21 October, 2014

विस्मृति का विलास सबके जीवन में नहीं लिखा होता प्रिये



किसी शहर में भूल जाना भी याद करना जितना आसान होगा. डायरी में लिख दिया अमुक का बर्थडे फलां फलां डेट को है. उस दिन याद से उसे मुबारकबाद कह देनी है नहीं तो साला बर्थडे पर बुलाएगा नहीं और खामखा एक केक का नुकसान हो जाएगा. मेरा गरीब पेट ऐसे कुछ ऐय्याशियों के भरोसे जीता है. उत्सव के ये कुछ दिन छिन गए तो कसम से एक दिन ओल्ड मौंक में जहर मिला कर पी जायेंगे.

वैसी ही एक दिन लिख देना है डायरी में कि फलाने को आज से चौदह दिन बाद भूल जाना है. बस. अब कोई माई का लाल हमको आज के चौदह दिन बाद याद नहीं दिला पायेगा कि कमबख्त को याद कर के देर रात टेसुआ बहाए थे और भों भों रोये थे कि उसके बिना जिंदगी बेकार है.

मगर फिर कोमल मन कहता है...विस्मृति का विलास सबके जीवन में नहीं लिखा होता प्रिये...याद का ताजमहल बनाने वाले की नियति यही होती है कि एक कोठरी से उसे देख कर बाल्टी बाल्टी आंसू बहाया करे. मैं देख रही हूँ कि मैं लिखना कोमल चाहती हूँ मगर मेरे अन्दर जो दो भाषाएँ पनाह पाती हैं उनमें जंग छिड़ी हुयी है. एक उजड्ड मन चाहता है उसे बिहार की जितनी गालियाँ आती हैं, शुद्ध हिंदी में दे कर अपने मन का सारा बोझ हल्का कर लूं...इतने पर भी मन ना भरे तो कुछ गालियाँ खुद से इन्वेंट कर लूं और दिल के सारे गुबार को निकल जाने दूं...मगर यहीं एक उहापोह की स्थिति सी आ जाती है...कि लिखते हुए चूँकि बचपन से संस्कारी बनाया गया है तो ब्लॉग पर की चिट्ठियां भी 'आदरणीय पूर्व प्रेमी' की तरह ही शुरू होती हैं...भले ही बाद में मन उसमें लिखा जाये कि करमजले तेरे कारण जो मेरी रातों की नींद उड़ी है जिसके कारण मैं ऑफिस लेट गयी और मेरी महीने में तीन दिन की तनख्वाह कटी और जो उसके कारण मेरे को एक हफ्ते दारू पीने को नहीं मिली उसके कारण मैं तुम्हें जो जो न श्राप और गालियों से नवाज़ दूं मगर नारी का ह्रदय...भयानक कोमल होता है. आड़े आ जाता है और उसे काल्पनिक कहानियों में भी विलेन नहीं बनने देता है. अगर मैं बहुत मुश्किल से उसको बाँध बून्ध कर कोई किरदार रच भी देती हूँ तो उसका नाम कुछ और रखना पड़ता है. कुछ ऐसा जिसका उससे दूर दूर तक पाला न पड़ा हो.

मुझे हिंदी और अंग्रेजी, दो भाषाएँ बहुत अच्छी तरह से आती हैं मगर गड़बड़ क्या हो गयी है कि कई बार इस तरह के टुच्चे प्रेम में पड़ने के कारण मेरे पसंद के सारे अलंकरण समाप्त हो चुके हैं. अब इस नए प्रेम से उबरने की खातिर कोई नयी भाषा सीखनी होगी कि प्रेम को भी नए शब्द मिलें या कि विरह को. भाषा का अपना भूगोल होता है...अपनी कहानियां होती हैं. नयी भाषा में नए तरह के अलंकार रचने में सुभीता रहेगा. पिछले कुछ दिनों फ्रेंच भाषा सीखने की कोशिश की थी. उस वक़्त भाषा से प्रेम में थी...फिलहाल प्रेम से बिलकुल उकताई हुयी और नए किसी विषय की तलाश में हूँ. शायद ये देखना भी बेहतर होगा कि प्रेम से इतर भाषा सीखने में मोह होता है कि नहीं. दो भाषाएँ मिल कर नए तरह के बिम्ब बनाती हैं. जैसे दो पूर्व प्रेमियों की याद एक साथ अचानक से आ जाए तो जगहें क्रॉसफेड कर जाती हैं. दिल्ली के कनाट प्लेस में वोल्गा बहने लगती है...विस्की नीट पीने की जगह सोडा की ख्वाहिश होने लगती है या कभी कभी तो इससे भी हौलनाक नतीजे सामने आते हैं. ओरेंज जूस में टकीला मिलाने की इच्छा होने लगती है. गुनी जन जानते हैं कि वोडका और ओरेंज जूस का कोम्बिनेशन दुनिया के विशेषज्ञों द्वारा मान्यता प्राप्त है. कुछ वैसे ही जैसे कुछ तरह के प्रेम को अधिकारिक नाम और सम्मान मिले हैं. हंसिये मत...एक दिन फेसबुक पर स्टेटस तो डाल कर देखिये...१८ साल की सिंगल माल्ट को क्रैनबेरी जूस में मिक्स करके पी रहे हैं...पूरी दुनिया हदास में आ जायेगी. लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं होगा कि देर रात कौन सा गम गलत करने के लिए आप फेसबुक पर मेसेज डाल रहे हैं मगर सिंगल माल्ट की दुर्दशा से आत्मा दुखने लगेगी. उनकी इत्ती बद्दुआयें लगेंगी कि अगले पूरे साल न इन्क्रीमेंट होगा न बोनस मिलेगा. उतनी महँगी दारू खरीदने के लिए तरस जायेंगे आप.

