो, जैसे कि मोटे लोग ज्यादा उछलकूद कर रहे हैं तो आसपास के लोगों को, अपने भाईयों को भेजती कि मदद करो...आगे बढ़ो। इसके अलावा जब कोई कीचड़ में फेंका जा रहा होता तो हम वहीं खड़े होकर पैर से पानी फेंकते, एकदम सटीक निशाना लगा कर। अब रंग खत्म थे, पिचकारियां थी खाली। पानी के इकलौते नल पर बहुत सी बाल्टियां, बस हमने वहीं कीचड़ से पिचकारियां भरने का जुगाड़ निकाला। उफ़ कितना...कितना तो मजा आया। 

काला रे सैंया काला रे
फव्वारों के नीचे खड़े हम चंदन से बतिया रहे थे, कि बेट्टा आज जितने लोग को कीचड़ में लपेटा है, अच्छा है कि रंग लगा है, नहीं तो ये लोग कहीं पहचान लेते हमको तो बाद में बहुत्ते धुलाई होता हमारा। नये लोगों का आना जारी रहा, हम साइक्लिक तरीके से कीचड़, पिचकारी, बाल्टी का इस्तेमाल करते रहे। सरगत तो कब्बे हो गये थे लेकिन मौसम गर्म था तो ठंढ नहीं लगी। लास्ट राउंड आते आते वहां सब हमें चीन्ह गये थे। लोगों ने श्रद्धा से हमें बाल्टी वगैरह खुद ही देनी शुरू कर दी थी। पानी में लगातार खेलने के कारण रंग धुल गया था तो एक भले इंसान ने रंग भी दिये। पक्के रंग। खेल के बाद एक राउंड डांस भी किये। ये सारे कांड हमने नौ बजे से लेकर दुपहर देढ़ बजे तक लगातार किये। 

फिर कुछ लोगों को औफिस जाना था तो जल्दी से नहा धोकर तैयार हो गये। एक राउंड पुआ और बनाये और पैक अप। इस बार सालों बाद ऐसी होली खेले थे। एकदम मन आत्मा तक तर होकर। दिल से बहुत सारा आशीर्वाद सब के लिये निकला। सदा आनंद रहे एही द्वारे, मोहन खेले होली। 

पूरी टोली
घर आये तो बुझाया कि पिछले छह साल में जो होली नहीं खेले हैं ऐसा उ साल में उमर भी बढ़ गया है। पूरा देह ऐसा दुखा रहा था। और कुणाल चोट्टा उतने चिढ़ाये। फिर हम जो कभी दवाई नहीं खाते हैं बिचारे कौम्बिफ्लाम खाये तब जाके आराम आया। चिल्लाने के कारण गले का बत्ती लगा हुआ था अलग। हमारी मेहनत से छीले गये कटहल की सब्जी बनाने का टाईम ही नहीं मिला था। उसपर नितिका के यहां ही फ्रिज में रखे थे तो लाना भी भूल गये। शाम को कुंदन चंदन अबीर खेलने आया। फिर रात को हमने बिल्कुल नौन होली स्टाईल में पिज्जा मंगाया। खुद को हिदायत दी कि कल से कुछ एक्सरसाईज करेंगे रेगुलर। आधी पोस्ट रात को लिखी थी फिर सौलिड नींद आ रही थी तो सो गये। 

आज उठे हैं तो वापस सब कुछ दुखा रहा है। एक्जैक्टली कौन ज्वाईंट किधर है पता चल रहा है। होर्लिक्स पी रहे हैं और सोच रहे हैं...उफ़ क्या कमबख्त कातिलाना होली खेले थे। ओह गरदा!

