17 September, 2014

मेरा जिद्दी, बिगड़ैल, पागल हीरो

वो कॉपी के पन्नों में नहीं रहना चाहता. जिद्दी होता जा रहा है मेरी तरह. कहता है रोज रोज अलग अलग रंग की सियाही से लिखती हो...कभी गुलाबी, कभी फिरोजी, कभी पीला...मुझे हैलूसिनेशन होने लगे हैं. कमसे कम लिखते हुए तो एक जैसे मूड में लिखा करो. ये कागज़ के पन्ने हैं, तुम्हारे शहर का आसमान नहीं कि हर शाम बदल जाएँ. मैंने यूँ ही सर चढ़ा रखा है उसे. कहता है भले ही आते वक़्त सिर्फ मुस्कुराओ मुझे देख कर, लेकिन अगर आखिरी हर्फ़ के बाद वाले सिग्नेचर के पहले मुझे हग नहीं किया तो रूठ जाऊँगा...फिर हफ्ते भर तक दूसरे किरदारों के बारे में लिखते रहना...और सारी गलती तुम्हारी ही होगी.

बाबा रे उसके चोंचले दिन भर बढ़ते जा रहे हैं. कल कहने लगा कि मुझे सिगरेट नहीं सिगार चाहिए. विस्की फ्लेवर्ड. दिल तो किया चूल्हे में झोंक दूं उसे...कमबख्त. बड़ा आया सिगार पीने वाला. जब रचना शुरू किया था उसे तो कैसी मासूमियत से टुकुर टुकुर देखता था. जो बोलती थी सुनता था, जो पीने को देती थी पीता था...मगर जाने कब उसमें जान आने लगी और अब तो एकदम बिगडैल बच्चा हो गया है. तुनकमिजाज. सरफिरा. बाइक पंचर थी और कार में पेट्रोल कम तो सोचा पैदल ही ले आती हूँ, बगल में ही खोमचा है तो जनाब की फरमाइश कि वो भी जायेंगे खुद से ब्रांड पसंद करने वरना मैं सबसे सस्ता और घटिया सिगार ला दूँगी. एक वक़्त था कि बीड़ी पी के भी खुश रहता था और आज ये मिज़ाज कि ब्रैंड के बारे में फिनिकी हो रहे हैं जनाब.

तुम्हारा ऐसा टेस्ट कहाँ से डेवलप हुआ रे...तुमरे जान पहचान में तो कोई नहीं जानता कि सिगार नाम की कोई चीज़ भी होती है. सब दोस्त लोग तो छोटे शहर से आये हैं, उन्हें क्या मालूम कि सिगार क्या होता है, उसमें फ्लेवर्स कौन से होते हैं. तुमको मालूम भी है, एक सिगार १८० रुपये का आता है. इतने में अच्छी वाली सिगरेट का एक पूरा पैकेट आ जाता है, २० सिगरेट होती हैं उसमें. ऐसे ही सिगार पी पी के कड़वे हो जायेंगे होठ, फिर कौन लड़की किस करेगी तुमको. फिर तुम कहोगे कि तुम्हारे जैसी कोई लड़की रचें हम कि जिसको सिगार पीने का शौक़ हो. बाइक्स का शौक़ कम नहीं था कि ये नए फितूर पालने लगे हो. मेरे बॉयफ्रेंड से दूर रहो तुम. उसके सारे रईसों वाले शौक़ हैं. खुद तो साहबजादे लाटसाहब हैं, बड़ी ऐड एजेंसी में काम करते हैं, उनको पैसों की कोई दिक्कत नहीं है. मुझे हिंदी के गरीब लेखक के किरदार ऐसे शौक़ पालने लगे तब तो निकला मेरा खर्चा पानी. 

एक तो आजकल तुम्हारा दिमाग जाने कहाँ बौराया रहता है. मालूम कल रात को ब्रश करने के बाद नल बंद करना भूल गए थे तुम. बूंद बूँद पानी सपने में मेरे सर पर टपकता रहा. एक तो नींद गीली रही, ख्वाब गीले रहे, उसपर उनींदे लिखी कहानी गीले कागज़ से धुल गयी. तुमको जब मालूम है कि हम इंक पेन से लिखते हैं और अक्सर आधी नींद में लिखते हैं तो कमसे कम ढंग से नल बंद नहीं कर सकते थे तुम. मेरी ही गलती थी कि कागज़ से निकाल कर घर में धर दिया तुमको. ये सब करने के पहले शऊर सिखाना था तुम्हें. जाहिल ही रहोगे. घर को कबाड़खाना बना रखा है. न कलमें मिलती हैं न टिशु पेपर. कल तुम्हारी ही हिरोइन को रच रही थी कि लिपस्टिक जरा सा लाइन से बाहर हो गयी. अब मैं कितना भी खोज लूं, तुम्हारा धरा हुआ सामान कभी मेरे हाथ आया है जो कल आता. लाख मन करो कि मेरे सामान को हाथ मत लगाओ, तुमको समझ में ही नहीं आता है. लड़की का निचला होठ जरा ज्यादा पतला रह गया है और बायीं ओर को झुका हुआ. मानसिक रोगी लगती है एकदम. कितनी तो खूबसूरत मुस्कान सोची थी मैंने. एकदम स्माइल स्पेशियलिस्ट जैसे. दोनों गालों में गहरे डिम्पल. मगर तुम्हारी मनहूस किस्मत में यही बंदरिया लिखी थी तो मैं क्या करूँ. कहा है कि मेरे स्टडी से कमसे कम अलग रहा करो. इतना बड़ा घर है, कुछ काम धंधा ही सीख लो. कब से पेन्टिन्ग सिखाने की कोशिश कर रही हूँ तुम्हें लेकिन तुम हो कि ब्रश देखते खुराफात सूझती है. घर की सारी दीवारों में चीस चुके हो लेकिन एक काम की लकीर नहीं खींची है. बुरी आदत दुनिया भर की अपना लोगे, ढंग की चीज़ सीखने में तुम्हारा जान जाता है. 