का बताएं बाबू, हमको भाषण मत दो...हम वाकई बहुत सेल्फिश हैं. ई सब प्रेम का ड्रामा इसलिए है कि लिखने लायक जरा मरा मैटेरियल जुगाड़ हो सके. पोलिटिक्स पर लिखना आता तो कहीं जर्नलिस्ट बन कर चिल्लाते रहते 'जनता माफ़ नहीं करेगी'. त्यौहार का मौसम है. सेंटियापे को झाड़ बुहार के बाहर फ़ेंक के आते हैं. ई कोई बेमौसम लिखने का आदत साला. उफ़. वैसे मुहब्बत का मौसम भी तो यही है न? ठंढ का...फिर कोई घपला हुआ है कहीं...ई प्यार में गिरने के मौसम में प्यार से बाहर छलांगना पड़ रहा है. यही सद्बुद्धि मिला है! सफाई में फ्रेंच वाला नोटबुक सब मिला है...जाते हैं तुमको दो चार दो गाली फ्रेंच में लिख जायेंगे और फिर याद में गरियाते हुए कहेंगे Je t'aime जानेमन.

बहरहाल...बहका हुआ मन भाषा से पीने पर ऐसे फिसलता है जैसे धोये हुए सबुनियाये घर पर अनगढ़ गृहणी...नॉन सलीकेदार यु नो? पौधों में कम्पोस्ट डालना है, गमले उठा कर लाने हैं. दिया वगैरह लाना है. इतनी लम्बी लिस्ट है. इसी में लिख लेते हैं. तुम्हारे इस बेरहम, बेमौसम ईश्क़ को हम आज से १५ दिन बाद भूल जायेंगे. तुम्हारी कसम. 

20 October, 2014

कोई मौसम हो तुम...ठंढी रेत से...गुमशुदा


वो एक बेवजह की गहरी लम्बी रात थी कि जब लड़की ने फिर से अपने आप को किसी रेत के टीले पर पाया...ये पहली बार नहीं था. उसे अहसास था कि वो पहले यहाँ आ चुकी है. एक बहुत पुरानी शाम याद आई जो ढलते ढलते रात हो चुकी थी. अलाव जल रहे थे. ठंढ का मौसम था. कुछ ऐसे कि मौसम का स्वाद दिल्ली की सर्दियों जैसा था. वो आते हुए ठंढ के मौसम को जुबान पर चखते हुए कहीं दूर देख रही थी. रात को अचानक से टूटी नींद में कोई ऐसा लम्हा इतना साफ़ उग जाए...ऐसे लम्हे बहुत कम होते थे. उसे कब की याद आई ध्यान नहीं था मगर सारे अहसास एकदम सच्चे थे. रेत बिलकुल महीन थी...सलेटी रंग की...रात की ठंढ से रेत भी ठंढी हो रखी थी. उसके पैरों में लिपट रही थी. उसने जरा सी रेत अपनी मुट्ठी में भरी...रेत में उँगलियाँ उकेरीं...बहुत बहुत सालों बाद भी वो उसका नाम लिखना चाहती थी. रेत का फिसलता हुआ रेशम स्पर्श और ठंढ उसकी हथेलियों में रह गया. जैसे मुट्ठी में रेतघड़ी बना ली उसने. जैसे वो खुद कोई रेत घड़ी हो गयी हो. कितने लम्हे थे उसके होने के...जब कि वो वाकई में था...और उसके जाने के बाद कितने लम्हे रहेगी उसकी याद? बहुत सालों बाद उसने उसका नाम लेना चाहा...कोमल कंठ से...उँगलियों के ठंढे स्पर्श से उसके माथे को छूना चाहा...जानते हुए कि चाँद उसके कमरे की खिड़की पर ठहरा होगा अभी, चाँद से एक नज़र माँग लेनी चाही...बहुत साल बाद उसे एक नज़र भर देखना चाहा...एक आस भर छूना चाहा...जैसे उसके उदास चेहरे पर कोई छाया सी उभरी और बिसर गयी...लड़की भी कब तक चाँद से मिन्नत करती उसकी आँखें देखने की...रात भी गहरी थी...चाँद भी उदास था...कुछ न होता अगर वो जागा हुआ भी होता तो...लड़की कभी न जान पाती उसकी आँखों का रंग कैसा था. 