10 March, 2014

फिल्म के बाद की डायरी

दिल की सुनें तो दिल बहुत कुछ चाहता है। कभी बेसिरपैर का भी, कभी समझदार सा।
इत्तिफाक है कि हाल की देखी हुयी दो फिल्मों में सफर एक बहुत महत्वपूर्ण किरदार रहा है...किरदार क्युंकि सफर बहुत तरह के होते हैं, खुद को खो देने वाले और खुद को तलाश लेने वाले। हाईवे और क्वीन, दोनों फिल्में सफर के बारे में हैं। अपनी जड़ों से इतर कहीं भटकना एक अलग तरह की बेफिक्री देता है, बिल्कुल अलग आजादी...सिर्फ ये बात कि यहाँ मेरे हर चीज को जज करने वाला कोई नहीं है, हम अपनी मर्जी का कुछ भी कर सकते हैं...और ठीक यही चीज हमें सबसे बेहतर डिफाइन करती है, जब हम अपनी मर्जी का कुछ भी कर सकते हैं तो हम क्या करते है। बहुत समय ऐसा होता है कि हमसे हमारी मर्जी ही नहीं पूछी जाती, बाकी लोगों को बेहतर पता होता है कि हमारे लिये सही क्या है...ये लोग कभी पेरेंट्स होते हैं, कभी टीचर तो कभी भाई या कई बार बौयफ्रेंड या पति। कुछ कारणों से ये तय हो गया है कि बाकी लोग बेहतर जानते है और हमारे जीवन के निर्णय वही लेंगे। कई बार हम इस बात पर सवाल तक नहीं उठाते। इन्हीं सवालों का धीरे धीरे खुलता जवाब है क्वीन, और इसी भटकन को जस का जस दिखा दिया है हाईवे में, बिना किसी जवाब के। मैं रिव्यू नहीं लिख रही यहां, बस वो लिख रही हूं जो फिल्म देखते हुये मन में उगता है। क्वीन बहुत अच्छी लगी मुझे...ऐसी कहानी जिसकी हीरो एक लड़की है, उसका सफर है।

कई सारे लोग जमीनी होते हैं, मिट्टी से जुड़े हुये...उनके ख्वाब, उनकी कल्पनाएं, सब एक घर और उसकी बेहतरी से जुड़ी हुयी होती हैं...लेकिन ऐसे लोग होते हैं जो हमेशा कहीं भाग जाना चाहते हैं, उनका बस चले तो कभी घर ना बसाएं...बंजारामिजाजी कभी विरासत में मिलती है तो कभी रूह में...ऐसे लोग सफर में खुद को पाते हैं। कल फिल्म देखते हुये देर तक सोचती रही कि मैं क्या करना चाहती हूं...जैसा कि हमेशा होता है, मुझे मेरी मंजिल तो दिखती है पर रास्ते पर चलने का हौसला नहीं दिखता। मगर फिर भी, कभी कभी अपनी लिखने से चीजें ज्यादा सच लगने लगती हैं...हमारे यहां कहावत है कि चौबीस घंटे में एक बार सरस्वती जीभ पर बैठती हैं, तो हमेशा अच्छा कहा करो।

मुझे लोगों का सियाह पक्ष बहुत अट्रैक्ट करता है। लिखने में, फिल्मों में...हमेशा एक अल्टरनेट कहानी चलती रहती है...जैसे हाइवे और क्वीन, दोनों फिल्मों में इन्हें सिर्फ अच्छे लोग मिले हैं, चाहे वो अजनबी लड़की या फिर किडनैपर...मैं सोच रही थी कि क्या ही होता ऐसे किसी सफर में सिर्फ बुरे लोग मिलते...जिसने कभी किसी तरह की परेशानियां नहीं देखी हैं, वो किस तरह से मुश्किलों से लड़ती फिर...ये शायद उनके स्ट्रौंग होने का बेहतर रास्ता होता। मेरा क्या मन करता है कि एक ऐसी फिल्म बनाऊं जिसमें चुन चुन के खराब लोग मिलें...सिर्फ धमकी देने वाले नहीं सच में कुछ बुरा कर देने वाले लोग...सफर का इतना रूमानी चित्रण पच नहीं रहा। फिर लड़की डेंटी डार्लिंग नहीं मेरे जैसी कोई हो...मुसीबतों में स्थिर दिमाग रखने वाली...जिसे डर ना लगता हो। अजब अजब कीड़े कुलबुला रहे हैं...ये लिखना, वो लिखना टाईप...ब्रोमांस पर फिल्में बनती हैं तो बहनापे पर क्युं नहीं? कोई दो लड़कियाँ हों, जिन्हें ना शेडी होटल्स से डर लगता है ना पुलिस स्टेशन से...देश में घूमने निकलें...कहानी में थोड़ा और ट्विस्ट डालते हैं कि बाईक से घूमने निकली हैं कि देश आखिर कितना बुरा है...हमेशा कहा जाता है, खुद का अनुभव भी है कि सेफ नहीं है लड़कियों का अकेले सफर करना...फिर...सबसे बुरा क्या हो सकता है? रेप ऐंड मर्डर? और सबसे अच्छा क्या हो सकता है? इन दोनों के बीच का संतुलन कहां है?

