14 November, 2014

जब वो नहीं लिख रही होती खत…

वो रंगो से खुद को जुदा कर रही होती, हर ओर सिर्फ सलेटी रंग होता…काले सियाह और अप्रतिम श्वेत के बीच का सलेटी, कि जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं होती…एक एक करके फोटो अल्बम से हर खूबसूरत तस्वीर को ब्लैक ऐंड व्हाईट में बदल रही होती। उसकी किस्मत में कि उसे एक दिन प्रेम में जोगी भी हो जाना लिखा था…जब उसने अपने रंग बिरंगे परिधानों का त्याग किया तो दुनिया के सारे जुलाहों और रंगरेजों ने शोक मनाया कि उसके जैसा कोई नहीं रंगवाने आता था दुपट्टा…वह कितनी तो बातें करती सब से…दुनिया के सारे फलसफे उसे मुश्किल लगते थे। उसकी आँखों से देखो तो सब कितना आसान था, मगर दुनिया उस जैसों के लिये बनी नहीं है। 

चलती ट्रेन से कूद जाने के पहले उसे करने थे अपने सारे हिसाब बंद…बताना था सबके हिस्से में आया है कितने बटे कितने अंकों का प्यार। करने थे सारे पुराने बहीखाते क्लियर कि वह मुहब्बत के किसी किस्से में कुछ अधूरा छोड़ कर नहीं जा सकती थी। किसी की मुहब्बत का अहसान लिये नहीं जा सकती थी। यूँ तो यह सारी बातें अक्सरहाँ खतों में हो जाया करती हैं मगर कई बार खतों के जवाब आने में देर हो जाती है और फिलहाल लड़की के पास वक्त नहीं था। उसने दुनिया का नक्शा उठाया और तगादे के लिये बाकी लोगों को काले स्केच पेन से मार्क करने लगी। कभी कभी उसे घबराहट भी होती थी कि इतने सारे लोगों से कैसे कह पायेगी एक ही अलविदा। अलग अलग शहरों, देशों में बदलता जाता है विदा कहने का रंग भी। 

हिमाचल का इक शान्त सा गाँव था वह, नन्हा पहाड़ी गाँव, मासूम, प्यारा। हर ओर बर्फ गिरी थी। दूर दूर तक कोई रंग नहीं था कि उसकी आँखों में चुभ जाये। ग्लास में रंगहीन वोदका थी। मगर उस दीवाने लड़के की बातों में अब भी वही लाल रंग मौजूद था, प्रेम का, क्रान्ति का, घर में अब भी मार्क्स और चे ग्वेवारा की तस्वीरें थीं…हाँ उसकी आँखों में वो नीले समंदर की डुबा देने वाली गहराईयाँ नहीं थीं…उसकी आँखें एक उदास सियाह में बदल गयी थीं। ‘तुम मेरे साथ एक बार मौस्को चलोगी?, मेरा जाने कब से मन है मगर अकेले जाने का दिल नहीं करता।’ उसकी सुनती तो अलविदा के प्लान्स सारे पहले ही स्टौप पर धराशायी हो जाने थे। अनदेखे रूस की यादों में पुरानी फिल्म का साउंडट्रैक बहने लगा है…लारा सेय्स गुडबाई टु यूरी…इस मौसम में विदा कहना कितना मुश्किल होता है लेकिन अगर वह बर्फ पिघलने तक रूक जाती तो हर ओर इतने रंग के फूल खिल जाते कि उसके मन पर चढ़ जाते पक्के रंग, फिर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने मातम का काला चोला पहना है.