धीरे धीरे बिसर रहा था कैस उसकी आँखों से...रुबाब पर बज रही थी कोई प्राचीन धुन...इतनी पुरानी जितना इश्क था...इतनी पुरानी जितना कि वो वक़्त जब कि कैस की जिन्दा आँखों में उसकी मुहब्बत के किस्से हुआ करते थे. मगर रेगिस्तान बहुत बेरहम था...उसकी दलदली बालू में लड़की के सारे ख़त गुम जाया करते थे. मगर लड़की गंगा के देश की थी...उसने दलदल नहीं जानी थी. उसके लिए डूबना सिर्फ गंगा में डूबना होता था...जिसमें कि यादों को मिटा देने की अद्भुत क्षमता थी. 

वो भी ऐसी ही एक रात थी. कैलेण्डर में दर्ज हुयी रातों से मुख्तलिफ. वो किस्से कहानियों की रात थी...वो किस्से कहानियों सी रात थी. लड़की को याद आता आता सा एक लम्हा मिला कि जिसमें उसके नीले रंग की पगड़ी से खुशबू आ रही थी. उसने अपनी उँगलियों में उसके साफे का वो जरा सा टुकड़ा चखा था, रेशम. उसके बदन से उजास फूटती थी. जरा जरा चांदी के रंग की. कैस किम्वदंती था. लड़की को उसके होने का कोई यकीन नहीं था इसलिए उसकी सारी बातों पर ऐतबार किया उसने. यूँ भी ख्वाब में तो इंसान को हर किस्म की आज़ादी हुआ करती है. लड़की कैस के हाथों को छूना चाहती थी...मगर कैस था कि रेत का काला जादू...अँधेरी रात का गुमशुदा जिन्न...फिसलता यूँ था कि जैसे पहली बार किसी ने भरा हो आलिंगन में. 

वे आसमान को ताकते हुए लेटे हुए थे. अनगिनत तारों के साथ. आधे चाँद की रात थी. आकाशगंगा एक उदास नदी की तरह धीमे धीमे अपने अक्ष पर घूम रही थी. लड़की उस नदी में अपना दुपट्टा गीला कर कैस की आँखों पर रखना चाहती थी. ठंढी आँखें. कैस की ठंढी आँखें. दुपट्टे में ज़ज्ब हो जाता उसकी आँखों का रंग जरा सा. बारीक सी हवा चलती थी...कैसे के चेहरे को छूती हुयी लड़की के गालों पर भंवर रचने लगती.

लड़की की नींद खुलती तो सूरज चढ़ आया होता उसके माथे के बीचो बीच और रेत एक जलते हुए जंगल में तब्दील हो जाया करती. तीखी धूप में छील दिया करती रात का सारा जादू. उसकी उँगलियों से उड़ा ले जाती स्पर्श का छलावा भी. आँखों में बुझा देती उसे एक बार देखने के ख्वाहिश को भी. दुपहर की रेत हुआ करती नफरतों से ज्यादा चमकदार. लड़की की पूरी पलटन सब भूल कर वापस लग जाती खुदाई के कार्य में. उस लुटे हुए पुराने शहर में बरामद होता एक ही कंकाल...गड्ढों सी धंसी आँखों से कभी नहीं पता चल पाता कि क्या था उसकी आँखों का रंग. उसका नीला रेशम का साफा इतना नाज़ुक होता जैसे कि लड़की का दिल...छूने से बदलता जाता रेत में. ऐसे ही गुम क्यों न हो जाती कैस की याद? 

उसे भूलना नामुमकिन हुआ करता. लड़की रातों रात दुहराती रहती एक ही वाक्य 'वो सच नहीं था...वो सच नहीं था'. वो भुलावा था. छल था. मायावी थी. तिलिस्मी. लड़की की कहानियों का किरदार.  

कैस...उफ़ कैस...कि कैस कोई किरदार नहीं था...प्रेम को दिया हुआ एक नाम था बस. एक अभिमंत्रित नाम कि जिसके उच्चारण से जिन्दा हो उठता था प्रेम...किसी के भी दिल में... 

फिर वो लड़की मीरा की तरह कृष्ण कृष्ण पुकारे या कि मेरी तरह तुम्हारा नाम.

