19 May, 2015

इक रोज़ उसी बेपरवाही से क़त्ल किया जाएगा हमें | जिस बेपरवाही से हमने जिंदगी जी है


इस कविता को बहुत दिन पहले फेसबुक पर लिखा था. कल रात इसकी अचानक तलब लगी. कोई एक टुकड़ा था जो याद में चुभ गया था. यहाँ के बुरे इन्टरनेट कनेक्शन में इसे तलाशना भी मुश्किल था. फिर सोच रही थी कि हमें टूटी फूटी चीज़ें अक्सरहां ज्यादा पसंद आती हैं. के मुझे साबुत चीज़ों को तोड़ देने का और टूटी चीज़ों को जोड़ देने का शौक़ है. जाने क्या सोचते हुए परख रही थी उसका दिल. देख रही थी कि कितनी खरोंचें लगी हैं इस पर. फिर अपने दिल को देखा तो लगा कि है इसी काबिल के इसे तोड़ दिया जाए.
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इन्हीं आँखों से क़त्ल किया जाएगा हमें 
और भीगी रात के कफ़न में लपेट कर
दफना दिया जाएगा
किसी की न महसूस होती धड़कनों में

कोई चुप्पी बांधेगी हमारे हाथ
और विस्मृति की बेड़ियों में रहेंगे वो सारे नाम
जिनकी मुहब्बत
हमें लड़ने का हौसला दे सकती थी 

इन्साफ के तराजू में
हमारे गुनाहों का पलड़ा भारी पड़ेगा
सबकी दुआओं पर
और तुम्हारी माफ़ी पर भी 

हमारे लिए बंद किये जायेंगे दिल्ली के दरवाजे
देवघर के मंदिर का गर्भगृह
और सियाही की दुकानें

बहा दिया जाएगा जिस्म से
खून का हर कतरा
तुम्हारी तीखी कलम की निब से काट कर हमारी धमनी

हमें पूरी तरह से मिटाने को
बदल दिए जायेंगे तुम्हारी कहानियों के किरदारों के नाम
तुम्हारी कविताओं से हटा दी जाएँगी मात्रा की गलतियाँ
और तुम्हारे उच्चारण से 'ग' में लगता नुक्ता

इक रोज़
उसी बेपरवाही से क़त्ल किया जाएगा हमें
जिस बेपरवाही से हमने जिंदगी जी है

16 May, 2015

#सौतनचिठियाँ- Either both of us do not exist. Or both of us do.


***
उस इन्द्रधनुष के दो सिरे हैं. एक मैं. एक तुम.
Either both of us do not exist. Or both of us do.
***

मालूम. मैं किसी स्नाइपर की तरह ताक में बैठी रहती हूँ. तुम दुश्मन का खेमा हो. ऐसा दुश्मन जिससे इश्क है मुझे. इक तुम्हारे होने से वो उस बर्बाद इमारत को घर कहता है. मेरी बन्दूक के आगे इक छोटी सी दूरबीन है. मैं दिन भर इसमें एक आँख घुसाए तुम्हारी गतिविधियाँ निहारते रहती हूँ. तुम्हारी खिड़की पर टंगी हुयी है इक छोटी सी अनगढ़ घंटी. मैं उसे देखती हूँ तो मुझे उसकी आवाज़ सुनाई पड़ती है. जैसे मैं तुम्हें देखती हूँ तो तुम्हारी धड़कन मेरी उँगलियों में चुभती है. कुछ यूँ कि मैं ट्रिगर दबा नहीं पाती. के ये दिन भर तुम्हें देखने का काम तुम्हारा खून करने के लिए करना था. मगर मुझे इश्क़ है उसे छूने वाली हर इक शय से. तुमसे इश्क़ न हो. नामुमकिन था.

के तुम पढ़ती हो उसकी कवितायें उसकी आवाज़ में...तुमने सुना है उसे इतने करीब से जितना करीब होता है इश्वर सुबह की पहली प्रार्थना के समय...जब कि जुड़े हाथों में नहीं उगती है किसी के नाम की रेख. तुम जानती हो उसकी साँसों का उतार चढ़ाव...तुमने तेज़ी से चढ़ी है उसके साथ अनगिनत सीढियाँ. तुम उसके उठान का दर्प हो. उसकी तेज़ होती साँसों को तुमने एक घूँट पानी से दिया है ठहराव. तुमने अपने सतरंगी दुपट्टे से पोंछा है उसके माथे पर आया पसीना. मुझे याद आती है तुम्हारी जब भी होती हैं मेरे शहर में बारिशें और पीछे पहाड़ी पर निकलता है इक उदास इन्द्रधनुष.

मालूम. नदियाँ यूँ तो समंदर में मिलती हैं जा कर. मगर कभी कभी हाई टाइड के समय जब समंदर उफान पर होता है...कभी कभी कुछ नदियों की धार उलट जाती है. समंदर का पानी दौड़ कर पहुँच जाना चाहता है पहाड़ के उस मीठे लम्हे तक जहाँ पहली लहर का जन्म हुआ था. उसकी टाइमलाइन पर हर लम्हा तुम्हारा है. बस किसी एक लम्हे जैसे सब कुछ हो रहा था ठीक उलट. धरती अपने अक्षांश पर एक डिग्री एंटी क्लॉकवाइज घूम गयी. सूरज एक लम्हे को जरा सा पीछे हुआ था. उस एक लम्हे उसने देखा था मुझे...इक धीमे गुज़रते लम्हे...कि जब सब कुछ वैसा नहीं था जैसा होना चाहिए. उस लम्हे उसे तुमसे प्यार नहीं था. मुझसे प्यार था. बाद में मैंने जाना कि इसे anomaly कहते हैं. अनियमितता. इस दुनिया की हर तमीजदार चीज़ में जरा सी अनोमली रहती है. मैं बस इक टूटा सा लम्हा हूँ. उलटफेर. मगर मेरा होना भी उतना ही सच है जितना ये तथ्य कि वो ताउम्र. हर लम्हा तुम्हारा है.