चुप चाप से कोना पकड़ के बैठो और वो किताब रखी है मुराकामी की, काफ्का ऑन द शोर, उसको पढ़ो. अगले चैप्टर में तुम्हें मुराकामी को कोट करना है. बिना पढ़े लिखते खाली एक लाइन बोलोगे तो ऑथेंटिक नहीं लगेगा. खुद से पढ़ के देखो और सोचो कि कौन सी लाइन उस माहौल पर नैचुरली सूट करती है. बोलते वक़्त हड़बड़ाना नहीं, लड़की कहीं भाग के नहीं जा रही और बहुत इंटेलेक्चुअल भी है. कॉन्टेक्स्ट समझेगी. वैसे भी खूबसूरती नहीं है तो कमसेकम ऐसी चीज़ें तो होनी चाहिए कि तुम्हारे साथ अगले दस चैप्टर कुछ नया कर सके. बस इत्तनी मिन्नत है मेरे लाल, अपने साथ फुसला के उसे भी कागज़ से बाहर मत निकाल लाना. एक तुम्हारे होने से घर कम पागलखाना नहीं है जो तुम्हारी प्रेमिका के नखरे भी उठाऊं मैं. उसके आने का सिर्फ इतना मकसद है कि तुम्हारे थके हुए दिमाग और आँखों को कोई बदलाव मिले और तुम घड़ी घड़ी आइना में अपना चेहरा देखने से फुर्सत पाओ. यूँ भी इश्क एक काफी लम्बा चैप्टर है. तुम्हें किसी मुसीबत में फेंकने से पहले मैं तुम दोनों के नाम फूलों की वादी में एक डेट फिक्स कर देती हूँ. उससे तमीजदार लड़के की तरह पेश आना, समझे?  

15 September, 2014

चार दिन की जिन्दगी है, तीन रोज़ इश्क़



कॉफ़ी का एक ही दस्तूर हो...उसका रंग मेरी रूह से ज्यादा सियाह हो. लड़की पागल थी. शब्दों पर यकीन नहीं करती थी. उसे जाते हुए उसकी आँखों में रौशनी का कोई रंग दिख जाता था...उसकी मुस्कराहट में कोई कोमलता दिख जाती थी और वो उसकी कही सारी बातों को झुठला देती थी. यूँ भी हमारा मन बस वही तो मानना चाहता है जो हम पहले से मान चुके होते हैं. किसी के शब्दों का क्या असर होना होता है फिर. तुम्हारे भी शब्दों का. तुम क्या खुदा हो.
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दोनों सखियाँ रोज शाम को मिलती थीं. उनके अपने दस्तूर थे. रात को थपकियाँ देती लड़की सोचती थी कि अगली सुबह किसी दूर के द्वीप का टिकट कटा लेगी और चली जायेगी इतनी दूर कि चाह कर भी इस जिंदगी में लौटना न हो सके. उसका एक ही सवाल होता था हमेशा...वो चाहती थी कि कोई हो जो सच को झुठला दे...बार बार उससे एक ही सवाल पूछती थी...
'प्लीज टेल मी आई डोंट लव हिम...प्लीज'
वो इस तकलीफ के साथ जी ही नहीं पाती थी...मगर कोई भी नहीं था जिसमें साहस का वो टुकड़ा बचा हो जो उसकी सियाह आँखों में देख कर सफ़ेद झूठ कह सके...यू डोंट लव हिम एनीमोर...

तब तक की यातना थी. शाम का बारिश के बाद का फीका पड़ा हुआ रंग था. घर भर में बिना तह किये कपड़े थे. वेस्ट बास्केट में फिंके हुए उसके पुराने शर्ट्स थे जो जाने कितने सालों से अपने धुलने का इंतज़ार करते करते नयेपन की खुशबू खो चुके थे. सबसे ऊपर बिलकुल नयी शर्ट थी, एक बार पहनी हुयी...जिसकी क्रीज में उसका पहला हग रखा हुआ था. उसी रात लड़के ने पहली बार चाँद आसमान से तोड़ कर शर्ट की पॉकेट में रख लिया था. तब से लड़की सोच रही है कि चाँद को कमसे कम धो कर, सुखा कर और आयरन कर वापस आसमान में भेज दे...मगर नहीं...इससे क्रीजेस टूट जाएँगी और उसके स्पर्श का सारा जादू बिसर जाएगा. दुनिया में लोग रोजे करते करते मर जाएँ इससे उसे क्या. वो भी तो मर रही है लड़के के बिना. किसी ने कहा जा के उससे कि वो प्यार करती है उससे. फिर. फिर क्या पूरी दुनिया के ईद का जिम्मा उसका थोड़े है. और चाँद कोई इतना जरूरी होता तो अब तक खोजी एजेंसियों ने तलाश लिया होता उसे. मगर लड़की ड्राईक्लीनर्स को थोड़े न उसकी शर्ट दे देगी. पहली. आखिरी. 

फूलदान में पुराने फूल पड़े हुए थे. कितने सालों से घर में ताज़े फूलों की खुशबू नहीं बिखरी थी. लड़की ने तो फूल खरीदने उसी दिन बंद कर दिए थे जिस दिन लड़के ने जाते हुए उसके लिए पीले गुलाबों का गुलदस्ता ख़रीदा था. हम उम्र भर दोस्त रहेंगे. वो उसे कैसे बताती, कि जिस्म में इश्क का जहर दौड़ रहा है...जब तक कलाई में ब्लेड मार कर सारा खून बहाया नहीं जाएगा ये दोस्ती का नया जुमला जिंदगी में कुछ खुशनुमा नहीं ला सकता...मगर इतना करने की हिम्मत किसे होती भला...उसकी कलाइयाँ बेहद खूबसूरत थीं...नीलगिरी के पेड़ों जैसी...सफ़ेद. उनसे खुशबू भी वैसी ही भीनी सी उठती थी. नीलगिरी के पत्तों को मसलने पर उँगलियों में जरा जरा सा तेल जैसा कुछ रह जाता था...उसे छूने पर रह जाती थी वो जरा जरा सी...फिर कागजों में, कविताओं में, सब जगह बस जाती थी उसकी देहगंध.