लड़के को उसके फितूर की कोई जानकारी नहीं थी. वह उसे बताता जा रहा था कि ऊंचे गंगोत्री के पास जो ग्लेशियर हैं ग्लोबल वार्मिंग से कितना असर पड़ रहा है उनपर. लड़के की बातें भी श्वेत श्याम होने लगी थीं अचानक. बस बचा था उसकी बातों का गहरा लाल रंग और उसकी आँखों की आग जो ख्वाबों में चुभ सकती थी. लड़की ऐसे ही सीखती न रंगों को अनदेखा करना...कहीं से तो शुरुआत करनी जरूरी थी. लड़की चाहती थी यादों के ब्लेड को तेज़ कर अपनी कलाईयों पे मार ले...बह जाने दे खून का सारा कतरा जो उसके नाम को चीखता है. लड़की सीख लेना चाहती थी उसको अपने आप से अलग कर देना. मगर ये सब इतना आसान थोड़े न था. लड़के ने चलने के पहले उसके माथे पर एक नन्हा सा चुम्बन टांका कि जिसमें जिंदगी भर की दुआएँ थीं...और मुहब्बत से उसकी आँखों में देखते हुए बोला...दस्विदानिया...रूस में ऐसा कहते हैं...फिर मिलेंगे. 

घुटने भर बर्फ में बस स्टॉप की ओर चलती हुयी लड़की को अचानक महसूस हुआ कि उसके हाथ बिलकुल सर्द पड़ गए हैं. उसने बैग की आगे की चेन से एक नीला दस्ताना निकला और अपने बायें हाथ में पहन लिया. दस्ताना जरा सा बड़ा था मगर उसकी गर्माहट सीधे दिल तक पहुँचती थी. उसे कोई पांच साल पुरानी सर्दियाँ याद आयीं...धूप में बैठ कर उनींदी आँखों से दस्ताने बुनना सीखना भी. चाचियाँ कैसे हंसती थीं कि उसके दास्ताने में अंगूठा था ही नहीं, बस पांच उँगलियाँ ही थीं. वूल्मार्क वाले निशान के गोले खरीद के लायी थी वो...गहरे नीले. खुद का तोहफा भी कोई वापस लेता है क्या? मगर उसने तो बस आधा सा ही खुद को समेटा है...इतना तो हक था उसका. उसे मालूम था कि जाने के बाद वो बहुत देर तक वो एक दस्ताना खोजता रहेगा...मगर जिंदगी में कुछ तो अधूरा कर जाने की चाहत थी...एक जोड़ी दस्ताने सही.

उसके जोग के काले कपड़ों पर एक नन्हा सा नीला दस्ताना भारी पड़ रहा था...जैसे हर अलविदा से ज्यादा चुभने वाला था इस मासूम मुहब्बत का दस्विदानिया. बारी बारी से हाथ बदल कर पहनती रही वो एक दस्ताना. हर बार जब गर्माहट दिल तक पहुँचने लगती थी उसे लगता था मौत तक जितनी जल्दी पहुँच जाए बेहतर. ये सफ़र उसके अन्दर हज़ार तूफानों की रोपनी कर रहा था...सीधी कतार में. 

वो जब नहीं लिख रही होती थी ख़त तो बाएँ हाथ में एक नीला दस्ताना पहने उन दिनों के ख्वाब बुनने लगती थी जब दोनों एक सड़क पर साथ साथ टहल रहे होंगे, एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए. लड़के ने दायें हाथ में दस्ताना पहना होगा...लड़की ने बाएँ...मगर उनके बिना दस्ताने वाले हाथ ज्यादा गर्म होंगे.
---
सर्दियाँ आ गयीं मेरी जान...तुम कब आओगे?

07 November, 2014

कुछ छलावे भी कितने महँगे बिकते हैं


वो हँसते हुये कहता है मुझसे
अच्छा…तो तुम्हें लगता है तुम तलाश लोगी मुझे?
शहर के इस कोलाहल में…
गाड़ियों, लोगों और मशीनों के इस विशाल औरकेस्ट्रा में
तुम छीज कर अलग कर दोगी मेरी आवाज
बचपन में दादी से सीखी थी क्या चूड़ा फटकना?
———
मुझे कभी नहीं आता भूलना, फिर कैसे?
छुट्टियों में रह गया खिड़की की जाली पर
हफ्ते भर बिन पानी का प्यासा पौधा
टप टप बरसता है मनी प्लाँट पर भीगा नवंबर
मगर बचा नहीं पाता है मेरे आने तक आखिरी साँसें
———
तुम तो आर्टिस्ट हो
बनाते हो मुहब्बत की काली आउटर लाइनिंग
कैनवस पर चलाते हो इंतजार के स्ट्रोक्स
मुझे लगता है मैं तुम्हारा मास्टरपीस हूँ
कुछ छलावे भी कितने महँगे बिकते हैं