15 October, 2014

पतिता

एक रोज़ उदात्त हो कर
तुम माफ़ कर देना चाहोगे मेरे सारे गुनाह
खोल दोगे दरवाज़ा
कि मैं वापस दाखिल हो सकूँ तुम्हारी जिंदगी में
चाहोगे कि फिर से घर की क्यारियों में रोप दूं
इश्क के नन्हे बिरवे
फसल पके, तैयार हो और हम पहले की तरह बैठे डाइनिंग टेबल पर
रेड वाइन पीते हुए तुम कहो कि मेरी आँखें खुदा की आँखों जैसी हैं
कि मेरी खुशबू से उठता है एक पाकीज़ा अहसास तुम्हारे जिस्म में
कि तुम मुझे छूने से ज्यादा मेरी इबादत करना चाहते हो

उस रोज़
मैंने क़ुबूल लिए होंगे अपने सारे अपराध
कर दिए होंगे सरकारी दस्तावेज़ पर दस्तखत
जब मैं नाम गिनाउंगी तुम्हारी पुरानी प्रेमिकाओं के
जज हत्याओं को कहेगा 'क्राइम ऑफ़ पैशन'
और मुझपर रियायत बरतते हुए कम कर देगा मेरी सजा
सिर्फ इक्यासी सालों तक की उम्रकैद बनिस्पत मृत्युदंड के

मुझे तब भी न आएगा प्रायश्चित का सलीका
मैं तब भी सीखूंगी काला जादू
और दु:स्वप्नों में नोच लूंगी उनकी नीली आँखें
रचती रहूंगी उनके नाम से अभिशप्त, आत्मघाती किरदार
कि जब तक ये उनके जीवन का सच नहीं हो जाता

मगर इतने में भी अगर नहीं मिलेगा सुकून
तो मैं शैतान के पास बेच आउंगी अपनी रूह
कर लूंगी चित्रगुप्त के साथ कोई अवैध करार
और उनके नाम लिखवा दूँगी प्रताड़नायें
और एक बेहद लम्बी उम्र

तुमसे आखिरी बार मिलने के रोज़
बताते हुए कि कितना गहरा है इश्क
चूल्हे पर रखते हुए तुम्हारे पसंद की चाय
रिसने दूँगी बहुत सारी ज्वलनशील गैस
तुमसे कहूँगी मेरे लिए जला दो एक सिगरेट
धमाके से लगेगी आग
कि जिसमें तुम्हारे साथ जल मरूंगी
बिल्कुल किसी सती स्त्री की तरह.

उस लड़की की डायरी

कुछ है. सीने में अटका हुआ.
कुछ. बाकी रह जाता है, मेरे सब कुछ लिखने के बाद भी.
कुछ. मैं कहना चाहती हूँ मगर बहुत सारी बातें कहने के बाद भी कह नहीं पाती.

मैं अपनेआप को एक्सेप्ट नहीं कर पा रही जैसी मैं हूँ...और मुझे जैसे बदलाव चाहिए उनके लिए मैं कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही. जैसे कि साधारण सी बात है कि वजन ५८ हो रखा है. मैं इसमें से सिर्फ ८ किलो लूज कर लूं तो मुझे मन की शांति मिल जायेगी. टेक्निकली मैं किसी भी जिम में जाउंगी तो इंस्ट्रक्टर कहेगी कि एक महीने में २ किलो के हिसाब से ये बस चार महीने की बात है. मैं सुनूंगी, समझूँगी...मगर कर नहीं पाऊँगी. आजकल अपने वेट को लेकर बहुत ज्यादा कौन्सियस हो गयी हूँ. खूबसूरती सिर्फ वजन पर डिपेंड नहीं करती. मैं अपनाप से कहना चाहती हूँ कि खुद की आँखों में देखना चाहिए...यहाँ अब ही वैसी ही चमक मौजूद है...मुस्कराहट वैसी ही है...दोस्तों के साथ मैं वैसे ही हंसती खिलखिलाती हूँ...मगर इन सबके बावजूद एक और आँख उग गयी है मेरे अन्दर जो मुझे हमेशा ही क्रिटिकल दृष्टि से देखती रहती है और कहती रहती है कि मैं अच्छी नहीं लग रही...कि ड्रेस मुझ पर नहीं फब रही.

मैं मानसिक रूप से बीमार होती जा रही हूँ...ये जरा सा वजन जैसे मेरे दिमाग पर रखा हुआ है या जैसे मेरे सीने पर...हर समय बदहवासी सी लगती है. ऐसा नहीं है कि मैं प्रयास नहीं करती. जॉगिंग शुरू की थी तो कुछ दिनों में घुटने में दर्द होने लगा. मुझे अपाहिज हो जाने से सबसे ज्यादा डर लगता है. घर में नानी के घुटने ख़राब हो गए थे और दोनों को रिप्लेस करना पड़ा था. तब से मैं अपने घुटनों को लेकर बहुत जायदा हैरान और परेशान रहती हूँ.