यूँ तो मैं इक लम्हे के लिए ताउम्र जी सकती हूँ मगर इस तकलीफ का कोई हल मुझे नज़र नहीं आता. शायद मुझे ये ख़त नहीं लिखने चाहिए. मैं उम्मीद करती हूँ कि ये चिट्ठियां तुम तक कभी नहीं पहुंचेंगी. आज सुबह मैंने वो लम्बी नली वाली बन्दूक वापस कर दी और इक छोटी सी रिवोल्वर का कॉन्ट्रैक्ट ले लिया है. मैंने उन्हें बताया कि मैं तुम दोनों में से किसी को दूर से नहीं शूट कर सकती. वे समझते हैं मुझे. वे उदार लोग हैं. कल पूरी रात मैं बारिश में भीगती रही हूँ. आज सुबह विस्की के क्रिस्टल वाले ग्लास में मुझे तुम दोनों की हंसी नज़र आ रही थी. खुदा तुम्हारे इश्क़ को बुरी नज़र से बचाए. सामने आईने में मेरी आँखें अब भी दिखती हैं. नशा सर चढ़ रहा है.

मैंने कनपटी पर बन्दूक रखते हुए आखिरी आवाज़ उसकी ही सुनी है. 'आई टोल्ड यू. लव कुड किल. नाउ. शूट'. 

08 May, 2015

आमंत्रण: 9 मई को मेरी किताब तीन रोज़ इश्क़ का लोकार्पण IWPC, दिल्ली में.

किताब एक सपना है. एक भोला. मीठा सपना. बचपन के दिनों में खुली आँखों से देखा गया. ठीक उसी दिन दिन जिस पहली बार किसी किताब के जादू से रूबरू होते हैं उसी दिन सपने का बीज कहीं रोपा जाता है. किताब के पहले पन्ने पर अपना नाम लिखते हुए सोचना कि कभी, किसी दिन किसी किताब पर मेरा नाम यहाँ ऊपर टॉप राईट कार्नर पर नहीं, किताब के नाम के ठीक नीचे लिखा जाएगा.
बचपन के विकराल दिखने वाले दुखों में, एक सुख का लम्हा होता है जब किसी किताब में अपने किसी लम्हे का अक्स मिल जाता है. कि जैसे लेखक ने हमारे मन की बात कह दी है. हम वैसे लम्हों को टटोलते चलते हैं....वैसे लेखक, वैसी किताब और वैसे लोग बहुत पसंद आते है. फिर एक किसी दिन कक्षा सात में पढ़ते हुए हमारे हिंदी के सर बड़ी गंभीरता में हमें समझाते हैं कि डायरी लिखनी चाहिए. रोज डायरी लिखने से एक तो भाषा का अभ्यास बढ़ेगा और हम इससे जीवन को एक बेहतर और सुलझे हुए ढंग से जीने का तरीका भी सीखेंगे. बाकी क्लास का तो मालूम नहीं पर उसी दिन हम बहुत ख़ुशी ख़ुशी घर आये और डायरी लेखन का पहला पन्ना खोल के बैठ गए. अब पहली मुसीबत ये कि अगर सीधा सीधा कष्टों को लिख दिया जाए और घर में किसी ने, यानि मम्मी या भाई ने पढ़ ली तो या तो परेशान हो जायेंगे, या कुटाई हो जायेगी या के फिर भाई बहुत चिढ़ायेगा. तो उपाय ये कि अपने मन की बात लिखी जाए लेकिन कूट भाषा में. जैसे कि आज आसमान बहुत उदास था. आज सूरज को गुस्सा आया था. वगैरह वगैरह. लिखते हुए 'मैं' नहीं होता था, बस सारा कुछ और होता था. लिखने का पहला शुक्रिया इसलिए स्वर्गीय अमरनाथ सर को.

लिखने का सिलसिला स्कूल और कॉलेज के दिनों में जारी रहा. बहुत से अवार्ड्स वगैरह भी जीते. स्लोगन राइटिंग, डिबेट, एक्स्टेम्पोर...और इस सब के अलावा बतकही तो खैर चलती ही थी. उन दिनों कविता लिखते थे. जिंदगी का सबसे बड़ा शौक़ था कादम्बिनी के नए लेखक में छप जाना. इस हेतु लेकिन न तो कोई कविता भेजी कभी, न कभी तबियत से सोचा कि कैसी कविता हो जो यहाँ छप जाए. पढ़ने-सुनने वाले लोग बहुत ही दुर्लभ थे. दोस्तों को कुर्सी से बाँध कर कविता सुनाने लायक दिन भी आये. उन दिनों हम बहुत ही रद्दी लिखा करते थे. माँ अलग गुस्सा होती थी कि ये सब कॉपी के पीछे क्या सब कचरा लिखे रहता है तुम्हारा. उन दिनों भले घरों की लड़कियों की कॉपी के आखिरी पन्ने पर इश्क मुहब्बत शायरी जैसी ठंढी आहें भरना अच्छी बात तो थी नहीं. देवघर ने हमारी मासूमियत को बरकरार रखा तो पटना ने हमें आज़ाद ख्याल होना सिखाया. मेरी जिंदगी में जिन लोगों का सबसे ज्यादा असर पड़ता है, उसमें सबसे ऊपर हैं पटना वीमेंस कोलेज के कम्यूनिकेटिव इंग्लिश विद मीडिया स्टडीज(CEMS) के हमारे प्रोफेसर फ्रैंक कृष्णर. सर ने हमारी पूरी क्लास को सिखाया कि सोचते हुए बंधन नहीं बांधे जाने चाहिए...कि दुनिया में कुछ भी गलत सही नहीं होता...हमें चीज़ों के प्रति अपनी राय सारे पक्षों को सुन कर बनानी चाहिए. दूसरी चीज़ जो मैंने सर से सीखी...वो था गलतियां करने का साहस. टूटे फूटे होने का साहस. कि जिंदगी बचा कर, सहेज कर, सम्हाल कर रख ली जाने वाली चीज़ नहीं है...खुद को पूरी तरह जीने का मौका देना चाहिए. 