——— 
रूह बदलती है लिबास
मुहब्बत बदलती है नाम, चेहरे, लोग
मैं बदलती गयी उस लड़की में
जिससे तुम्हें प्यार नहीं होना था कभी

06 November, 2014

हमारे कातिल तलाश लेते हैं हमें

ईश्वर को कम पड़ गयी थी
एक बूंद स्याही
मेरी किस्मत में उसका नाम लिखने के लिये
---

मैं उससे बच बच के चलती रही
कसम से
दूर...दूर और दूर
मुहल्ला। शहर। देश। प्लैनेट
और कभी कभी तो जिन्दगी से भी

आँसुओं से धुलता गया
मेरे वापस लौटने का नक्शा
दिल हँसता रहा मेरी नाकामयाबी पर
 मेरी कोशिशों पर भी

मैं कहाँ रच पायी इतनी दूरी
कि इक जिद्दी, आवारा ख्याल 
खोल ना पाये विस्मृति के सात ताले

मेरे उदास चेहरे को हथेलियों में भर कर
उसने मेरे माथे पर रखा
इक आखिरी बोसा
जिसे मिटा नहीं पाया कोई इरेजर 

हर आकाशगंगा में होता है एक सूर्य
उसकी आँखों के रंग का  
इक नदी उसकी गुनगुनाहटों सी मीठी 
--- 

स्याही की इक लाल बूंद से 
उसने मेरा वरण किया

तब से। 

अनंत के किसी भी क्षण 
मुझे नहीं आया उसके बिना जीना
मैं हर आयाम में होती हूँ अभिशप्त
उसके विरह में जलने के लिये

21 October, 2014

विस्मृति का विलास सबके जीवन में नहीं लिखा होता प्रिये



किसी शहर में भूल जाना भी याद करना जितना आसान होगा. डायरी में लिख दिया अमुक का बर्थडे फलां फलां डेट को है. उस दिन याद से उसे मुबारकबाद कह देनी है नहीं तो साला बर्थडे पर बुलाएगा नहीं और खामखा एक केक का नुकसान हो जाएगा. मेरा गरीब पेट ऐसे कुछ ऐय्याशियों के भरोसे जीता है. उत्सव के ये कुछ दिन छिन गए तो कसम से एक दिन ओल्ड मौंक में जहर मिला कर पी जायेंगे.

वैसी ही एक दिन लिख देना है डायरी में कि फलाने को आज से चौदह दिन बाद भूल जाना है. बस. अब कोई माई का लाल हमको आज के चौदह दिन बाद याद नहीं दिला पायेगा कि कमबख्त को याद कर के देर रात टेसुआ बहाए थे और भों भों रोये थे कि उसके बिना जिंदगी बेकार है.

मगर फिर कोमल मन कहता है...विस्मृति का विलास सबके जीवन में नहीं लिखा होता प्रिये...याद का ताजमहल बनाने वाले की नियति यही होती है कि एक कोठरी से उसे देख कर बाल्टी बाल्टी आंसू बहाया करे. मैं देख रही हूँ कि मैं लिखना कोमल चाहती हूँ मगर मेरे अन्दर जो दो भाषाएँ पनाह पाती हैं उनमें जंग छिड़ी हुयी है. एक उजड्ड मन चाहता है उसे बिहार की जितनी गालियाँ आती हैं, शुद्ध हिंदी में दे कर अपने मन का सारा बोझ हल्का कर लूं...इतने पर भी मन ना भरे तो कुछ गालियाँ खुद से इन्वेंट कर लूं और दिल के सारे गुबार को निकल जाने दूं...मगर यहीं एक उहापोह की स्थिति सी आ जाती है...कि लिखते हुए चूँकि बचपन से संस्कारी बनाया गया है तो ब्लॉग पर की चिट्ठियां भी 'आदरणीय पूर्व प्रेमी' की तरह ही शुरू होती हैं...भले ही बाद में मन उसमें लिखा जाये कि करमजले तेरे कारण जो मेरी रातों की नींद उड़ी है जिसके कारण मैं ऑफिस लेट गयी और मेरी महीने में तीन दिन की तनख्वाह कटी और जो उसके कारण मेरे को एक हफ्ते दारू पीने को नहीं मिली उसके कारण मैं तुम्हें जो जो न श्राप और गालियों से नवाज़ दूं मगर नारी का ह्रदय...भयानक कोमल होता है. आड़े आ जाता है और उसे काल्पनिक कहानियों में भी विलेन नहीं बनने देता है. अगर मैं बहुत मुश्किल से उसको बाँध बून्ध कर कोई किरदार रच भी देती हूँ तो उसका नाम कुछ और रखना पड़ता है. कुछ ऐसा जिसका उससे दूर दूर तक पाला न पड़ा हो.