लड़की को अपनी बात पर कभी यकीन नहीं होता था. वो तो लड़के के बारे में कभी सोचती भी नहीं थी. मगर उसे यकीन ही नहीं होता था कि वो उसे भूल चुकी है. उसे अभी भी कई चौराहों पर लड़के की आँखों के निशान मिल जाते थे...लड़का अब भी उसे ऐसे देखता था जैसे कोई रिश्ता है...गहरा...नील नदी से गहरा...वो क्यूँ मिलता था उससे इतने इसरार से...काँधे पर हल्के से हाथ भी रखता था तो लड़की अगले कई सालों तक अपनी खुशबू में भी बहक बहक जाती थी. मगर इससे ये कहाँ साबित होता था कि वो लड़के से प्यार करती है. वो रोज खुद को तसल्ली देती, मौसमी बुखार है. उतर जाएगा. जुबां के नीचे दालचीनी का टुकड़ा रखती...कि ऐसा ही था न उसके होठों का स्वाद...मगर याद में कहाँ आता था टहलता हुआ लड़का कभी. याद में कहाँ आती थी साझी शामें जब कि साथ चलते हुए गलती से हाथ छू जाएँ...किसी दूकान के शेड के नीचे बारिशों वाले दिन सिगरेट पीने वाले दिन कहाँ आते थे अब...वो कहाँ आता था...अपनी बांहों में भरता हुआ...कहता हुआ कि आई डोंट लव यू...यू नो दैट...मगर फिर भी तुम हो इतना काफी है मेरे लिए. उसे 'काफी होना' नहीं चाहिए था. उसे सब कुछ चाहिए था. मर जाने वाला इश्क. उससे कम में जीना कहाँ आया था जिद्दी लड़की को. किसी दूसरे शहर का टिकट भी तो इसलिए कटाया था न कि उसकी यादों से न सही, उससे तो दूर रह लेगी कुछ रोज़...

अपनी सखी से मिलती थी हर रोज़...सुनाती थी लड़के के किस्से...सुनाती थी और बहुत से देशों की कहानियां...और जैसे कोई ड्रग एडिक्ट पूछता है डॉक्टर से कि मर्ज एकदम लाइलाज है कि कोई उपाय है...पूछती थी उससे...

'प्लीज टेल मी आई डोंट लव हिम, प्लीज'.

02 September, 2014

चेन्नई डायरीज: पन्नों में घुलता सीला सीला शहर

वो शहर से ऐसे गुजरती जैसे उसे मालूम हो कि उसकी आँखों से शहर को और कोई नहीं देख सकता. रातें, कितनी अलग होती हैं दिनों से...जैसे रातरानी की गंध बिखेरतीं...सम्मोहक रातें...पीले लैम्पोस्ट्स में घुलते शहर को चुप देखतीं...गज़ब घुन्नी होती हैं रातें.

अजीब शहरों से प्यार हुआ करता लड़की को. देर रात बस के सफ़र के बाद किसी ऑटो में बैठ कर अपने फाइव स्टार होटल जाते हुए लड़की बाहर देखती रहती थी जब सीला सीला शाहर उसके अन्दर बहने लगता था. वो सोचती, चेन्नई में ह्यूमिडिटी बहुत है. सुनसान पड़ी छोटी गलियों के शॉर्टकट से ले जाता था ऑटो. लड़की महसूसती, इस शहर से प्यार किया जा सकता है. शहर न जाने कैसे तो उसे अपने काँधे पर सर टिका कर ऊंघने देता. वहां के पुलिसवाले, ऑटोवाले, बिना हेलमेट के बाइक चलने वाले छोकरे...सब उसे अपनी ओर खींचते. लड़की अपने अन्दर जरा जरा सी जगह खाली करती और चेन्नई वहां आराम से पसरने लगता.

दिन की धूप में सड़क पर निकल पड़ती...बैंगलोर के ठंढे मौसम के बाद उसे किसी शहर की गर्मी बहुत राहत देती. किसी पुराने पुल के साइड साइड चलती, एग्मोर नाम के किसी मोहल्ले में. हवा में समंदर की आस बुलाती. आँखों से करती बातें. वो क्या तलाशने निकलती और क्या क्या खरीद कर जेबों में भरती रहती. व्रैप अराउंड स्कर्ट, पर्पल कलर की कंघी...डबल चोकलेट आइसक्रीम. जाने क्या क्या. नैशनल म्यूजियम जैसी किसी इमारत के सामने खड़ी होकर गिनती फ्लाइट छूटने के वक़्त को. वक्त हमेशा कम पड़ जाता. लौटते हुए जरा जरा उम्मीदों में इकठ्ठा करती कुछ गलियों में रहती दुकानों को...एक एम्बेसेडर के खाली हुए फ्रेम को, बिना पहिये, बिना सीट...एक पुराने से घर के आगे क्यूँ रखा था फ्रेम? वो क्या स्लो मोशन में चलती थी? फिर क्यूँ सारी चीज़ें दिखती थीं उसे जो इस शहर में गुमनाम घूंघट ओढ़े रहती थीं, जैसे कि उनका होना सिर्फ इसलिए है कि चेन्नई की यादों के ये पिन ऐसे ही याद आयें उसे. एक घर के सामने से गुज़रते हुए वहां के दरबान की जरा सी मुस्कराहट...वो वापस जा के पूछना चाहती थी कि आपकी इतनी मीठी मुस्कराहट के पीछे कौन सी ख़ुशी है. एक अनजान लड़की की यादों के एल्बम में ऐसे चमकीली चीज़ का तोहफा क्यूँ? आप किसी और जन्म से जानते हैं क्या उसको?