स्विमिंग का कब से प्लान बना रखा है. घर के पास ही स्विमिंग पूल है. सुबह के टाइम पर ही वहां पर क्लासेज होती हैं. मैं जानती हूँ कि अगर मैंने ज्वाइन कर लिया तो मैं नियमित जाउंगी भी. मुझे तैरना अच्छा लगता है. अब मैं पानी में डूबती भी नहीं. अपने से मेहनत कर के मैंने फ्लोटिंग सीख ली है. मगर मैं रोज़ सिर्फ सोचती हूँ कि जाउंगी और जा नहीं पाती. मैं अपनी नज़र में अजीब किस्म की ख़राब दिखने लगी हूँ. चेहरा...माथा...आंखें सब. और मैं महसूस करती हूँ कि बीमार होने के लिए कोई वजह हो जरूरी नहीं...हम कभी कभी माँग कर ऐसी कोई बीमारी बुला लेते हैं. इस टेंशन के कारण मुझे खाना खाने से अरूचि हो गयी है. मैं अक्सर रात का डिनर स्किप कर देती हूँ. सुबह का नाश्ता समय पर खाती हूँ पर उसके अलावा खाना खाने में अजब सी गिल्ट फीलिंग होती है.

कल उससे बात कर रही थी तो वो बोल रहा था मैं सोचती बहुत ज्यादा हूँ. मैं भी जानती हूँ कि मैं ओवर अनलाईज करती हूँ चीज़ों को. मगर मैं किसकी आँखों से देखूं खुद को और सोचूं कि मैं अच्छी दिखती हूँ. और अच्छा दिखना कब से मेरे लिए इतना महत्वपूर्ण हो गया. पहले ऐसा नहीं था क्यूंकि पहले वाकई सोचना नहीं पड़ता था. ऐसा कोई परिधान नहीं था जो मुझपर अच्छा नहीं लगता था. मैं ढीली ढाली टीशर्ट और डेनिम पहन लेती थी तो अच्छा लगता था...कुरता जींस हो या कि सलवार सूट....साड़ी पहनते हुए तो कभी सोचना ही नहीं पड़ा. ये कैसी अजीब बेईमानी है कि भागती हुयी इस कीमती जिंदगी का इतना सारा हिस्सा ये सोचने में लगाया जाए कि मैं क्या पहनूं कि मोटी ना लगूं. मैं ऐसी नहीं हुआ करती थी. आजकल मुझे साड़ी पहनने में भी टेंशन होती है. लोग कहते हैं कि ये सारा फितूर मेरे दिमाग का है...मैं अच्छी लगती हूँ...मगर मुझे फिर लगता है कि वो मुझसे बहुत प्यार करते हैं और मेरा दिल रखने के लिए ऐसा कह रहे हैं.

मैं ऐसी नहीं थी. मैं चीज़ों को लेकर इतना सोच सोच के अपना दिमाग खराब नहीं करती थी. मुझे अगर कोई प्रॉब्लम होती थी तो मैं उसका सलूशन खोजती थी...सोच सोच के उसपर वक्त बर्बाद नहीं करती थी. तो मुझे क्या होता जा रहा है? आइडियल कंडीशन में...जॉब छोड़े हुए ५ महीने हो गए हैं...मैंने इतने में जिम या स्विमिंग ज्वाइन करके खुश रह सकती थी कि मैंने कोशिश की. मगर नहीं. उफ़. मैं पागल हुए जा रही हूँ. 

01 October, 2014

बर्बादियों के ब्लूप्रिंट


एन्टीक की एक दूकान है...जहाँ सब कुछ सेकेंड हैण्ड मिलता है...बेशकीमत और ठुकराया हुआ. कोने की दीवार पर लगा हुआ है एक पुराना आइना जिसके सोने की किनारी में लगी हुयी है जरा सी ठेस. जैसे उसने ब्रेक अप के दिन तोड़ना चाहा था अपना दिल...न सही अपनी आँखों में दिखता उस लड़के का अक्स...मगर ये सब तोड़ना कहाँ आता था मासूम लड़की को. उसने मोबाईल फेंका था आईने की ओर और उससे जरा सा टूट गया था फ्रेम. बस. मगर उस आईने को कभी मत लाना अपने घर. वो आइना सच पढ़ लेता है. उसमें हमेशा दिखेगा उस लड़की का पुराना प्रेमी. या कि फिर तुम्हारे प्रेमी की अनन्य प्रेमिकाएं. उस आईने को देखते हुए पागल हो जाओगी तुम. आखिर तोड़ डालोगी उसे और टूटे आईने के टुकड़ों से काट लोगी अपनी कलाई...इतना खून बहेगा कि जिसमें लिखी जा सकती होंगी उस खोये हुए प्रेमी को लौटा लेने लायक चिट्ठियां...मगर उसके लौट आने के पहले तुम जा चुकी होगी कभी न आने के लिए.

वहाँ रखी होगी एक पुरानी ऐशट्रे. ऐसी जैसे तुमने कभी देखी न हो. एक नन्ही सी संदूकची जैसे. हाँ वैसी ही जैसे तुमने ख़त सहेजने के लिए खरीदी थी कभी. धुंआ इतना घना होगा कि कुछ दिखेगा नहीं...सलेटी धुएं के गुच्छे तुम्हारी पलकों के सामने घूमने लगेंगे...दादरा की ताल पर ठुमकते. लोहे की बनी उस ऐश ट्रे को छूना आँखें बंद कर के...उँगलियों के पोरों से...किनारी पर उभरे होंगे उसके नाम के दो अक्षर. उन्हें महसूस करना...अन्धकार में उभरेगा उस लड़की का सियाह कन्धा...जिसपर होगा गहरा काला टैटू...इर्द गिर्द की त्वचा सूजी हुयी होगी. खून के रुके हुए रंग में लिखा होगा...लव इज टेम्पररी, स्कार्स लास्ट फॉरएवर.