So, when you come back, you may have a broken body...but a totally...absolutely...invincible soul...now if that is not worth the journey, I don't know what is!

मुझे हमेशा लगता था मुझसे फुल टाईम औफिस नहीं होगा...हर औफिस में कुछ ना कुछ होता ही है जो स्पिल कर जाता है अगले दिन में...ऐसे में खुद के लिये वक्त कहां निकालें! लिखने का पढ़ने का...फिर भी कुछ ना कुछ पढ़ना हो रहा है...आखिरी इत्मीनान से किताब पढ़ी थी IQ84, फिर मुराकामी का ही पढ़ रही हूं...किताबें पढ़ना भाग जाने जैसा लगता है, जैसे कुछ करना है, वो न करके भाग रही हूं...परसों बहुत दिन बाद दोस्त से मिली...श्रीविद्या...एक बच्चे को संभालने, ओडिसी और कुचीपुड़ी के रिहर्सल के दौरान कितना कुछ मैनेज कर लेती है...उसके चेहरे पर कमाल का ग्लो दिखता है...अपनी पसंद का जरा सा भी कुछ मिल जाता है तो दुनिया जीने लायक लगती है...दो तरह की औरतें होती हैं, एक जिनके लिये उनके होने का मकसद एक अच्छा परिवार है बसाना और बच्चे बड़ा करना है...जो कि बहुत जरूरी है...मगर हमारे जैसे कुछ लोग होते हैं, जिन्हें इन सब के साथ ही कुछ और भी चाहिये होता है जहां हम खुद को संजो सकें...मेरे लिये लिखना है, उसके लिये डांस...इसके लिये कुर्बानियां देते हुये हम जार जार रोते हैं मगर जी भी नहीं सकते अगर इतना जरा सा कुछ ना मिल सके।

हम डिनर पर गये थे, फिर बहुत देर बातें भी कीं...थ्री कोर्स डिनर के बाद भी बातें बाकी थीं तो ड्राईव पर निकल गये...पहले कोरमंगला तक फिर दूर माराथल्ली ब्रिज से भी बहुत दूर आगे। कल से सोच रही हूं, लड़कियों के साथ का टूर होता तो कितना अच्छा होता...मेरी बकेट लिस्ट में हमेशा से है...अनु दी, नेहा, अंशु, शिंजिनी...ये कुछ वैसे लोग हैं जिनके साथ कोई वक्त बुरा नहीं हो सकता। कोई हम्पी जैसी जगह हो...देखने को बहुत से पुराने खंडहर...नदी किनारे टेंट। बहुत से किस्से...बहुत सी तस्वीरें। जाने क्या क्या।

बहरहाल, सुबह हुयी है और हम अपने सपने से बाहर ही नहीं आये हैं...चाह कितना सारा कुछ...फिल्में, किताबें...घूमना...सब होगा, धीरे धीरे...फिलहाल कहानियों को ठोकना पीटना जारी है। फिल्म भी आयेगी कभी। औफिस में आजकल सब अच्छा चल रहा है, इसलिये लगता है कि जाने का सबसे सही वक्त आ गया है। यहां डेढ़ साल से उपर हुये, इतना देर मैं आज तक कहीं नहीं टिकी, अब बढ़ना जरूरी है वरना जड़ें उगने लगेंगी। फ्रेंच क्लासेस शुरू हैं, अगले महीने...सारे प्लान्स हैं...वन ऐट अ टाईम। 

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