सड़क पर सफ़ेद वेश्ती पहने लोग दिखते...एक तरह की धोती...उसे याद आते गाँव में बाबा...उनकी याद आये कितने दिन हो गए. सड़क पर गुजरती औरत के बालों में लगे बेली के फूलों की महक, बगल के रेस्टोरेंट से उठती डोसा की महक...क्या क्या घुलता जाता...सुबह लम्बी कतार में लगे हुए किसी अजनबी से कोई घंटा भर बतियाना और आखिर में पूछना उसका नाम...चंद्रा...उसके कानों के पास के बाल जरा जरा सफ़ेद हो गए थे...बहुत रूड होता न पूछना कि आपकी उम्र क्या है? कितना सॉफ्ट स्पोकन होता है कोई. उससे मिल कर किसी और की बेहद याद आना. उसका कहना कि तुम्हें बे एरिया अच्छा लगेगा. विदेश. योरोप जैसा बिलकुल नहीं. मगर लड़की को शहर लोगों की तरह लगते हैं, हर एक की अपनी अदा होती है. वो सोचती उन सारे लोगों के बारे में जो अपना अपना टिकट लिए किसी दूर देश जाना चाहते हैं. मैं नहीं जाना चाहती...मुझे घबराहट होती है. मैं अपने देश में ही ठीक हूँ. वहां मेरी किताब कौन पढ़ेगा. एक तो ऐसे ही बैंगलोर में मुझे हिंदी बोलने वाले लोग मिलते नहीं. खुद में बातें करती.

लौट आती होटल के कमरे में. स्विमिंग पूल में करती फ्लोट करने की कोशिश. पहली बार ताज़े पानी में तैर लेती. आँख भींचे रहती पहले, जरा जरा पैर मारती. स्विमिंग पूल में अकेली लड़की. साढ़े चार फीट पानी डूबने के लिए बहुत होता है. वो लेकिन सीख लेती घबराहट से ऊपर उठना. क्लोरिन चुभता आँखों को. जैसे याद की टीस कोई. वो लेती गहरी सांस...और तैर कर जाती स्विमिंग पूल के एक छोर से दूसरे छोर तक. फ्लोट करते हुए चेहरे पर पड़ती धूप. बंद हो जाता सारा का सारा शोर. दिल की धड़कनों में चुप इको होता...इश्शश्श्श...क...

17 August, 2014

जिसने सफ्हों में जिलाए रक्खा है, उस तक हमारा सलाम पहुंचे


ओ कवि,

तुम्हारा शुक्रिया. कि तुम्हारे बनाये बिम्बों में उलझ जाती है लड़की और कर देती है आत्महत्या का इरादा मुल्तवी. कि उसे कई बार लगता है कि तुमने उसके लिए ही रची हैं बेतरह खूबसूरत उपमाएं...चाहे किसी और को उसकी जरूरत हो न हो, तुम्हें नयी कवितायें लिखने के लिए उसकी जरूरत है. ये सोचते हुए उसका चोर मन उसे ये भी कहता है कि दुनिया की सबसे खूबसूरत कवितायें विरह में लिखी गयी हैं...तो अगर वाकई तुम्हें दुनिया के साहित्य की परवाह है तो जान दे दो. तुम्हारे गम में कवि की लेखनी में ऐसी धार आ जायेगी कि देखने वाले चमत्कृत हो जायेंगे.

लड़की मगर अपने चोर मन को धमकाती है और कहती है कि वो अपने कवि को बेहतर जानती है. अगर वो जान दे देगी तो कवि अवसाद में चला जाएगा. उसकी कवितायें पढ़ कर भले दुनिया उसपर जान छिड़कती हो...भले दूर देश की औरतें उसके लिए प्रेम पत्र लिखती हों...अगर वो उसकी कविता नहीं पढ़ेगी तो कवि लिखना बंद कर देगा. कवि वैसे ही हिसाबी है हर चीज़ में...सब कुछ फायदे के लिए करता है. उसके लिखने से जब फायदा होना बंद हो जाएगा तो क्यूँ लिखेगा.

आज की रात क़यामत की रात थी. लड़की अपने साँसों का गट्ठर गाँव के बाहर के पुराने पीपल पर छोड़ आई थी और पोखर किनारे चली गयी थी. गले में चाँद बाँध कर वही डूब कर जान दे देती कि तुम्हारा एक ख़त मिल गया वहीं कोटर में रखा हुआ. तुम्हारी आदत भी न, एक तो इतनी लम्बी चिट्ठी लिखते हो उसपर इतनी मुश्किल...हर वाक्य पढ़ने के साथ उस दौर में पढ़े हुए लेखकों की याद आती रही...तो कहीं तुम्हारे लिखे में किसी गायिका की खुशबू. उलझनों का एक ऐसा जंजाल बनता जा रहा था कि कहीं छूट कर जाने की गुंजाईश नहीं रही.

तुम्हें पढ़ कर महसूस हुआ कि जिंदगी कितनी खूबसूरत है...सिर्फ चाँद तारों में नहीं, पकी धान की बालियों में, होली में गए गए गीत में और औरतों के रचे हुए कोहबर में भी. तुम्हारी आँखों से देर तक दुनिया देखती रही...तुम्हारे ज़ख्मों के निशान मेरे जिस्म पर उभरने लगे हैं. मगर लड़की तुम्हारे ज़ज्बे को सलाम करती है...अगर तुम दर्द की इस दुनिया को महसूसते हुए जीने की वजहें खोज पाने में कामयाब रहे हो तो लड़की हार क्यूँ माने?