एक मेज़ होगी न वहां. प्रेम करने की मेज़. उस मेज़ का विस्तार इतना असीम होगा जैसे उसकी बाँहें. तुम धोखे में पड़ जाओ कि मेज़ है या पलंग. इस सिरे से उस सिरे तक उस गोल मेज़ में कोई कोना नहीं दिखेगा तुम्हें. ऐसा झूठा जैसे उसका प्रेम. तुम्हारी सोच के साथ खिलवाड़ करता. अपनी जमीने हकीकत को सिद्ध करने के लिए तुम्हें तोहफे में दिया करता बोन्साई बरगद. गहरे लाल रंग के गमले में. टेबल होगी शुद्ध महोगनी की. लकड़ी से आएगी रूदन की आवाज़. खरोंचों में ठहरे रह गए होंगे नेलपेंट के कतरे. नीले. गहरे नीले. उसकी आँखों जैसे. तुम जान जाओगी कि सिर्फ ताबूत की लकड़ी से बनी हो सकती है ऐसी मेज़. फिर भी तुम चाहोगी कि मरने के बाद तुम्हारी ममी बनायी जाए और इसी टेबल पर लिटा दिया जाए तुम्हें. क़यामत तक के लिए.

माफ़ करना, मैं तुम्हें भटकाना नहीं चाहती...मगर सुनो न...ऐसी ही किसी दुकान से उठा लाना कोई सेकंड हैण्ड प्रेमी,

उसे बना के रखना बंधक मेज़ की किसी अँधेरी दराज़ में...कहानी के किसी अधूरे चैप्टर में...उसे सिखाना चारागरी...कि अगली बार जब दिल टूटेगा तो उसे आएगा रफ्फू करना...उसे आएगा टाँके डालना...तुम्हारी दरारों में वो लगाएगा क्यारियां...उनमें खिलेंगे पीले सूरजमुखी...तुम्हारी उदासियों पर रखेगा कर्ट कोबेन की आवाज़ का मरहम...तुम्हारी मृत्यु पर तुम्हारे माथे पर रख सकेगा एक संजीवनी बोसा.

30 September, 2014

अभिशप्त हृदया


पूर्ण अंधकार का एक क्षण. सूरज की आखिरी किरण के जाने के बहुत देर बाद और चन्द्रमा के अनुपस्थित होने का कोई दिन. अंगदेश की नगरवधू का प्रांगन. चौखट के पास संध्या बाती करती हुयी तिलोत्तमा. अन्धकार में कोमलता से प्रज्वलित होती उसकी कमनीय आँखें. याचक की मुद्रा में बैठी अंगदेश की महारानी मणिकर्णिका.
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"तिलोत्तमा...क्या तुम्हें ज्ञात है कि तुम्हारे सौंदर्य से मोहित होकर आर्य अपने राजधर्म की उपेक्षा कर रहे हैं. निकट के राज्यों से उपद्रव की घटनाएं सामने आ रही हैं...और अगर ऐसा ही चलता रहा तो राज्य का सर्वनाश निश्चित है. क्या प्रजा के प्रति तुम्हारी कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है? तुम नगरवधू हो..." 

"क्षमा करें महारानी, नगरवधू होने के कारण मेरा अधिकार है कि मैं अपना प्रेमी चुन सकूं...इस आचरण से राज्य का कोई विनाश होता मुझे नहीं दिखता." 

"नहीं दिखता क्यूंकि वासना में तुम्हारी आँखें बंद हो गयी हैं तिलोत्तमा...और तुम्हारे साथ आर्य की भी...क्या इस शरीर से ऊपर तुम्हें कुछ नहीं दिखता?" 

"महारानी, आपसे एक ही विनती है, इस शरीर की कीमत को कम मत आंकिये...इसके कण कण में चरम बिंदु तक पहुँचने और पहुंचाने की क्षमता है...इस शरीर की लोच के लिए बचपन से मैंने कई कठिन आसनों को साधा है...गले की मिठास के लिए गुरुओं से दीक्षा ली है...ये अंगदेश की नगरवधू का शरीर है...बदन की लोच ही नहीं, वाणी की मिठास भी कठिन साधना का परिणाम है" 

"इस राज्य को तुम्हारी आवश्यकता नहीं है...मैं तुम्हें आदेश देती हूँ कि तुम इसी पहर राज्य की सीमा से बाहर निकल जाओ. अगर तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया तो तुम्हें काल कोठरी में डाल दिया जाएगा" 

"क्षमा महारानी, मगर मैं आपकी आज्ञा का पालन नहीं कर सकती. मैंने राज्य के उत्सर्ग के लिए वचन दिया था कि जब तक मेरे शरीर से सुख का एक कतरा निचोड़ लेने लायक प्राण बाकी हैं, मैं इस भूमि को नहीं त्यागूंगी. आप जिसे अनावश्यकता कहती हैं, वो ही मेरे जीवन का उद्देश्य है. इस सुख को चरम सुख कहते हैं क्यूंकि इस सुख के सामने बाकी सारे सुख छोटे हैं...मेरे लिए ये सबसे बड़ा यज्ञ है जिसमें स्वयं की आहुति देनी होती है...पूर्णाहुति. 