IIMC दिल्ली में चयन होना मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा मील का पत्थर था. इंस्टिट्यूट में पढ़ा लिखा उतना नहीं जितना आत्मविश्वास में बढ़ावा मिला कि देश के सबसे अच्छे मास कम्युनिकेशन के इंस्टिट्यूट में पढ़ रहे हैं. हममें कुछ बात तो होगी. ब्लॉग के बारे में पटना में पढ़ा था, लेकिन यहाँ और डिटेल में जाना. कि ब्लॉग वेब-लॉग का abbreviation है. दुनिया भर में लोग अपनी डायरी खुले इन्टरनेट पर लिख रहे थे. बस. वहीं कम्प्यूटर लैब में हमने अपना पहला ब्लॉग खोला. 'अहसास' नाम से. ये २००५ की बात है. ब्लॉग पर पहला कमेन्ट मनीष का आया था. मुझे हमेशा याद रहता. फिर ब्लॉग्गिंग के सफ़र में अनगिनत चेहरे साथ जुड़ते गए. उन दिनों मैं अधिकतर डायरीनुमा कुछ पोस्ट्स और कवितायें लिखती थी. हिंदी ब्लॉग्गिंग तब एक छोटी सी दुनिया थी जहाँ सब एक दूसरे को जानते थे. उन दिनों स्टार होना यानी अनूप शुक्ल की चिट्ठा चर्चा में छप जाना. अनूप जी के सेन्स ऑफ़ ह्यूमर से इंस्पायर होकर हमने कुछ पोस्ट्स लिखी थीं, जैसे किस्सा अमीबा का, वगैरह. ब्लॉग एग्रेगेटर चिट्ठाजगत में नए लिखे सारे पोस्ट्स की जानकारी मिल जाती थी. इस आभासी दुनिया में कुछ सच के दोस्त मिले. उनके मिलने से न सिर्फ लिखने का दायरा बढ़ा बल्कि बाकी चीज़ों की समझ भी बेहतर हुयी. फिल्में और संगीत इनमें से प्रमुख है. अपूर्व शुक्ल की टिप्पणियां हमेशा ब्लॉगपोस्ट से बेहतर हो जाती थीं. नयी खिड़कियाँ खुलती थीं. नयी बातें शुरू होती थीं. अपूर्व के कारण मैंने दुबारा वोंग कार वाई को देखा. और बस डूब गयी. बात फिल्मों की हो या संगीत की. यूँ ही प्रमोद सिंह का ब्लॉग रहा है. वहां के पॉडकास्ट न सिर्फ दूर बैंगलोर में घर की याद की टीस को कम करते थे बल्कि उसमें इस्तेमाल किये संगीत को तलाशना एक कहानी हुआ करती थी. इसके अलावा इक दौर गूगल बज़ का था. इक क्लोज सर्किल में वहां सिर्फ पढ़ने, लिखने, फिल्मों और संगीत की बात होती थी. मैंने इन्टरनेट पर बहुत कुछ सीखा.

तुम्हें एक किताब छपवानी चाहिए ये बात लोगों ने स्नेहवश कही होगी कभी. मगर ये किताब छपवाने का कीड़ा तो शायद हर किताब प्रेमी को होता है. मेरी बकेट लिस्ट में एक आइटम ये भी था कि ३० की उम्र के पहले किताब छपवानी है. तो जैसे ही हम २९ के हुए, हमने सोचा अब छपवा लेते हैं. बैंगलोर में कोई भी हिंदी पब्लिशर नहीं मिला और ऑनलाइन खोजने पर किसी का ढंग का ईमेल पता नहीं मिला. उन दिनों सेल्फ-पब्लिशिंग नयी नयी शुरू हुयी थी और बहुत दूर तक इसकी आवाज़ भी सुनाई पड़ रही थी. मेरा लेकिन इरादा क्लियर था. मुझे इसलिए छपना था कि पटना में मेरी किताब बिक सके...वहां तक पहुंचे जहाँ इन्टरनेट नहीं है. मुझे ऑनलाइन नहीं स्टोर में बिकने वाली किताब लिखनी थी. अभी भी लगता है कि जिस दिन किसी हिंदी किताब की पाइरेटेड कोपी देखती हूँ मार्किट में, उस दिन लगता है कि किताब वाकई बिक रही है. अब सवाल था कि किसी पब्लिशर तक जायें कैसे. IIMC जैसे किसी संस्थान से जुड़े होने का फायदा ये होता है कि हमें कुछ भी नामुमकिन नहीं लगता. उसी साल 'कैम्पस वाले राइटर्स' पर केन्द्रित हमारी alumni meet हुयी थी. गूगल पर अपने क्लोज्ड ग्रुप में मेसेज डाला कि एक किताब छपवानी है. मार्गदर्शन चाहिए. अगली मेल में पेंग्विन, यात्रा बुक्स और राजकमल के संपादकों के नाम और ईमेल पता थे. ये २१ अक्टूबर २०१३ की बात थी.  

मैंने पेंग्विन की रेणु आगाल को अपनी पांच छोटी कहानियां भेजीं. उन्होंने पढ़ीं और कहा कि कोई लम्बी कहानी है तो वो भी भेजो. हमने ब्लू डनहिल्स नाम से श्रृंखला लिखी थी. आधी कहानी इधर थी. बाकी को पूरी करके भेज दी. इस लम्बी कहानी का भार इतना था कि रेणु का हाथ टूट गया और पलस्तर लग गया. एक महीने के लिए. जनवरी २०१४ में कन्फर्मेशन आया कि मेरी किताब छपेगी और १० मार्च, जो कि कुणाल का बर्थडे है. उस दिन कॉन्ट्रैक्ट आया किताब का. तो हमारी लिस्ट पूरी हो गयी थी. ३० की उम्र में किताब छपवाने का. ऑफिस से रिजाइन मारे कि किताब लिखना है. अगस्त में मैनुस्क्रिप्ट देनी थी ५०,००० शब्दों की. तो बस. स्टारबक्स की ब्लैक कॉफ़ी और अपना मैक. काम चालू. 

तीन रोज़ इश्क - गुम होती कहानियां. मेरा पहला कहानी संग्रह है. इसमें कुल ४६ छोटी कहानियां हैं. आखिरी लम्बी कहानी, तीन रोज़ इश्क के सिवा सारी ब्लोग्स पर थीं. मगर अब आपको वही कहानियां पढ़ने के लिए किताब खरीदनी पड़ेगी. मुझे पहले इस बात का बहुत अपराधबोध था और इसलिए किताब के बारे में ब्लॉग पर कुछ खास लिखा नहीं था. लेकिन जिस दिन पहली बार पेंग्विन के ऑफिस में किताब हाथ में ली और अपना पहला ऑटोग्राफ दिया...समझ में आया कि ब्लॉग दूसरी चीज़ है...किताब में छपने की बात और होती है. वही कहानियां जिन्दा महसूस होती हैं. सांस लेती हुयी. इस डर से परे कि अब इनको कुछ हो जाएगा. कुछ कुछ वैसे ही जैसे कि अब मुझे मरने से डर नहीं लगता. कि अब मैं गुम नहीं होउंगी. अब मेरा वजूद है. कागज़ के पन्नों में सकेरा हुआ. 