रात भर कैसे तो ख्याल दबोच लेने को तैयार थे. दर्द आँखों से बहता रहा मगर धुला धुला सा महसूस नहीं होता. तुम्हारी कविताओं की पहाड़ी नदी में देर तक उतराती रही...उनकी मुस्कुराहट...उनका शोर...झरने पर से उनकी उछलकूद. इन्द्रधनुष भी बन रहा था. तुम्हारी आँखों को छूने पर ऐसा ही इन्द्रधनुष उगता होगा न उँगलियों में. रात फिर अपने गाँव गयी थी, सोचा तुम्हारे गाँव भी हो आऊँ. कुछ भी पहले की तरह नहीं रहा. अब हर मौसम में गिल्ला गुड़ और गम्कौउआ चूड़ा नहीं मिलता. दीदी प्लेट में डाल के बिस्कुट मिक्सचर दे दी हमको. आजकल तो पेप्सी भी रखने लगा है सब लोग. पहले तो घर जाते ही निम्बू का शरबत मिलता था. तुम्हारा गाँव मगर अब भी जरा बचा हुआ है. तुम्हारी माँ तुलसी चौरा पर बैठी चावल चुन रही थी. पता नहीं कैसे तो एक बार में पहचान गयी हमको. तुम्हारी कविता में इतना साफ़ चेहरा दिखता है क्या हमारा?

क्या मिला बड़े शहर आके? दिन भर नौकरी करो और फिर भी पैसा जोड़ जोड़ के घर चलाओ. बाबा ठीक ही न कहते हैं कि यहाँ पैसा कम मिलेगा मगर यहाँ कम पैसा में जिया भी तो जा सकता है. सब छोड़ छाड़ के चलते हैं रे. आम के बगान के पास छप्पर टाप लेंगे. कोई न कोई काम धंधा मिल ही जाएगा करने को. वैसे भी आजकल गाँव में रहता कौन है. तुम कविता लिखना, हम तुम्हारे सिरहाने पंखा झलेंगे. तुम भात दाल खाना हम लोटा लिए खड़े रहेंगे. तुम हाथ धोना...हम अपना दुपट्टा बढ़ा देंगे हाथ पोंछने को. गोहाल के पास वाला कुआँ के मुंडेर पर से दूर डूबते सूरज को देखेंगे. पैसा कम होगा, लेकिन संतोष बहुत रहेगा. तुम जितना कमा कर लाओगे, मैं उतने में ही घर चला दूँगी.

मैंने नौकरी छोड़ दी है. अगले हफ्ते गाँव जा रही हूँ. तुम्हारा टिकेट कटाऊं? चलोगे?

प्यार,
तुम्हारी...

16 August, 2014

समंदर के सीने में एक रेगिस्तान रहता था

तुम्हें लगता है न कि समंदर का जी नहीं होता...कि उसके दिल नहीं होता...धड़कन नहीं होती...सांसें नहीं होतीं...कि समंदर सदियों से यूँ ही बेजान लहर लहर किनारे पर सर पटक रहा है...

कभी कभी समंदर की हूक किसी गीत में घुल जाती है...उसके सीने में उगते विशाल रेगिस्तान का गीत हो जाता है कोई संगीत का टुकडा...उसे सुनते हुए बदन का रेशा रेशा धूल की तरह उड़ता जाता है...बिखरता जाता है...नमक पानी की तलाश में बाँहें खोलता है कि कभी कभी रेत को भी अपने मिट्टी होने का गुमान हो जाता है...तब उसे लगता है कि खारे पानी से कोई गूंथ दे जिस्म के सारे पोरों को और गीली मिट्टी से कोई मूरत बनाये...ऐसी मूरत जिसकी आँखें हमेशा अब-डब रहे.

समंदर चीखता है उसका नाम तो दूर चाँद पर सोयी हुयी लड़की को आते हैं बुरे सपने...ज्वार भाटा उसकी नींदों में रिसने लगता है...डूबती हुई लड़की उबरने की कोशिश करती है तो उसके हाथों में आ जाती है किसी दूर की गैलेक्सी के कॉमेट की भागती रौशनी...वो उभरने की कोशिश करती है मगर ख्वाबों की ज़मीं दलदली है, उसे तेजी से गहरे खींचती है.

उसके पांवों में उलझ जाती हैं सदियों पुरानी लहरें...हर लहर में लिखा होता है उसके रकीबों का नाम...समंदर की अनगिन प्रेमिकाओं ने बोतल में भर के फेंके थे ख़त ऊंचे पानियों में...रेतीले किनारे पर बिखरे हुए टूटे हुए कांच के टुकड़े भी. लड़की के पैरों से रिसता है खून...गहरे लाल रंग से शाम का सूरज खींचता है उर्जा...ओढ़ लेता है उसके बदन का एक हिस्सा...

लड़की मगर ले नहीं सकती है समंदर का नाम कि पानी के अन्दर गहरे उसके पास बची है सिर्फ एक ही साँस...पूरी जिंदगी गुज़रती है आँखों के सामने से. दूर चाँद पर घुलती जाती है वो नमक पानी में रेशा रेशा...धरती पर समंदर का पानी जहरीला होता जाता है....जैसे जैसे उसकी सांस खींचता है समंदर वैसे वैसे उसको आने लगती है हिचकियाँ...वैसे वैसे थकने लगता है समंदर...लहरें धीमी होती जाती है...कई बार तो किनारे तक जाती ही नहीं, समंदर के सीने में ही ज़ज्ब होने लगती हैं. लड़की का श्राप लगा है समंदर को. ठहर जाने का.

एक रोज़ लड़की की आखिरी सांस अंतरिक्ष में बिखर गयी...उस रोज़ समंदर ऐसा बिखरा कि बिलकुल ही ठहर गया. सारी की सारी लहरें चुप हो गयीं. धरती पर के सारे शहर उल्काओं की पीठ चढ़ कर दूर मंगल गृह पर पलायन कर गए. समंदर की ठहरी हुयी उदासी पूरी धरती को जमाती जा रही थी. समंदर बिलकुल बंद पड़ गया था. सूरज की रौशनी वापस कर देता. किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि लहरों को गुदगुदी करे कि समंदर को फिर से कुछ महसूस होना शुरू करे. समंदर धीरे धीरे बहुत खूंखार होता जा रहा था. वो जितना ही रोता, उसके पानी में नमक उतना ही बढ़ता...इस सान्द्र नमक से सारी मछलियों को भी तकलीफ होने लगी...उन्होंने भी आसमान में उड़ना सीख लिया...एक रोज़ उधर से गुजरती एक उल्का से उन्होंने भी लिफ्ट मांगी और दूर ठंढे गृह युरेनस पे जाने की राह निर्धारित कर ली. समंदर ने उनको रोका नहीं.