"क्यूँ...आज तक इस शरीर को खो कर क्या पाया है तुमने?"
 
"महारानी...इस शरीर के बदले मैंने वो पाया है जो सिन्दूर की गहरी रेखा में भी नहीं बंध सका...आपकी हर बेड़ी से मुक्त...और मेरी हर इच्छा का बंदी...महारानी...मैंने इस शरीर को खो कर वो पाया है जो अतुल्य और अमूल्य है...वो निधि आपकी ही थी...आपने आत्मा का समर्पण किया मगर शरीर का नहीं...मैंने इस शरीर के मोल में सिर्फ एक ही चीज़ पायी है...
ह्रदय...सम्राट का ह्रदय."

"मैं तुमसे यहाँ सम्राट के ह्रदय की याचना करने नहीं आई हूँ. मुझे उनका शरीर चाहिए. राज्य के सिंहासन पर उनकी उपस्थिति चाहिए. भले ही वो रात्रि के सारे पहर तुम्हारे प्रांगन का रसस्वादन करते रहें मगर दिन के तीन प्रहर वे प्रजा के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करें, तुमसे इतनी ही प्रार्थना करनी है मुझे." 

"इसका मोल आप क्या दे सकती हैं महारानी?" 

"ओह, तुम इतनी क्षुद्रहृदय होगी मुझे आशंका नहीं थी...बोलो...कितनी स्वर्ण मुद्राएं चाहिए तुम्हें?" 

"आप फिर से मेरा मोल कम आंक रही हैं महारानी...पुरुष समर्पण नहीं जानता...उसके समर्पण में भी अहंकार होता है...मुझे एक स्त्री का समर्पण चाहिए...शरीर के बदले शरीर" 

"अर्थात?" 

"जितनी देर महाराज राज्य के कार्य में उपस्थित रहेंगे, आप मेरे प्रांगन में रहेंगी...मुझे आपका शरीर चाहिए. आपका पूर्ण समर्पण चाहिए. कहिये. दे सकेंगी?"
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और इस तरह महारानी ने अपना शरीर देकर राज्य के उत्सर्ग के लिए महाराज का ह्रदय मोल लिया. किसी भी शिलालेख में उनके इस त्याग का उल्लेख नहीं मिलता मगर आज भी अंगदेश की स्त्रियाँ सुहाग के लोकगीतों में उनके त्याग के चर्चे करती हैं. दुल्हन के श्रृंगार में गालियाँ पढ़ती हैं कि कोई तिलोत्तमा उनके पुरुष के जीवन में कभी प्रवेश न करे.

22 September, 2014

यस्टरडे, आइ लव्ड यू फौरएवर


तुमने सिगरेट छोड़ दी. मैंने शुरू कर दी. दुनिया में बैलेंस बरक़रार हो गया फिर से. तुम भी न. कैसी कैसी चीज़ें करते हो. अब जैसे देखो तुम किसी रोड ट्रिप पर निकल जाओगे और मैं कहीं खाली जमीन का प्लाट लेकर उसपर अपने सपनों के ब्लूप्रिंट खड़े कर दूँगी. तुम जिस दिन पब्लिक स्पीकिंग के क्लासेज ज्वाइन करोगे, मैं मौन व्रत रख लूंगी. दुनिया ऐसे ही हिसाब से चलती है मेरी जान. हम एक फल्क्रम के दो छोरों पर झूलते रहते हैं जरा जरा सा. खुदा नाराज़ हो जाएगा अगर हम करीब आने लगे...यु सी, दुनिया का बैलेंस हमारे छोटे छोटे कारनामों से बिगड़ सकता है. 

अच्छा ये बताओ, पिछली बार जब तुम प्लूटो पर गये थे तो उसे बताया कि गुलज़ार ने उसके नाम से एक किताब लिखी है? नहीं क्या? उफ्फोह...तुम इतने भुलक्कड़ कबसे होने लगे. देखो जरा शर्ट की बायीं जेब में, एक पुर्जी रखी होगी जिसमें बड़े बड़े अक्षरों में लिखा है कि प्लूटो को कौन सा मेसेज देना है. अब दुबारा जाने में तो एक उम्र निकल जायेगी. तुम यूँ ही सारे प्लैनेट्स की घुमक्कड़ी करते रहे तो मेरे पास घर लौट कर कब आओगे? तुम्हें मालूम है न मेरा मूड ख़राब होता है तो चाँद बौराने लगता है. ज्वार भाटा में जाने कितने गाँव बह जायेंगे. मछुआरे लौट कर किनारे नहीं आ पायेंगे. तुमसे एक काम ढंग से नहीं होता है. बिचारा प्लूटो. कितना उदास है. कोई उसका दुःख बाँटने नहीं जाता.