मुझे हिंदी और अंग्रेजी, दो भाषाएँ बहुत अच्छी तरह से आती हैं मगर गड़बड़ क्या हो गयी है कि कई बार इस तरह के टुच्चे प्रेम में पड़ने के कारण मेरे पसंद के सारे अलंकरण समाप्त हो चुके हैं. अब इस नए प्रेम से उबरने की खातिर कोई नयी भाषा सीखनी होगी कि प्रेम को भी नए शब्द मिलें या कि विरह को. भाषा का अपना भूगोल होता है...अपनी कहानियां होती हैं. नयी भाषा में नए तरह के अलंकार रचने में सुभीता रहेगा. पिछले कुछ दिनों फ्रेंच भाषा सीखने की कोशिश की थी. उस वक़्त भाषा से प्रेम में थी...फिलहाल प्रेम से बिलकुल उकताई हुयी और नए किसी विषय की तलाश में हूँ. शायद ये देखना भी बेहतर होगा कि प्रेम से इतर भाषा सीखने में मोह होता है कि नहीं. दो भाषाएँ मिल कर नए तरह के बिम्ब बनाती हैं. जैसे दो पूर्व प्रेमियों की याद एक साथ अचानक से आ जाए तो जगहें क्रॉसफेड कर जाती हैं. दिल्ली के कनाट प्लेस में वोल्गा बहने लगती है...विस्की नीट पीने की जगह सोडा की ख्वाहिश होने लगती है या कभी कभी तो इससे भी हौलनाक नतीजे सामने आते हैं. ओरेंज जूस में टकीला मिलाने की इच्छा होने लगती है. गुनी जन जानते हैं कि वोडका और ओरेंज जूस का कोम्बिनेशन दुनिया के विशेषज्ञों द्वारा मान्यता प्राप्त है. कुछ वैसे ही जैसे कुछ तरह के प्रेम को अधिकारिक नाम और सम्मान मिले हैं. हंसिये मत...एक दिन फेसबुक पर स्टेटस तो डाल कर देखिये...१८ साल की सिंगल माल्ट को क्रैनबेरी जूस में मिक्स करके पी रहे हैं...पूरी दुनिया हदास में आ जायेगी. लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं होगा कि देर रात कौन सा गम गलत करने के लिए आप फेसबुक पर मेसेज डाल रहे हैं मगर सिंगल माल्ट की दुर्दशा से आत्मा दुखने लगेगी. उनकी इत्ती बद्दुआयें लगेंगी कि अगले पूरे साल न इन्क्रीमेंट होगा न बोनस मिलेगा. उतनी महँगी दारू खरीदने के लिए तरस जायेंगे आप.