समंदर के ह्रदय में एक विशाल तूफ़ान उगने लगा...अब कोई था भी नहीं जिससे बात की जा सके...अपनी चुप्पी, अपने ठहराव से समंदर में ठंढापन आने लगा था. सूरज की किरनें आतीं तो थीं मगर समंदर उन्हें बेरंग लौटा देता था. कहीं कोई रौशनी नहीं. कोई आहट नहीं. लड़की की यादों में घुलता. मिटता. समंदर अब सिर्फ एक गहरा ताबूत हो गया था. जिसमें से किसी जीवन की आशंका बेमानी थी. एक रोज़ सूरज की किरणों ने भी अपना रास्ता बदल लिया. गहरे सियाह समंदर ने विदा कहने को अपने अन्दर का सारा प्रेम समेटा...पृथ्वी से उसकी बूँद बूँद उड़ी और सारे ग्रहों पर जरा जरा मीठे पानी की बारिश हुयी...अनगिन ग्रहों पर जीवन का अंकुर फूटा...

जहाँ खुदा का दरबार लगा था वहाँ अपराधी समंदर सर झुकाए खड़ा था...उसे प्रेम करने के जुर्म में सारे ग्रहों से निष्काषित कर दिया...मगर उसकी निर्दोष आँखें देख कर लड़की का दिल पिघल गया था. उसने दुपट्टे की एक नन्ही गाँठ खोली और समंदर की रूह को आँख की एक गीली कोर में सलामत रख लिया.

13 August, 2014

याद की उलटबांसी...हम जैसे खुराफाती...तुमको मिली रे हमरी पाती? लिखना कम समझना बेसी, बूझे?


उनके शहर एक ही हार्टलाइन के दो छोरों पर बसे हुए थे. वो जब भी उसे फोन करती, दोनों शहरों का मौसम एक जैसा होने लगता...जरा जरा बादल हुमक कर लड़के के शहर चल देते...फुहारों में उसे भिगा भिगा छेड़ते...जरा सी लड़के के शहर की धूप लड़की के शहर पहुँच जाती, उसके गालों पर सूरजमुखी खिलाती...सुनहले रंग से उसकी आँखों के ऊपर आईशैडो लगाती.

जरा जरा सरफिरे ही थे ये दोनों बाशिंदे...अक्सर पागलपन में एक दूसरे से ही कम्पटीशन कर बैठते थे...फिर पूरी कायनात परेशान हो जाती थी इनके झगड़े सुलझाते सुलझाते. कभी सूरज दूसरे हेमिस्फेयर में देर से उगता तो कभी औरोरा बोरियालिस वोल्गा किनारे वोडका की बोतल मांगता नज़र आता...कभी गंगा का मटमैला पानी बाँध तोड़ कर दौड़ता तो पेरिस में आशिकों को एफिल टावर पर चढ़ कर अपनी जान बचानी पड़ती.

बड़े खतरनाक थे दोनों...दुनिया के कुछ शायर टाइप के लोग इनपर पीएचडी भी कर रहे थे कि आखिर दोनों के बीच चलता क्या है...दोस्त से बहुत ज्यादा, आशिक से जरा कम...मंटो के दीवाने...ग़ालिब पर फ़िदा...फैज़ से इश्क को लेकर तो दोनों में रकीबों का हिसाब चलता था...और ऐसा ही कुछ मेहंदी हसन को लेकर भी था...वो कभी उमराव की अदाओं पर जान देकर उर्दू सीखने लगता तो लड़की कर्ट कोबेन की आवाज़ में इतना गहरा डूब जाती कि अगले कई रोज़ तक हलक से आवाज़ नहीं निकलती...फिर लड़का ही गरारे करने को नमक पानी का इन्तेजाम करता...ब्लैक मार्केट से उसके लिए विस्की लेकर आता और बिना आइस के उसे पीने को देता...लड़की मुंह बनाती तो धमकाता...समंदर में फ़ेंक आने के किस्से सुनाता...लड़की कागज़ में रोल हुयी चिट्ठी बन जाती...विस्की की खाली बोतल में डूबती उतराती...

लड़की हंसती तो लड़का उसकी हँसी को रिकॉर्ड कर के रखने की कोशिश करता...हर बार रिप्ले करने पर भी वो खनक मिसिंग सी लगती जो उसकी जिन्दा आवाज़ में घुली होती थी. उसके हंसने से लड़के के शहर का बैलेंस गड़बड़ा जाता था...फिर वहां की इमारतें भी डगमग डगमग चलती थीं. लड़की की आवाज़ जैसे इत्र थी...मोबाइल में होती तो उसके होने की खुशबू आती. लड़की बेसुध सी हुआ करती थी, खुद को जहाँ तहां भूल आती...लड़का उसके पीछे उसकी छूटी चीज़ें सकेरता चलता. कभी दुपट्टा, कभी कलम, कभी नोटबुक, कभी मुस्कुराहटें, कभी ज़ख्म, कभी बारिश, कभी गुस्सा. लड़की भी कुछ ऐसी ही थी लड़के के लिए...उसकी सनक, उसका आलस, उसकी दारू की बोतलें, उसके टूटे हुए ऐशट्रे, बीड़ी का पैकेट, लाइटर, उसके बचपन के दोस्त, उसकी जवानी के रकीब, उसकी वीकेंड की प्रेमिकाएं...सब सकेरती रहती. दोनों एक दुसरे का डिपाजिट बॉक्स हुआ करते...जैसे बैंक में होता है न...सेफ...लॉकर जैसा कुछ. पहला जहाँ से बिखरता, दूसरा वहां से उसे सहेजता. एक दूसरे के होने से उन्हें खुद के खोने का डर कभी नहीं लगता और वे उन्मुक्त होकर जिंदगी के हर लम्हे को जीते जाते कि सहेज के रखने लायक हर चीज़ कोई और रख रहा है उनके हिस्से की.