चलो, जाने दो. वो जो जुपिटर का छल्ला मैंने मंगवाया था, वो जरा निकाल के दो, जा के मेटलर्जी डिपार्टमेंट को दे आऊँ. उससे एक नथ बनवानी है. शिवांगी भी न, एकदम पागल है. जुपिटर के छल्लों की नथ पहनेगी! ऐसे दोस्तों के कारण मेरी जान जायेगी किसी दिन. मान लो कोई तरह की पोइजनिंग हो गयी तो? वो तो अच्छा हुआ कि मेटलर्जी में मेरा एक एक्स बॉयफ्रेंड काम करता है. उसे मेरे ऐसे बेसिरपैर की गुजारिशों की आदत है. हफ्ते भर में टेस्टिंग हो जायेगी. सब ठीक रहा तो शादी के हफ्ता भर पहले नथ रेडी हो कर आ भी जायेगी. मैंने वी को स्टारडस्ट के लिए बोल दिया था. वो तुम्हारे स्पेसशिप की सफाई के बाद के पानी को फ़िल्टर कर लेगा. एक नथ के लायक स्टारडस्ट मिल जायेगी उसमें से. तुम अब नखरे मत करो. उसने स्पेसशिप क्लीनिंग पर अनगिनत किताबें पढ़ रखी हैं. मैं किसी इंडस्ट्रियल जगह भेजूंगी तो मुझे स्टारडस्ट कलेक्ट नहीं करने देंगे. फिर शिवांगी का रोना धोना कौन मैनेज करगा? तुमसे हो पायेगा तो बोल दो. वैसे भी स्पेसशिप पुराना हो गया है. जरा टूट ही गया तो ऐसी कौन सी मुसीबत आ जायेगी. 

आजकल तुम्हारी आँखों में सूरजमुखी नहीं खिलते. आजकल मेरी आँखों में अमावस नहीं उगती. बैलेंस. यू सी. पिछली बार तुम मेरे शहर आये थे तो बर्फ पड़ रही थी. तुमने मुझे आइस स्केटिंग सिखाई थी. मैं अब भी आईने पर भाप देखती हूँ तो तुम्हारी साँसों की गर्मी महसूस होती है. तुम्हारी धड़कनों का गैर सिलसिलेवार ढंग से मेरा नाम पुकारना याद आता है. याद के शहर में कोई बैलेंस नहीं रहता. तुम बेतरह याद आते हो. बहुत सी सिगरेट पीने के कारण जुबां का जायका चला गया है. एक एडिक्शन के कारण दूसरे से उबर गयी हूँ. आजकल चोकलेट नहीं खाती हूँ. विस्की को लेकर कितनी जिद्दी हुआ करती थी याद है, जेडी के अलावा कुछ अच्छा नहीं लगता था. आजकल कोई सी भी विस्की चल जाती है. जिससे भी तुम्हारी याद के मौसम जरा कम दर्द पहुचाएं. जरा सी नंबनेस चाहती हूँ. दिल के ठीक पास. जहाँ तुम्हारी मुस्कान अटकी हुयी है. डॉक्टर कहते हैं वाल्व में कचरा अटका हुआ है...कोलेस्ट्रोल...मैं मुस्कुराती हूँ. तुम फिजिकली प्रेजेंट होते हो. वहां भी जहाँ तुम्हारे होने का कोई अंदेशा नहीं होता.

तुमने अपनी जिंदगी में बहुत से नए दोस्त बना लिए. मैंने अपनी जिंदगी से बहुत से बेफालतू लोग उठा कर फ़ेंक दिए. दूर के एक गृह पर मैंने एक स्टूडियो अपार्टमेंट बुक कर लिया. तुम मेटालिका सुनने लगे और मैं संतूर सीखने लगी. हम एक दूसरे के बिलकुल विपरीत होते चले गए. अबकी बार मिलोगे तो देखना. तुम बिलकुल सड़क पर चलते किसी आम साइंटिस्ट की तरह साधारण दिखोगे...मैं विरह की दीप्ति में निखर कर बिलकुल असाधारण दिखूंगी. तुम मुझे पहचान लोगे. मैं तुम्हें अनदेखा कर दूँगी.

तुम्हें मुझसे प्यार हो जाएगा. मैं तुम्हें भूल जाउंगी.
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PS: तुम मुझे देख कर मुस्कुराओगे...बस...सारा बैलेंस वापस से गड़बड़ा जाएगा. 

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