इस शनिवार, 9 मई को मेरी किताब का लोकार्पण है. 4-7 बजे शाम को, दिल्ली के इन्डियन वुमेन्स प्रेस कोर(IWPC), 5 विंडसर प्लेस, अशोका रोड में. मेरे साथ होंगे निधीश त्यागी, अनु सिंह चौधरी और मनीषा पांडे. इन तीनों लोगों को ब्लॉग के मार्फ़त जाना है. फिर मुलाकातें अपना रंग लेती गयी हैं. अनु दी अपने बिहार से हैं और IIMC की सीनियर भी. जब बहुत उलझ जाती हूँ तो उनको फोनियाती हूँ...किसी परशानी के हल के लिए नहीं, उस परेशानी से लड़ने के ज़ज्बे और धैर्य के लिए. 'नीला स्कार्फ' और 'मम्मा की डायरी', दोनों किताबों को खूब खूब प्यार मिला है लोगों का.

निधीश जब आस्तीन के अजगर के उपनाम से लिखते थे तब ही उनसे पहली बार चैट हुयी थी. पिछले साल ३१ दिसंबर की इक भागती शाम पहली बार मिली...उनकी 'तमन्ना तुम अब कहाँ हो' हाल फिलहाल में पढ़ी सारी किताबों में सबसे पसंदीदा किताब है. निड से बात करना लम्हों में जिंदगी की खूबसूरती को कैप्चर करना है. 

मनीषा से मिली नहीं हूँ. गाहे बगाहे पढ़ती रही हूँ उसे. किताब के सिलसिले में ही पहली बार फोन पर बात हुयी. उसकी आवाज़ में कमाल का अपनापन और मिठास है. दो अनुवाद, 'डॉल्स हाउस' और 'स्त्री के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है' खाते में दर्ज है. इन्हें पढूंगी जरूर. तीन रोज़ इश्क के जरिये इक और खूबसूरत शख्स को करीब से देखने और जानने का मौका मिलेगा. 

ब्लॉग से किताब के इस सफ़र में आप लगातार मेरे साथ रहे हैं. उम्मीद है ये प्यार किताब को भी मिलेगा. अगर इस शनिवार 9th May आप फ्री हैं तो इवेंट पर आइये. मुझे बहुत अच्छा लगेगा. एंट्री फ्री है. आप अपने साथ अपने दोस्तों को भी ला सकते हैं. इवेंट के प्रचार के लिए, फेसबुक इवेंट पेज है. इसे अपना ही कार्यक्रम समझिये. फ्रेंड लिस्ट में लोगों को इनवाईट भेजिए...कुछ को साथ लिए आइये. तीन रोज़ इश्क़ आप इवेंट पर खरीद सकते हैं. साथ में मेरा ऑटोग्राफ भी मिल जायेगा :) फिरोजी सियाही से चमकते कुछ ऑटोग्राफ देने का मेरा भी मन है.

फेसबुक इवेंट पेज पर जाने के लिए क्लिक करें.

किताब अब तक बुकस्टोर्स में आ गयी है. इसके अलावा, तीन रोज़ इश्क़ खरीदने के लिए इन लिंक्स को क्लिक कर सकते हैं.

बाकी सब तो जो है...पहली किताब का डर...इवेंट की घबराहट...लास्ट मोमेंट में मैचिंग साड़ी खरीद कर उसके झुमके वगैरह का आफत...फिरोजी स्याही की इंक बोतल लिए फिरना वगैरह...लेकिन बहुत सा उत्साह भी है. जिन्होंने सिर्फ ब्लॉग पढ़ा है या किताब पढ़ी है उनको पहली बार देखने का उत्साह. तो बस ख़त को तार समझना और फ़ौरन चले आना...न ना...फ़ौरन नहीं. 9 तारीख को. हम इंतज़ार करेंगे.

24 April, 2015

के भगवान भी सर पीट कर कहता है, 'हे भगवान, क्या करेंगे हम इस लड़की का!'


भगवान बैठा है सामने. हथेली पर ठुड्डी टिकाये.
'लतखोर हो तुम, आँख में नींद भरा हुआ है...खुद तुमको मालूम नहीं है क्या अलाय बलाय लिख रही हो...किरमिच किरमिच लग रहा है आँख में नींद लेकिन सोओगी नहीं. अब क्या लोरी सुनाएं तुमको? भारी बदमाश हो'
'ऑल योर फाल्ट, हमसे पूछ के बनाये हो हमको ऐसा. भुगतो. हुंह'
'तुमसे बक्थोथरी करने का कोई फायदा नहीं हैं और हमको इतना टाइम नहीं है...सीधे सीधे बताओ, अभी चुप चाप सोने का क्या लोगी?'
'उसकी आवाज़?'
'किसकी?'
'अच्छा...रियली...तुम ये सवाल पूछोगे...तुमको तो सब मालूम है'
'बाबू, नारी के मन की बात एंड ऑल दैट...तुमको मज़ाक लगता है...उसमें भी तुम...बाबा रे...ब्रम्हा के बाबूजी भी नहीं जानें कि तुम को क्या चाहिए...सीधे सीधे नाम लो उसका...फिरि फ़ोकट में हम एक ठो वरदान बर्बाद नहीं करेंगे'
'इतने नखरे हैं तो आये काहे हो...जाओ न...कौन सा हमारे फेसबुक पोस्ट से इंद्र का सिंघासन डोलने लगता है'
'अब तुमको क्या क्या एक्सप्लेन करें अभी...कहर मचाये रक्खी हो...सो जाओ बे'
'उसकी आवाज़'
'नाम क्या है उसका'
'वो नहीं बताएँगे'
'ट्रायल एंड एरर?'
'आई एम गेम'
'गेम की बच्ची...तुम्हारे तरह लुक्खा बैठे हैं हम...भोर के तीन बज रहे हैं...नरक का सब छौड़ा लोग फेसबुक खोल के गलगली दिए जा रहा है...न कहीं जाएगा, न खुराफात करेगा...इन्टरनेट का बिल बेसी आएगा सो कौन भरेगा बे'
'तुम्हारी भाषा को क्या हो रहा है...हे भगवान! कैसे बोलने लगे हो आजकल?'
'तुम न...हमको भी सलाह दे मारोगी लड़की...अब जल्दी बताओ क्या जुगाड़ लगायें तुम्हारा?'
'जैसे ब्लैंक चेक होता है वैसे तुम ब्लैंक सिम जैसा कुछ दे दो न हमको...कि हमारा जिसकी आवाज़ सुनने का मन करे...जब भी...हम उसे फोन करें और वो हमेशा मेरा कौल पिक कर ले'
'तुमको अपना जिंदगी कॉम्प्लीकेट करने में कितना मन लगता है. ऐसा कुछ न दे रहे हम तुमको. किसी एक के नाम का कालिंग कार्ड दे सकते हैं. चाहिए?'
'अच्छा चलो...आई विल मैनेज...कार्ड इशु करो'
'नाम?'
'ओफ्फोह...वी आर डेफिनिटली नॉट गोइंग इन दैट लूप अगेन, तुम कार्ड दे दो, हम नाम लिख लेंगे'
'वैलिडिटी कितनी?'
'जिंदगी भर'
'इतना नहीं हो पायेगा'
'कैसे यूजलेस भगवान् हो...चलो कमसे कम दस साल'
'तुम जिन्दा रहोगी दस साल? मर गयी तो? कार्ड कौन यूज करेगा?'
'न न न न...चलो एक साल'
'ओके. एक साल. एक कार्ड. एक आवाज. ठीक है?'
'डन, वो मेरा कॉल उठाएगा न कल?'
'कौन सा कल? तुम्हारे सो के उठ जाने तक उसका आज ही चल रहा होगा'
'ओफ्फोह...तुम जाओ...कार्ड दे दिए न...माथा मत खाओ मेरा'