का बताएं बाबू, हमको भाषण मत दो...हम वाकई बहुत सेल्फिश हैं. ई सब प्रेम का ड्रामा इसलिए है कि लिखने लायक जरा मरा मैटेरियल जुगाड़ हो सके. पोलिटिक्स पर लिखना आता तो कहीं जर्नलिस्ट बन कर चिल्लाते रहते 'जनता माफ़ नहीं करेगी'. त्यौहार का मौसम है. सेंटियापे को झाड़ बुहार के बाहर फ़ेंक के आते हैं. ई कोई बेमौसम लिखने का आदत साला. उफ़. वैसे मुहब्बत का मौसम भी तो यही है न? ठंढ का...फिर कोई घपला हुआ है कहीं...ई प्यार में गिरने के मौसम में प्यार से बाहर छलांगना पड़ रहा है. यही सद्बुद्धि मिला है! सफाई में फ्रेंच वाला नोटबुक सब मिला है...जाते हैं तुमको दो चार दो गाली फ्रेंच में लिख जायेंगे और फिर याद में गरियाते हुए कहेंगे Je t'aime जानेमन.

बहरहाल...बहका हुआ मन भाषा से पीने पर ऐसे फिसलता है जैसे धोये हुए सबुनियाये घर पर अनगढ़ गृहणी...नॉन सलीकेदार यु नो? पौधों में कम्पोस्ट डालना है, गमले उठा कर लाने हैं. दिया वगैरह लाना है. इतनी लम्बी लिस्ट है. इसी में लिख लेते हैं. तुम्हारे इस बेरहम, बेमौसम ईश्क़ को हम आज से १५ दिन बाद भूल जायेंगे. तुम्हारी कसम. 

20 October, 2014

कोई मौसम हो तुम...ठंढी रेत से...गुमशुदा


वो एक बेवजह की गहरी लम्बी रात थी कि जब लड़की ने फिर से अपने आप को किसी रेत के टीले पर पाया...ये पहली बार नहीं था. उसे अहसास था कि वो पहले यहाँ आ चुकी है. एक बहुत पुरानी शाम याद आई जो ढलते ढलते रात हो चुकी थी. अलाव जल रहे थे. ठंढ का मौसम था. कुछ ऐसे कि मौसम का स्वाद दिल्ली की सर्दियों जैसा था. वो आते हुए ठंढ के मौसम को जुबान पर चखते हुए कहीं दूर देख रही थी. रात को अचानक से टूटी नींद में कोई ऐसा लम्हा इतना साफ़ उग जाए...ऐसे लम्हे बहुत कम होते थे. उसे कब की याद आई ध्यान नहीं था मगर सारे अहसास एकदम सच्चे थे. रेत बिलकुल महीन थी...सलेटी रंग की...रात की ठंढ से रेत भी ठंढी हो रखी थी. उसके पैरों में लिपट रही थी. उसने जरा सी रेत अपनी मुट्ठी में भरी...रेत में उँगलियाँ उकेरीं...बहुत बहुत सालों बाद भी वो उसका नाम लिखना चाहती थी. रेत का फिसलता हुआ रेशम स्पर्श और ठंढ उसकी हथेलियों में रह गया. जैसे मुट्ठी में रेतघड़ी बना ली उसने. जैसे वो खुद कोई रेत घड़ी हो गयी हो. कितने लम्हे थे उसके होने के...जब कि वो वाकई में था...और उसके जाने के बाद कितने लम्हे रहेगी उसकी याद? बहुत सालों बाद उसने उसका नाम लेना चाहा...कोमल कंठ से...उँगलियों के ठंढे स्पर्श से उसके माथे को छूना चाहा...जानते हुए कि चाँद उसके कमरे की खिड़की पर ठहरा होगा अभी, चाँद से एक नज़र माँग लेनी चाही...बहुत साल बाद उसे एक नज़र भर देखना चाहा...एक आस भर छूना चाहा...जैसे उसके उदास चेहरे पर कोई छाया सी उभरी और बिसर गयी...लड़की भी कब तक चाँद से मिन्नत करती उसकी आँखें देखने की...रात भी गहरी थी...चाँद भी उदास था...कुछ न होता अगर वो जागा हुआ भी होता तो...लड़की कभी न जान पाती उसकी आँखों का रंग कैसा था. 