एक दूसरे के बिना अधूरे थे वे...खुदा की लिखी एक कहानी का आधा आधा हिस्सा. जब साथ होते थे तो सारे डायलाग सही लगते थे...हर बेसिरपैर के पैराग्राफ का मतलब होता था...हर गीत की सही जगह होती थी. उनकी जिंदगी के कट्स भी सही जगह पर आते थे. उन्हें यकीन था कि एक दूसरे की जिंदगी में उनकी जो जगह है वो कोई और नहीं ले सकता...तो वे निश्चिंत होकर एक दूसरे की प्रेमकहानियों का जायका लेते. दिल टूटने पर एक दूसरे को सम्हालते भी. खुदा उनपर ख़ास नज़र रखता था...यूँ कि इतनी बड़ी दुनिया को चलाये रखना बेहद मुश्किल काम था. खुदा बोर होने पर उनकी गप्पें सुनता था...उनके पास करने को कितनी बातें थीं...खुदा को कभी कभी रश्क होता था कि उसने ऐसे लोग बनाये हैं जो उसकी दुनिया में ऐसे डूब के जीते हैं...महसूसते हैं. दोनों खुराफाती जानते थे कि खुदा उनकी बातें छुप छुप के सुनता है...वे ऐसे किसी दिन मंटो का किस्सा छेड़ देते. वे जानते थे कि खुदा मंटो से अच्छा ख़ासा चिढ़ता है. मंटो की अफ्सनानिगारी के किस्से निकल गए तो वे खुदा और उसकी बनायी दुनिया तक भूल जाते थे. खुदा ऐसे में मौसम खराब कर देता...तूफानों को उनके शहर भेजने की धमकी देता...मगर दोनों नाशुक्रे मंटो की किसी कहानी में छुप जाते और खुदा परेशान होकर तूफ़ान को किसी और देश भेज देता. यूँ भी उनके शहर एक ही हार्टलाइन के दो छोर पर थे...उनके शहरों में तूफ़ान लाने के लिए पूरी हार्टलाइन को डुबाना पड़ता...फिर तो दुनिया भर के आशिक खुदा को इतना गरियाते कि उसे बुखार हो आता. ऐसे में फिर लड़की के सिवा कौन था जो चाँद की पतली महीन पट्टियां रख सके खुदा के माथे पर. इस सब आफत से बेहतर खुदा किसी नए प्लैनेट पर नयी दुनिया बनाने चला जाता.

फिर दोनों खुराफाती मिल कर खुदा के दफ्तर में सेंधमारी करने का प्लान बनाते. चित्रगुप्त को अपनी साइड मिलाते...उसे झांसा देते कि खुदा को बताये बिना एक सुपरकंप्यूटर स्मगल कर देंगे स्वर्ग में. बेचारा चित्रगुप्त इतने दिन से उँगलियों पे गिन गिन के परेशान हो गया है. इन फैक्ट शकुंतला देवी को इतनी जल्दी ऊपर भेजने में भी इन्ही खुराफातियों का हाथ रहा है. चित्रगुप्त तक पर इन्होने अहसानों का कर्जा चढ़ा रखा है.

खुदा भी लेकिन खुदा है...जब इनसे बहुत परेशान हो जाता तो इश्क को भेज देता...कुछ दिन दोनों कंफ्यूज रहते और दुनिया में शान्ति रहती. सुबह शाम हरारत कि आखिर एक दूसरे से प्यार तो नहीं हो गया. कभी हाँ कभी ना के चक्कर में एक दूसरे से मिलते ही नहीं. फिर खुदा इंतज़ार करते करते बोर हो जाता और इश्क को वापस बुला लेता, उसका डिमोशन कर देता कि 'बेटा, तुमसे न हो पायेगा'. लड़का और लड़की फिर दोस्तों जैसे हो जाते और इश्क की भर भर खिंचाई करते. इश्क बेचारा बोरिया बिस्तर बाँध कर किसी 'दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे' जैसे निर्देशक के पास शरण मांगने भाग उठता. दुनिया में फिर से त्राहिमाम मचा रहता. नारद जी खुश रहते. खुदा खुश रहता. देश में जैसे अंग्रेजों भारत छोड़ो का आन्दोलन हुआ था वैसे ही इन दोनों से प्रेरित होकर देश भर में लड़के लड़कियां नारेबाजी करते 'एक लड़का और एक लड़की दोस्त हो सकते हैं'. फ्रेंडशिप डे चाहे राखी के दिन पड़ जाये कोई घबराये बिना अपना फ्रेंडशिप बैंड लेकर लड़की के पास चला जाता. इस तरह दुनिया को ठोकरों में रखते हुए, खुदा की एंटरटेनमेंट का पूरा इन्तेजाम करने वाले वो लड़का और लड़की उम्र भर दोस्तों की तरह ख़ुशी ख़ुशी हार्टलाइन के दो तरफ बने शहर में बेस्ट फ्रेंड बन के रहे.

बोलो सियावर राम चन्द्र की जय!

11 August, 2014

जिंदगी बीत जाती है मगर कितनी बाकी रह जाती है न?


कतरा कतरा दुस्वप्नों के तिलिस्म में फंसती, बड़ी ही खूंख्वार रात थी वो...बिस्तर की सलवटों में अजगर रेंगते...बुखार की हरारत सा बदन छटपटाता...मैं तुम्हारे नाम के मनके गिनती तो हमेशा कम पड़ जाते...ऐसे कैसे कटेगी रात...कि तुम्हारे आने में जाने कितने पहर बाकी हैं. प्यास हलक से उतरती तो पानी की हर बूँद जलाती...घबरा कर विस्की की बोतल उठाती तो याद आता कि फ्रीज़र में आइस ख़त्म है...नीट पी नहीं सकती, पानी की फितरत समझ नहीं आ रही...तो क्या अपना खून मिला कर विस्की पियूँ?