वो जरा झुकता और कनमोचड़ी दिए जाता है...

'बदमाश, उसको ज्यादा परेशान मत करना'
'नहीं करेंगे. प्रॉमिस'
'ओके. आई लव यू'
'आई नो'
'बहुत बदमाश हो बाबा रे...आई लव यू टू बोलो'
'तुम कहते हो तो कह देते हैं, आई लव यू टू'

और इसके बाद भगवन अंतर्ध्यान हो गए. हम सोच रहे हैं कि सो जायें. और सोच रहे हैं कि कल अगर उसको फोन करेंगे...कल...जो कि उसका आज ही होगा तो क्या वो वाकई फ़ोन उठाएगा...या ये सब सपना था और हम आलरेडी सोये हुए हैं.

22 April, 2015

सांस की जादुई चिड़िया कलम में रहती थी

मेरा एक गहरा, डार्क किरदार रचने का मन कर रहा है. मेरे अंदर उसकी करवटों से खरोंच पड़ती है. उसके इश्क़ से मेरी कलम को डर लगता है.


वो जादूगर है. उसकी सुन्दर कलाकार उँगलियों में न दिखने वाली ब्लेड्स छुपी रहती हैं. वो जब थामता है मेरा हाथ तो तीखी धार से कट जाती है मेरी हथेली. गिरते खून से वो लिखता है कवितायें. वो बांहों में भरता है तो पीठ पर उगती जाती हैं ज़ख्मों की क्यारियाँ...उनमें बिरवे उगते हैं तो मुहब्बत के नहीं इक अजीब जिस्मानी प्यास के उगते हैं. वो करना चाहता है मेरा क़त्ल. मगर क़त्ल के पहले उसे उघेड़ देना है मेरी आँखों से मुहब्बत के हर मासूम ख्वाब को. उसकी तकलीफों में मैं चीखती हूँ तुम्हारा नाम...इक तुम्हारा नाम...तुम्हें हिचकियाँ आती हैं मगर इतनी दूर देश तुम नहीं भेज सकते हो सैनिकों की पलटन कि मुझे निकाल लाये किसी तहखाने से. मैं दर्द की सलाखों के पार देखती हूँ तो सुनाई नहीं पड़ती तुम्हारी हँसी.

वो जानता है कि मेरी साँसों की जादुई चिड़िया मेरी कलम की सियाही में रहती है...वो डुबा डालता है मेरे शब्दों को मेरे ही रक्त में...मुझमें नहीं रहती इतनी शक्ति कि मैं लिख सकूँ इक तुम्हारा नाम भी. धीमी होती हैं सांसें. वो मुझे लाना चाहता है सात समंदर पार अपने देश भारत किसी ताबूत में बंद कर के...मेरी धड़कनों को लगाता है कोई इंजेक्शन कि जिससे हज़ार सालों में एक बार धड़कता है मेरा दिल और साल के बारह महीनों के नाम लिखी जाती है एक सांस...उस इक धड़कन के वक़्त कोई लेता है तुम्हारा नाम और मेरा जिस्म रगों में दौड़ते ज़हर से बेखबर दौड़ता चला जाता है फोन बूथ तक...तुमसे बात कर रही होती है तुम्हारी प्रेमिका...उसने ही भेजा है इस हत्यारे को. आह. जीवन इतना प्रेडिक्टेबल हो सकता है. मुझे लगता था यहाँ कहानियों से ज्यादा उलझे हुए मोड़ होंगे.

वो जानता है मैं तुम्हारी आवाज़ सुन भी लूंगी तो हो जाउंगी अगले कई हज़ार जन्मों के लिए अमर. कि मेरे जिस्म के टुकड़े कर के धरती के जितने छोरों पर फ़ेंक आये वो, हर टुकड़े से खुशबु उड़ेगी तुम्हारी और तुम तक खबर पहुँच जायेगी कि मैंने तुमसे इश्क किया था. वो तुमसे इतनी नफरत करता है जितनी तुम मुझसे मुहब्बत करते हो. उसकी आँखों में एक उन्माद है. मैंने जाने क्यूँ उसका दिल तोड़ा...अनजाने में किया होगा.