धीरे धीरे बिसर रहा था कैस उसकी आँखों से...रुबाब पर बज रही थी कोई प्राचीन धुन...इतनी पुरानी जितना इश्क था...इतनी पुरानी जितना कि वो वक़्त जब कि कैस की जिन्दा आँखों में उसकी मुहब्बत के किस्से हुआ करते थे. मगर रेगिस्तान बहुत बेरहम था...उसकी दलदली बालू में लड़की के सारे ख़त गुम जाया करते थे. मगर लड़की गंगा के देश की थी...उसने दलदल नहीं जानी थी. उसके लिए डूबना सिर्फ गंगा में डूबना होता था...जिसमें कि यादों को मिटा देने की अद्भुत क्षमता थी. 

वो भी ऐसी ही एक रात थी. कैलेण्डर में दर्ज हुयी रातों से मुख्तलिफ. वो किस्से कहानियों की रात थी...वो किस्से कहानियों सी रात थी. लड़की को याद आता आता सा एक लम्हा मिला कि जिसमें उसके नीले रंग की पगड़ी से खुशबू आ रही थी. उसने अपनी उँगलियों में उसके साफे का वो जरा सा टुकड़ा चखा था, रेशम. उसके बदन से उजास फूटती थी. जरा जरा चांदी के रंग की. कैस किम्वदंती था. लड़की को उसके होने का कोई यकीन नहीं था इसलिए उसकी सारी बातों पर ऐतबार किया उसने. यूँ भी ख्वाब में तो इंसान को हर किस्म की आज़ादी हुआ करती है. लड़की कैस के हाथों को छूना चाहती थी...मगर कैस था कि रेत का काला जादू...अँधेरी रात का गुमशुदा जिन्न...फिसलता यूँ था कि जैसे पहली बार किसी ने भरा हो आलिंगन में. 

वे आसमान को ताकते हुए लेटे हुए थे. अनगिनत तारों के साथ. आधे चाँद की रात थी. आकाशगंगा एक उदास नदी की तरह धीमे धीमे अपने अक्ष पर घूम रही थी. लड़की उस नदी में अपना दुपट्टा गीला कर कैस की आँखों पर रखना चाहती थी. ठंढी आँखें. कैस की ठंढी आँखें. दुपट्टे में ज़ज्ब हो जाता उसकी आँखों का रंग जरा सा. बारीक सी हवा चलती थी...कैसे के चेहरे को छूती हुयी लड़की के गालों पर भंवर रचने लगती.

लड़की की नींद खुलती तो सूरज चढ़ आया होता उसके माथे के बीचो बीच और रेत एक जलते हुए जंगल में तब्दील हो जाया करती. तीखी धूप में छील दिया करती रात का सारा जादू. उसकी उँगलियों से उड़ा ले जाती स्पर्श का छलावा भी. आँखों में बुझा देती उसे एक बार देखने के ख्वाहिश को भी. दुपहर की रेत हुआ करती नफरतों से ज्यादा चमकदार. लड़की की पूरी पलटन सब भूल कर वापस लग जाती खुदाई के कार्य में. उस लुटे हुए पुराने शहर में बरामद होता एक ही कंकाल...गड्ढों सी धंसी आँखों से कभी नहीं पता चल पाता कि क्या था उसकी आँखों का रंग. उसका नीला रेशम का साफा इतना नाज़ुक होता जैसे कि लड़की का दिल...छूने से बदलता जाता रेत में. ऐसे ही गुम क्यों न हो जाती कैस की याद? 

उसे भूलना नामुमकिन हुआ करता. लड़की रातों रात दुहराती रहती एक ही वाक्य 'वो सच नहीं था...वो सच नहीं था'. वो भुलावा था. छल था. मायावी थी. तिलिस्मी. लड़की की कहानियों का किरदार.  

कैस...उफ़ कैस...कि कैस कोई किरदार नहीं था...प्रेम को दिया हुआ एक नाम था बस. एक अभिमंत्रित नाम कि जिसके उच्चारण से जिन्दा हो उठता था प्रेम...किसी के भी दिल में... 

फिर वो लड़की मीरा की तरह कृष्ण कृष्ण पुकारे या कि मेरी तरह तुम्हारा नाम.