आजकल तो हिचकियों ने भी ख़त पहुँचाने बंद कर दिए हैं. तुम्हें मालूम भी होता कि तुमसे इतनी दूर इस शहर में याद कर रही हूँ तुमको? तुम्हारे आने का वादा तो कब का डिबरी की बत्ती में राख हुआ. लम्हे भर को आग चमकी थी...जैसे हुआ था इश्क तुमको. कभी सोचती हूँ तुमसे कह ही दूं वो सारी बातें जो मुझे जीने नहीं देती हैं. लम्हे भर को इश्क होता भी है क्या?

भोर उठी हूँ तो जाने किससे तो बातें करने का मन है. बहुत सारी बातें. या कि फिर एक लम्बी ड्राइव पर जाना और कुछ भी नहीं कहना. कुछ भी नहीं. जैसे एकदम चुप हो जाऊं. क्या फर्क पड़ता है कुछ भी कहने से. ऐसे कहने से न कहना बेहतर. तुम हो कहाँ मेरी जान? तुम्हारे शहर में भी बारिशें हुयीं क्या सारी रात? यहाँ तो ऐसा दर्दभरा मौसम है कि गर्म चाय से भी पिघलना मंजूर नहीं करता. तुलसी की पत्तियां तोड़ कर उबालने को रक्खी हैं...थोड़ी काली मिर्च, थोड़ी अदरक...काढ़ा पीने से शायद गले की खराश को थोड़ा आराम मिले...मेरे ख्याल से सपनों में देर तक आवाज़ देती रही हूँ तुम्हें...

तुम्हें मालूम है न मैं तुम्हें याद करती हूँ? जैसे दिल्ली के मौसम को याद करती हूँ...जैसे बर्न के अपनेपन को याद करती हूँ...जैसे अनजान देशों की गलियों में भटकते हुए कई रेस्टोरेंट्स के मेनू देखे और वहां लिखी हुयी ड्रिंक्स के नशे के बारे में सोचा. ख्यालों में अक्सर आती है कई दुपहरें जो तुमसे गप्पें मरते हुए काटी थीं...तुम्हारे ऑफिस के सीलिंग फैन की यादें भी हैं. तुम हँस रहे हो ये पढ़ कर जानती हूँ. सोचती ये भी हूँ कि तुम्हारे लायक कॉपी अब इस शहर में क्यूँ नहीं मिलती...सोचती ये भी हूँ कि तुम्हें ख़त लिखे बहुत बरस हो गए. अब भी कुछ अच्छा पढ़ती हूँ तो तुम्हें भेज देने का मन करता है. या कि कोई अच्छी फिल्म देखी तो लगता है तुम्हें देखने को कहती. जिंदगी के छोटे बड़े उत्सव तुम्हारे साथ बाँटने की ख्वाहिश अब भी बाकी है. तुम्हारे शहर के उस किले की खतरनाक मुंडेर पर पाँव झुलाते मंटो को गरियाने की ख्वाहिश भी मेरे दोस्त बाकी है. जिंदगी बीत जाती है मगर कितनी बाकी रह जाती है न?

कभी कभी सोचती हूँ तो लगता है हम एक जिगसा पजल हैं. मुझमें कितना कुछ बाकियों से आया है...जितनी बार प्यार हुआ, एक नए तरह का संगीत उसकी पहचान बनता गया...डूबते हुए हर बार किसी नए राग में सुकून तलाशा...किसी नए देश का संगीत सुना कि याद के ज़ख्म थोड़े कम टीसते थे कि संगीत में अनेस्थेटिक गुण होते हैं. वैसा ही कुछ लेखकों के साथ भी हुआ न. अगर मुझे जरा कम इश्क हुआ होता...या जरा कम दर्द हुआ होता तो मैं ऐसी नहीं होती.

वो कहता है मुझे अब बदलना चाहिए...जरा हम्बल होना चाहिए, जरा डिप्लोमेटिक. मगर मुझसे नहीं होगा. मैं ऐसी ही रही हूँ...अक्खड़, जिद्दी और इम्पल्सिव...बिना सोचे समझे कुछ भी करने वाली...बिना सोचे समझे कुछ भी बोल देने वाली. डिप्लोमेटिक होना न आया है न आएगा. जिद्दी भी बहुत हूँ. सुबह उठ कर जाने क्या क्या सोच रही हूँ. तुम होते तो इस परेशानी में कोई चिल्लर सा जोक मारते...या फिर अपनी घटिया आवाज में कोई सलमान खान का पुराना वाला गाना गा के सुनाते हमको...हम हँसते हँसते लोटपोट हो जाते और फिर अपनी किताब पर काम शुरू कर देते. जल्दी ही कहानियां फाइनल करनी हैं. कुछ नया नहीं लिख पाए हैं. अफ़सोस होता है...मगर फिर खुद को समझाते हैं. जिंदगी बहुत लम्बी है और ये मेरी आखिरी किताब नहीं होगी. अगर हुयी भी तो चैन से मर सकेंगे कि बकेट लिस्ट में बस एक ही किताब का नाम लिखे थे. बाकी तो बोनस है. कभी कभी अपने आप को जैसे हैं वैसा क़ुबूल लेना मुश्किल है...मुहब्बत तो दूर की बात है. फिर भी सुकून इतना ही है बस कि कोशिश में कमी नहीं की मैंने. अपना लिखा कभी परफेक्ट लगा ही नहीं है...न कभी लगेगा. आखिर डेडलाइन भी कोई चीज़ होती है. हाँ, जब फिल्में बनाउंगी तो वोंग कार वाई की तरह आखिरी लम्हे तक एडिट चालू रहेगा. शायद. बहुत कन्फ्यूजन है रे बाबा!

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