कलम के पहले उसे छीननी होती है मेरी आवाज़...उस कानफाडू शोर में मैं सुन नहीं सकती अपनी आवाज़ भी...मैं जब पुकारती हूँ तुम्हें तो मेरे कलेजे का पोर पोर दुखता है...मेरी चीख से सिर्फ मेरी अंतरात्मा को तकलीफ होती है. बताओ. इश्क कितना यूजलेस है अगर उसके पार जीपीएस ट्रेकिंग का कोई जुगाड़ न हो. हिचकियाँ वन वे लेटर होती हैं. तुम्हें तो सबने दिल में बसा रखा है...हिचकियों का कोई मोर्स कोड तो होता नहीं कि मालूम चल जाए कि मैं तुम्हें याद कर रही हूँ.

मैं भूल गयी हूँ कैसा है मेरा नाम...ट्रांस म्यूजिक के अंतराल पर पड़ने वाले ड्रम बीट्स और आर्टिफिसियल वाद्ययंत्रों ने भुला दिया है मेरे दिल और साँसों का रिदम. मैं वो लम्हा भूलने लगी हूँ जब पहली बार तुम्हें देखा था...स्लो मोशन में...वक्त की सारी इकाइयां झूठी होने लगी हैं. वो मुझे खाने के साथ रोज़ पांच लोहे की जंग लगी कीलें देता है. मैं उन्हें निगलने की जितनी कोशिश करती हूँ उतना ही मेरा गला छिलता जाता है. जाने कितने दिन हुए हैं. शायद आँतों में इंटरनल ब्लीडिंग शुरू हो गयी हो. चलती हूँ तो भारी भारी सा लगता है. मैं कहीं भाग नहीं सकती हूँ. उसने राइटिंग पैड जैसे बना रखे हैं लकड़ी के फट्टे, छोटे छोटे. हर रोज़ मेरी एक ऊँगली में एक छोटा सा स्केल्नुमा फट्टा ड्रिल कर देता है. मैं अब तुम्हारा नाम कभी लिख नहीं पाऊँगी. कलम पकड़ने के लिए कोई उँगलियाँ नहीं हैं.

जैसे जैसे मरने के दिन पास आते जा रहे हैं...चीज़ें और मुश्किल होती जा रही हैं. कमरे में पानी का एक कतरा भी नहीं है. मैं सांस भी सम्हल के लेती हूँ...कि हर सांस के साथ पानी बाहर जाता है. गला यूँ सूखता है जैसे कीलें अभी भी गले में अटकी हुयी हों. मैं सोचती हूँ...तुम हुए हो इतने प्यासे कभी? कि लगे रेत में चमकती मृगतृष्णा को उठा कर पी जाऊं?

बहुत दिन हो गए इस शहर आये हुए...अफ़सोस कितने सारे हैं...सोचो...कभी एक और बार तुम्हें देखना था...तुम्हारे गले लगना था. तुम्हें फोन करके कहना था 'सरकार' और सुननी थी तुम्हारी हँसी. अभी खींचनी थी तुम्हारी तसवीरें कि तुम्हें मेरा कैमरा जब देखता है तो महबूब की नज़र से देखता है. मगर जल्दी ही आखिरी सांस ख़त्म और एक नया रास्ता शुरू. तुम्हें रूहों के बंधन पर यकीन है? पुनर्जन्म पर?

मुझे मर जाने का अफ़सोस नहीं है. अफ़सोस बस इतना कि जाते हुए तुम्हें विदा नहीं कह पायी. के तुम चूम नहीं पाये मेरा माथा. के मैं लौट कर नहीं आयी इक बार और तुम्हें गले लगाने को.

सुनो. आई लव यू.
मुझे याद रखोगे न. मेरे मर जाने पर भी?

28 March, 2015

दिल की कब्रगाह में इश्क़ का सुनहला पत्थर


मेरा दिल एक कब्रगाह है. इसके बाहर इक लाल रंग के बोर्ड पर बड़े बड़े शब्दों में चेतावनी लिखी हुयी है 'सावधान, आगे ख़तरा है!'. कुछ साल पहले की बात है इक मासूम सा लड़का इश्क़ में मर मिटा था. मैं जानती हूँ कि वो लड़का मुझे माफ़ कर देता...उसकी फितरत ही थी कुछ जान दे देने की...मुझपर न मिटता तो किसी वाहियात से इन्किलाब जिंदाबाद वाले आन्दोलन में भाग लेकर पुलिस की गोली खाता और मर जाता. वो मिला भी तो था मुझे आरक्षण के खिलाफ निकलने वाले जलसे में. बमुश्किल अट्ठारह साल की उम्र और दुनिया बदल देने के तेवर. क्रांतिकारी था. नेता था. लोग उसे सिर आँखों पर बिठाते थे. उसका बात करने का ढंग बहुत प्रभावी था. जिधर से गुज़रता लोग बात करने को लालायित रहते. फिर ऐसा क्या हुआ कि उसे बंद कमरे और बंद खिड़कियाँ रास आने लगीं? उसके दोस्तों को मैं डायन लगती थी...मैंने उसे उन सबसे छीन कर अपने आँचल के अंधेरों में पनाह दे दी थी...अब दिन की रौशनी में उसकी आँखें चुंधियाती थीं. उसके चेहरे का तेज़ अब मेरे शब्दों में उतरने लगा था...मैंने पहली बार जाना कि शब्दों में जान डालने के लिए किसी की जान लेनी पड़ती है. उनका अपना कुछ नहीं होता. जैसे जैसे मेरे शब्दों में रौशनी आने लगी, उसकी सांसें बुझने लगीं...उस वक़्त किसी को मुझे बता देना था कि इस तिलिस्म से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं आएगा मुझे. कि शब्दों की ऐसी तंत्र साधना मुझे ही नहीं मेरे इर्द गिर्द के सारे वातावरण को सियाह कर देगी. मगर ऐसे शब्दों के लिए जान देने वाला कोई न शब्दों को मिला था...न इश्क़ को...न लड़के को. वो मेरे दिल के कब्रगाह बनने का नींव का पत्थर था...वो जो कि मैंने उसकी कब्र पर लगाया था...मैंने उसपर अपनी पहली कविता खुदवाई थी. उस इकलौती कब्र के पत्थर को देखने लोग पहुँचने लगे थे. दिल की गलियां बहुत पेंचदार थीं मगर वहां कोई गहरा निर्वात था जो लोगों को अपनी ओर खींचता था...जिंदगी बहुत आकर्षक होती है...जिन्दा शब्द भी. 