15 October, 2014

पतिता

एक रोज़ उदात्त हो कर
तुम माफ़ कर देना चाहोगे मेरे सारे गुनाह
खोल दोगे दरवाज़ा
कि मैं वापस दाखिल हो सकूँ तुम्हारी जिंदगी में
चाहोगे कि फिर से घर की क्यारियों में रोप दूं
इश्क के नन्हे बिरवे
फसल पके, तैयार हो और हम पहले की तरह बैठे डाइनिंग टेबल पर
रेड वाइन पीते हुए तुम कहो कि मेरी आँखें खुदा की आँखों जैसी हैं
कि मेरी खुशबू से उठता है एक पाकीज़ा अहसास तुम्हारे जिस्म में
कि तुम मुझे छूने से ज्यादा मेरी इबादत करना चाहते हो

उस रोज़
मैंने क़ुबूल लिए होंगे अपने सारे अपराध
कर दिए होंगे सरकारी दस्तावेज़ पर दस्तखत
जब मैं नाम गिनाउंगी तुम्हारी पुरानी प्रेमिकाओं के
जज हत्याओं को कहेगा 'क्राइम ऑफ़ पैशन'
और मुझपर रियायत बरतते हुए कम कर देगा मेरी सजा
सिर्फ इक्यासी सालों तक की उम्रकैद बनिस्पत मृत्युदंड के

मुझे तब भी न आएगा प्रायश्चित का सलीका
मैं तब भी सीखूंगी काला जादू
और दु:स्वप्नों में नोच लूंगी उनकी नीली आँखें
रचती रहूंगी उनके नाम से अभिशप्त, आत्मघाती किरदार
कि जब तक ये उनके जीवन का सच नहीं हो जाता

मगर इतने में भी अगर नहीं मिलेगा सुकून
तो मैं शैतान के पास बेच आउंगी अपनी रूह
कर लूंगी चित्रगुप्त के साथ कोई अवैध करार
और उनके नाम लिखवा दूँगी प्रताड़नायें
और एक बेहद लम्बी उम्र

तुमसे आखिरी बार मिलने के रोज़
बताते हुए कि कितना गहरा है इश्क
चूल्हे पर रखते हुए तुम्हारे पसंद की चाय
रिसने दूँगी बहुत सारी ज्वलनशील गैस
तुमसे कहूँगी मेरे लिए जला दो एक सिगरेट
धमाके से लगेगी आग
कि जिसमें तुम्हारे साथ जल मरूंगी
बिल्कुल किसी सती स्त्री की तरह.

उस लड़की की डायरी

कुछ है. सीने में अटका हुआ.
कुछ. बाकी रह जाता है, मेरे सब कुछ लिखने के बाद भी.
कुछ. मैं कहना चाहती हूँ मगर बहुत सारी बातें कहने के बाद भी कह नहीं पाती.

मैं अपनेआप को एक्सेप्ट नहीं कर पा रही जैसी मैं हूँ...और मुझे जैसे बदलाव चाहिए उनके लिए मैं कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही. जैसे कि साधारण सी बात है कि वजन ५८ हो रखा है. मैं इसमें से सिर्फ ८ किलो लूज कर लूं तो मुझे मन की शांति मिल जायेगी. टेक्निकली मैं किसी भी जिम में जाउंगी तो इंस्ट्रक्टर कहेगी कि एक महीने में २ किलो के हिसाब से ये बस चार महीने की बात है. मैं सुनूंगी, समझूँगी...मगर कर नहीं पाऊँगी. आजकल अपने वेट को लेकर बहुत ज्यादा कौन्सियस हो गयी हूँ. खूबसूरती सिर्फ वजन पर डिपेंड नहीं करती. मैं अपनाप से कहना चाहती हूँ कि खुद की आँखों में देखना चाहिए...यहाँ अब ही वैसी ही चमक मौजूद है...मुस्कराहट वैसी ही है...दोस्तों के साथ मैं वैसे ही हंसती खिलखिलाती हूँ...मगर इन सबके बावजूद एक और आँख उग गयी है मेरे अन्दर जो मुझे हमेशा ही क्रिटिकल दृष्टि से देखती रहती है और कहती रहती है कि मैं अच्छी नहीं लग रही...कि ड्रेस मुझ पर नहीं फब रही.