उस लड़के की लाश मेरे दुस्वप्नों में कई दिनों तक आती रही. उसके बदन की गंध से मेरी उँगलियाँ छिलती थीं. कोई एंटीसेप्टिक सी गंध थी...डेटोल जैसी. बचपन के घाव जैसी दुखती थी. मुझे उसकी मासूमियत का पता नहीं था. मैं उसे चूमते हुए भूल गयी थी कि ये उसके जीवन का पहला चुम्बन है...खून का तीखा स्वाद मेरी प्यास में आग लगा रहा था...मैं उसे अपनी रूह में कहीं उतार लेना चाहती थी...उसकी दीवानी चीख में अपना नाम सुनकर पहली बार अपने इश्वर होने का अहसास हुआ था...उसने पहली बार में अपनी जिंदगी मुझे सौंप दी थी. पूर्ण समर्पण पर स्त्रियों का ही अधिकार नहीं है...पुरुष चाहे तो अपना सर्वस्व समर्पित कर सकता है. बिना चाहना के. मगर लड़के ने इक गलत आदत डाल दी थी. उस बार के बाद मैंने पाया कि मेरे शब्द आदमखोर हो गए हैं. कि मेरी कलम सियाही नहीं खून मांगती है...मेरी कल्पना कातिल हो गयी है. मैंने उस लड़के को अपनी कहानी के लिए जिया...अपने डायलॉग्स के लिए तकलीफें दीं...अपने क्लाइमेक्स के लिए तड़पाया और कहानी के अंत के लिए एक दिन मैंने उसकी सांसें माँग लीं. मुझे जानना था कि दुखांत कहानी कैसे लिखी जाती है. ट्रेजेडी को लिखने के लिए उसे जीना जरूरी था. लड़के ने कोई प्रतिरोध नहीं किया. मैं उसकी चिता की रौशनी में कवितायें लिखती रही. उसका बलिदान लेकिन मेरे दिल को कहीं छू गया था. मैं उसकी आखरी निशानी को गंगा में नहीं बहा पायी. 

उस दिन मेरे दिल में कब्रगाह उगनी शुरू हो गयी. वो मेरा पहला आशिक था. मुझ पर जान देने वाला. मेरे शब्दों के लिए मर जाने वाला. उसकी कब्र ख़ास होनी थी. मैंने खुद जैसलमेर जा कर सुनहला पीला पत्थर चुना. मेरी कई शामें उस पत्थर के नाम हो गयीं. जब उसके नाम का पहला अक्षर खोदा तभी से दिल की किनारी पर लगे पौधे मुरझा गए. बोगनविला के फूल तो रातों रात काले रंग में तब्दील हो गए. काले जादू की शुरुआत हो चुकी थी. कविता में चमक के लिए मैंने ऊँट की हड्डियों का प्रयोग किया. सुनहले पत्थर पर जड़े चमकीले टुकड़ों से उसकी बुझती आँखों की याद आती थी. उसकी कब्र पर काम करते हुए तो महीनों मुझे किसी काम की सुध नहीं थी. दिन भर उपन्यास लिखती और लड़के को लम्हा लम्हा सकेरती और रात को कब्र के पत्थर पर काम करती. नींद. भूख. प्यास. दारू. सिगरेट. सब बंद हो गयी थी. जादू था सब. मैं इश्क़ में थी. मुझे दुनिया से कोई वास्ता नहीं था. 

पहला उपन्यास भेजा था एडिटर को. उसे पूरा यकीन था कि ये बहुत बिकेगा. मार्केट में अभी भी वीभत्स रस की कमी थी. इस खाली जगह को भरने के लिए उसे एक ऐसा राइटर मिल गया था जिसके लिए कोई सियाही पर्याप्त काली नहीं थी. लड़की यूँ तो धूप के उजले रंग सी दिखती थी मगर उसकी आँखों में गहरा अन्धकार था. एडिटर ने लड़की को काला चश्मा पहनने की सलाह दी ताकि उसकी आँखों की सियाही से बाकी लोगों को डर न लगे. वो अपने कॉन्ट्रैक्ट पर साइन करने लौट रही थी जब लड़के के दोस्त उसे मिले. उनकी नज़रों में लड़की गुनाहगार थी. उनकी आँखों में गोलाबारूद था. वे लड़की के दिल में बनी उस इकलौती कब्र के पत्थर को नेस्तनाबूद कर देना चाहते थे. लड़की को मगर उस लड़के से इश्क़ था. जरूरी था कि कब्रगाह की हिफाज़त की जाए. उसने मन्त्रों से दिल के बाहर रेखा खींचनी शुरू की...इस रेखा को सिर्फ वोही पार कर सकता था जिसे लड़की से इश्क़ हो. इतने पर भी लड़की को संतोष नहीं हुआ तो उसने एक बड़ा सा लाल रंग का बोर्ड बनाया और उसपर चेतावनी लिखी 'आगे ख़तरा है'.

दिल के कब्रगाह में मौत और मुहब्बत का खतरनाक कॉम्बिनेशन था जो लोगों को बेतरह अपनी ओर खींचता था. लोग वार्निंग बोर्ड को इनविटेशन की तरह ले लेते थे. चूँकि उनके दिल में मेरे लिए बेपनाह मुहब्बत होती थी तो वे अभिमंत्रित रेखा के पार आराम से आ जाते थे. इस रेखा से वापस जाने की कोई जगह नहीं होती लेकिन. वे पूरी दुनिया के लिए गुम हो जाते थे. न परिवार न दोस्त उनके लिए मायने रखते थे. वे मेरे जैसे होने लगते थे. इश्क़ में पूरी तरह डूबे हुए. मैंने कब्रगाह पर एक गेट बना दिया कि जिससे एक बार में सिर्फ एक दाखिल हो सके मगर ये थ्रिल की तलाश में आये हुए लोग थे. इन्हें दीवार फांद कर अन्दर आने में अलग ही मज़ा आता था. इश्क़ उसपर खुमार की तरह चढ़ता था. अक्सर इक हैंगोवर उतरने के पहले दूसरी शराब होठों तक आ लगती थी. ये अजीब सी दुनिया थी जिसमें कहीं के कोई नियम काम नहीं करते. मुझे कभी कभी लगता था कि मैं पागल हो रही हूँ. वो रेखा जो मैंने दुनिया की रक्षा के लिए खींची थी उसमें जान आने लगी थी. अब वो मुझे बाहर नहीं जाने देती. सारे आशिक भी इमोशनल ब्लैकमेल करके मुझे दुनिया से अलग ही रखने लगे थे.