मैं मानसिक रूप से बीमार होती जा रही हूँ...ये जरा सा वजन जैसे मेरे दिमाग पर रखा हुआ है या जैसे मेरे सीने पर...हर समय बदहवासी सी लगती है. ऐसा नहीं है कि मैं प्रयास नहीं करती. जॉगिंग शुरू की थी तो कुछ दिनों में घुटने में दर्द होने लगा. मुझे अपाहिज हो जाने से सबसे ज्यादा डर लगता है. घर में नानी के घुटने ख़राब हो गए थे और दोनों को रिप्लेस करना पड़ा था. तब से मैं अपने घुटनों को लेकर बहुत जायदा हैरान और परेशान रहती हूँ.

स्विमिंग का कब से प्लान बना रखा है. घर के पास ही स्विमिंग पूल है. सुबह के टाइम पर ही वहां पर क्लासेज होती हैं. मैं जानती हूँ कि अगर मैंने ज्वाइन कर लिया तो मैं नियमित जाउंगी भी. मुझे तैरना अच्छा लगता है. अब मैं पानी में डूबती भी नहीं. अपने से मेहनत कर के मैंने फ्लोटिंग सीख ली है. मगर मैं रोज़ सिर्फ सोचती हूँ कि जाउंगी और जा नहीं पाती. मैं अपनी नज़र में अजीब किस्म की ख़राब दिखने लगी हूँ. चेहरा...माथा...आंखें सब. और मैं महसूस करती हूँ कि बीमार होने के लिए कोई वजह हो जरूरी नहीं...हम कभी कभी माँग कर ऐसी कोई बीमारी बुला लेते हैं. इस टेंशन के कारण मुझे खाना खाने से अरूचि हो गयी है. मैं अक्सर रात का डिनर स्किप कर देती हूँ. सुबह का नाश्ता समय पर खाती हूँ पर उसके अलावा खाना खाने में अजब सी गिल्ट फीलिंग होती है.

कल उससे बात कर रही थी तो वो बोल रहा था मैं सोचती बहुत ज्यादा हूँ. मैं भी जानती हूँ कि मैं ओवर अनलाईज करती हूँ चीज़ों को. मगर मैं किसकी आँखों से देखूं खुद को और सोचूं कि मैं अच्छी दिखती हूँ. और अच्छा दिखना कब से मेरे लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया. पहले ऐसा नहीं था क्यूंकि पहले वाकई सोचना नहीं पड़ता था. ऐसा कोई परिधान नहीं था जो मुझपर अच्छा नहीं लगता था. मैं ढीली ढाली टीशर्ट और डेनिम पहन लेती थी तो अच्छा लगता था...कुरता जींस हो या कि सलवार सूट....साड़ी पहनते हुए तो कभी सोचना ही नहीं पड़ा. ये कैसी अजीब बेईमानी है कि भागती हुयी इस कीमती जिंदगी का इतना सारा हिस्सा ये सोचने में लगाया जाए कि मैं क्या पहनूं कि मोटी ना लगूं. मैं ऐसी नहीं हुआ करती थी. आजकल मुझे साड़ी पहनने में भी टेंशन होती है. लोग कहते हैं कि ये सारा फितूर मेरे दिमाग का है...मैं अच्छी लगती हूँ...मगर मुझे फिर लगता है कि वो मुझसे बहुत प्यार करते हैं और मेरा दिल रखने के लिए ऐसा कह रहे हैं.

मैं ऐसी नहीं थी. मैं चीज़ों को लेकर इतना सोच सोच के अपना दिमाग खराब नहीं करती थी. मुझे अगर कोई प्रॉब्लम होती थी तो मैं उसका सलूशन खोजती थी...सोच सोच के उसपर वक्त बर्बाद नहीं करती थी. तो मुझे क्या होता जा रहा है? आइडियल कंडीशन में...जॉब छोड़े हुए ५ महीने हो गए हैं...मैंने इतने में जिम या स्विमिंग ज्वाइन करके खुश रह सकती थी कि मैंने कोशिश की. मगर नहीं. उफ़. मैं पागल हुए जा रही हूँ. 

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