इक दुनिया में यूँ भी कई दुनियाओं का तिलिस्म खुलता है. ऐसा ही एक तिलिस्म मेरे दिल में है...ये कब्र के पत्थर नहीं प्रेमगीत हैं...प्रेमपत्र हैं...आखिरी...के इश्क का इतना ही अहसान था कि किसी के जाने के बाद उसकी कब्र पर के अक्षर मेरी कलम से निकले होते थे. हर याद को बुन कर, गुन कर मैं लिखती थी...इश्क़ को बार बार जिलाती थी...उन लम्हों को...उन जगहों को...सिगरेट के हर कश को जीती थी दुबारा. तिबारा. कई कई कई बार तक.

तुम्हें लगता होगा कि तुम अपनी अगली किताब के लिए प्रेरणा की तलाश में आये हो...मगर मेरी जान, मैं कैसे बता दूं तुम्हें कि तुम यहाँ अपनी कब्र का पत्थर पसंद करने आये हो...अपनी आयतों के शब्द चुनने...तुम मुझे किस नाम से बुलाओगे?

डार्लिंग...हनी...स्वीटहार्ट...क्या...कौन सा नाम?

और मैं क्या बुलाऊं तुम्हें? जानां...
काला जादू...तिलिस्म...क्या?

12 March, 2015

उसके घर का नाम था 'अलविदा'


इक खोया हुआ देश है जिसके सारे बाशिंदे शरणार्थी हो गए हैं. कहीं कोई टेंट नहीं है कि लोगों को जरा भी ठहराव का अंदाज़ हो. मैदान में दूर दूर तक कतार लगी है. सब लोग बिखरे हुए पड़े हैं. जैसे अचानक से गिर पड़ी हो कोई सलीके से बनायी गयी लाइब्रेरी और सारी किताबें बेतरतीब हो जाएँ. 

अचानक से उग आये इस देश में कुछ भी अपनी जगह पर नहीं है. स्कूल की जगह हथियार बनाने की फैक्ट्री, बेकरी की जगह ईंटों की भट्ठी और बंदरगाह की जगह ज्वालामुखी उगे हुए हैं. इसी जगह वे अपना जरा सा आसमान तलाशने चले आये थे. उन्हें क्या पता वहां आसमान की जगह एक खारे पानी का झरना था. वे घंटों भीगे हुए इन्द्रधनुष का कोना तलाशते रहते कि जिसे थाम कर वे इस देश से बाहर निकल सकें. 

उन्हें कोई तलाशता नहीं था. वहां कोई लिस्ट नहीं थी कि जिसमें गुमशुदा लोगों की रिपोर्ट दर्ज हो. भीगे हुए उन्हें सर्दी लगनी चाहिए थी मगर उन्होंने देखा एक दूसरे की आँखों में और हँस पड़े. जहाँ बुखार होना था वहां इश्क होने लगा. वे नमकीन झरने में भीगते हुए छुप्पम छुपायी खेलने लगे. लड़के ने सूरज का टॉर्च बनाया और गहरे गोता मार गया...जब उसकी सांस ख़त्म हुयी तो लड़की की आँखें चाँद जैसी चमक रही थी. 

उनके बीच बस खारे पानी का झरना था. धीरे धीरे वे दोनों गोता मारने लगे. आजकल वे महीनों गुम हो जाते. उस नए देश में फरवरी के दी छोटे होते होते एक दिन गायब हो गए. अब वहां ग्यारह महीने का साल होने लगा. अब लड़की परेशान थी कि उसे अब इन्द्रधनुष ही नहीं फरवरी की भी तलाश करनी थी. उसे गुम होती चीज़ों से डर लगता था. वो लड़के को लगाती थी भींच कर गले...उसे लगता था लड़का गुम हो जाएगा. वो खारे पानी से लिखती थी इबारतें. अब लड़की उसे अपने दुपट्टे की छोर में बाँध कर रख लेना चाहती थी. ऐसे ही किसी रोज़ उसने दुपट्टे की छोर में एक चाभी बाँध ली. उस दिन से वो एक घर की तलाश भी करने लगी. बराई सी घूमती थी और खाली जमीन के प्लाट पर टिक लगाती फिरती थी. घर की तलाश में वो दोतरफा बंट जाती और टूटने लगती. एक मन लड़के के साथ आसमान के खारे, उथले झरने में भीगता हुआ इन्द्रधनुष तलाशता तो एक मन बार बार दुपट्टे में बंधी चाभी पर खुरच कर घर का नाम लिखना चाहता 'अलविदा'.

लड़का उससे झगड़ता. कौन रखता है घर का नाम अलविदा. तुम कुछ स्वतं जैसा लिखो वरना इस घर आने को किसका दिल चाहेगा. लड़की मगर उलटबांसी चलती थी. उसने अलविदा कह कर लोगों को दिल में और गहरे बस जाते देखा था. यह नया बना देश था...यहाँ कुछ भी अपनी जगह पर नहीं था. लोग लड़की के घर को सराय की तरह इस्तेमाल करने लगे. वहां दस दिशाओं से आती थी...हवा...मुहब्बत...और कहानियां भी. 

इक रोज़ लड़की के दुपट्टे से चाभी गुम हो गयी. वो अपने घर के बाहर खड़ी टुकुर टुकुर ताकती. सोचती अपने घर में मुसाफिर की तरह जाना कैसा होगा. और क्या घर उसे पहचानेगा भी? घर की दीवारें मगर इश्क की बनीं थीं, वे लड़की की उँगलियों की खुशबू पहचानती थीं. लड़की ने कितनी बार बनायी थी अप्लाना और चौखट पर लिखा था स्वागतम. फिर उसने फेंके सारे गैरजरूरी लोग बाहर. वो घर के बाहर आई तो उसने देखा कि इन्द्रधनुष दहलीज़ पर टिका था, शरारत से झांकता हुआ. 


अब बस लड़के का इंतज़ार था. उसकी बाँहों में भी एक घर था. घर जो हमेशा से होता है. लड़की इस घर की चाह में मिट रही थी. लड़का राह भूल गया था. लड़की अलविदा में ठहरी थी. 

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